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राजनीति

मोदी सरकार का नया जुमला न्यायपालिका में एससी-एसटी को आरक्षण

Prema Negi
27 Dec 2018 8:07 AM GMT
मोदी सरकार का नया जुमला न्यायपालिका में एससी-एसटी को आरक्षण
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बिना संविधान संशोधन उच्च न्यायपालिका में आरक्षण संभव नहीं और अधीनस्थ न्यायपालिका में पहले से है आरक्षण

वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट

चुनाव नजदीक हैं, ऐसे में एक बार फिर भाजपा एससी-एसटी वोट बैंक को साधने के लिए फर्जी लॉलीपाप दिखा रही है। कानून मंत्री रवि शंकर प्रसाद ने अब जजों की नियुक्ति में आरक्षण देने की बात कही है, लेकिन यह आरक्षण अधीनस्थ न्यायपालिका के लिए है।

सभी राज्य सरकारें अधीनस्थ न्यायपालिका के लिए अपने अपने प्रदेश के लोक सेवा आयोगों द्वारा न्यायिक दंडाधिकारी /जूनियर सिविल जज की नियुक्तियां करती हैं, जबकि अपर जिला जजों की सीधी भर्तियाँ सम्बन्धित प्रदेशों के हाईकोर्ट द्वारा की जाती हैं, जिनमें पहले से ही एससी-एसटी और ओबीसी का आरक्षण कोटा है।

उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों में जजों की नियुक्तियों में आरक्षण का प्रावधान संविधान में नहीं है, इसलिए उच्च न्यायपालिका में तब तक आरक्षण नहीं हो सकता जब तक संविधान में तत्सम्बन्धी संशोधन न हो। गौरतलब है कि संविधान के अनुच्छेद 233 और 234 के तहत अधीनस्थ न्यायपालिका में नियुक्तियों से जुड़ा अधिकार राज्य लोक सेवा आयोग और हाईकोर्ट को दिया गया है।

इससे पहले सरकार ने निचली अदालतों में प्रवेश के लिए एग्जाम आधारित अखिल भारतीय न्यायिक सेवा बनाने की बात कही थी, जिस पर विवाद हुआ था। रविशंकर प्रसाद का कहना है कि उन्होंने निचले तबके का प्रतिनिधित्व और मजबूत करने के लिए यह बात कही है।

कानून मंत्री का कहना है कि यूपीएससी की तरफ से न्यायिक सेवाओं की परीक्षा आयोजित हो सकती है। जिस तरह सिविल सर्विसेज की परीक्षाएं आयोजित होती हैं, ठीक उसी तरह न्यायिक सेवाओं के लिए परीक्षा करवाई जाए। जिसमें एससी एसटी को आरक्षण मिल सके, जिसके बाद सभी की तैनाती राज्यों में की जाए। उन्होंने कहा आरक्षण मिलने की वजह से वंचित तबके को भी ऐसे पदों पर रहने का मौका मिलेगा। अब जब पहले से ही अधीनस्थ न्यायपालिका में आरक्षण की व्यवस्था है तो कौन सा नया आरक्षण देना चाहते हैं कानून मंत्री।

ओबीसी का जिक्र नहीं

रविशंकर प्रसाद ने एससी-एसटी वर्ग को आरक्षण देने की बात कही, लेकिन ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) का कोई जिक्र नहीं किया। हालांकि अगर मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू करने वाले उच्चतम न्यायालय के फैसले की बात करें तो सिविल सर्विसेज की तरह न्यायिक सेवा भी ओबीसी आरक्षण के दायरे में पहले से ही है।

