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विमर्श

नाकामी छुपाने के लिए मोदी सरकार ने बंद किया बेरोजगारी के आंकड़े इकट्ठा करना

Prema Negi
3 Dec 2018 6:22 AM GMT
नाकामी छुपाने के लिए मोदी सरकार ने बंद किया बेरोजगारी के आंकड़े इकट्ठा करना
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मोदी सरकार चाहती है कि देश का नौजवान बेरोजगारी के बारे में कोई सवाल न कर सके। नाकामियों को छिपाने के लिये डाटा कलेक्शन रोका जा रहा है और सभी संस्थाओं पर दबाव डालकर उनसे फ़र्ज़ी रिपोर्ट बनवायी जा रही है...

अभिषेक आजाद

केंद्र की वर्तमान मोदी सरकार अपनी नाक़ामियां छिपाने के लिए तथ्यों से छेड़छाड़ कर रही है। इसके मंत्री अधिकारियों द्वारा बनाई गयी रिपोर्ट को बदल रहे है। जानबूझकर राफेल और नोटबंदी पर कैग की रिपोर्ट में देरी की जा रही है। बेरोजगारी और किसान आत्महत्या जैसे कई महत्वपूर्ण तथ्यों का संकलन रोक दिया गया है।

अब आप बेरोजगारी या किसान आत्महत्या के बारे कोई भी तथ्यपरक बात नहीं कर पायेंगे क्योंकि सरकार ने इनसे सम्बंधित सभी तथ्यों का संकलन रोक दिया है। सरकार चाहती है कि हमारे देश का नौजवान बेरोजगारी के बारे में कोई सवाल न कर सकें। नाकामियों को छिपाने के लिये डाटा कलेक्शन रोका जा रहा है और सभी संस्थाओं पर दबाब डालकर उनसे फ़र्ज़ी रिपोर्ट बनवायी जा रही है। कृषि मंत्रालय के अधिकारियों को ऐसे ही दबाब के चलते अपनी रिपोर्ट बदलनी पड़ी।

कृषि मंत्रालय

हाल ही में कृषि मंत्रालय ने वित्तीय मामलों की संसदीय समिति के सामने यह बात मानी थी कि नोटबंदी का किसानों पर बुरा असर पड़ा है। नोटबंदी के बाद नगदी की कमी की वजह से ग्रामीण भारत में हताशा के हालात पैदा हुये। बहुत सारे किसान बीज और खाद नहीं खरीद सके। 2016 में रबी की फसल पर इसका बुरा असर पड़ा। नोटबंदी की वजह से खेती सेक्टर में नकदी की कमी आई और कई किसान बीज और खाद खरीदने में नाकाम रहे।

जब कृषि मंत्रालय ने यह रिपोर्ट संसदीय समिति को सौंपी उस वक़्त कृषि मंत्री राधामोहन जी कहीं बाहर थे। जैसे ही उन्हें मीडिया से पता चला कि कृषि मंत्रालय के अधिकारियों ने एक सही और सच्ची रिपोर्ट बनाकर संसदीय समिति को भेजी है, तो वे तुरंत वापस आये और पहले वाली रिपोर्ट को यह कहकर वापस मँगवा लिया कि इस रिपोर्ट में कई खामियां है।

मंत्री जी ने कृषि विभाग द्वारा बनाई गई रिपोर्ट को बदल दिया और इसे बनाने वाले अधिकारियों के खिलाफ 'कारण बताओ नोटिस' जारी कर दिया। इस सरकार में सच्चाई, मेहनत और ईमानदारी से काम करने वाले अधिकारियों को पुरस्कृत करने के बजाय दण्डित किया जा रहा है।

कैग रिपोर्ट में देरी

देश के साठ सेवानिवृत्त अधिकारियों ने नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक को पत्र लिखकर उस पर नोटबंदी और राफेल डील पर ऑडिट रिपोर्ट को जानबूझ कर टालने का आरोप लगाया है, ताकि अगले साल चुनाव से पहले एनडीए सरकार की किरकिरी नहीं हो। पूर्व अधिकारियों ने इस पत्र में कहा है कि