संविधान के अनुच्छेद 233 और 234 के तहत नियुक्तियां

संविधान के अनुच्छेद 233 और 234 के तहत नियुक्तियों से जुड़ा अधिकार राज्य लोक सेवा आयोग और हाईकोर्ट को दिया गया है। हालांकि, केंद्र सरकार इसके लिए संविधान संशोधन कर सकती है, जिसे दो तिहाई बहुमत के साथ पास करने की ज़रूरत होगी। लेकिन राज्यसभा में बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए के पास सिर्फ 90 सांसद हैं और चुनाव में छह माह से कम समय बचा है, ऐसे में भाजपा सरकार के लिए ऐसा करना संभव नहीं है।

ऑल इंडिया ज्यूडिशियल सर्विस कोई नया मुद्दा नहीं

दरअसल संविधान के 42वें संशोधन के माध्यम से अनुच्छेद 312 को समाहित किया गया था। इसके तहत ऑल इंडिया ज्यूडिशियल सर्विस शुरू करने का अधिकार केंद्र सरकार के पास है। वर्तमान व्यवस्था में इन नियुक्तियों का निरीक्षण और प्रशासकीय नियंत्रण हाईकोर्ट के पास है। राज्य सरकारें इन नियुक्तियों से जुड़े आर्थिक भार को उठाती हैं। ऐसे में एक संघीय ढांचे में राज्यों की सहमति के बिना केंद्र सरकार इस पर शायद ही कदम उठा पाए। ये कोई नया मुद्दा नहीं है।

साल 1986 में विधि आयोग ने अपनी एक सौ सोलहंवी रिपोर्ट में इसकी विस्तार से अनुशंसा की थी। इसके बाद सभी दलों की सरकारें आईं और इस पर कोई कार्यवाही नहीं हुई। देश के सभी राज्यों में पहले से ही ज्युडिशियल सर्विसेज़ हैं जिनमें आरक्षण की व्यवस्था है। प्रश्न यह है कि यदि नयी व्यवस्था हो भी जाये तो इसमें क्या किसी नये आरक्षण की व्यवस्था होगी?

सभी राज्यों में ज़िला जज़ों की नियुक्ति में आरक्षण

इस समय उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और सभी दक्षिण भारतीयों राज्यों में ज़िला जज़ों की नियुक्ति में आरक्षण दिया जाता है। इन सेवाओं में आरक्षण का लाभ लेने के लिए उम्मीदवार को इस बात का प्रमाण देना होता है कि वह उसी राज्य का निवासी है। उच्चतम न्यायालय कह चुका है कि किसी जाति के व्यक्ति को उसी के राज्य में आरक्षण मिलेगा, दूसरे राज्य में नहीं। ऐसे में ऑल इंडिया ज्यूडिशियल सर्विस में विभिन्न राज्यों के आरक्षित वर्गों को इसमें कैसे समाहित किया जायेगा।

राज्य अपने यहां वंचित वर्गों की आबादी के मुताबिक़ आरक्षण देते हैं, क्योंकि किसी राज्य में एससी ज़्यादा हैं तो कहीं पर एसटी ज़्यादा हैं। प्रश्न ये है कि क्या इस सेवा में राज्यों की स्थिति के हिसाब से आरक्षण होगा या अखिल भारतीय स्तर पर आरक्षण दिया जाएगा। और इससे समस्या का समाधान किस तरह होगा। इससे नये तरह की जटिलताएं पैदा होंगीं और न्यायालयों पर आरक्षण सम्बन्धी मुकदमों का नया बोझ पड़ेगा।

दलित वोट बैंक बनाने की कोशिश

भाजपा को 2014 के आम चुनाव और 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में दलित समाज के वोट मिले थे। ऐसे में भाजपा कोशिश कर रही है कि दलित समाज को पार्टी के एक मजबूत वोट बैंक के रूप में विकसित किया जाए। लेकिन दलितों को लुभाने के चक्कर में सवर्ण समाज भाजपा से बिदकता नजर आ रहा है। मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आरक्षण पर कहा था कि कोई माई का लाल आरक्षण नहीं ख़त्म कर सकता। इसके बाद शिवराज सिंह चौहान चुनाव हार गए थे।

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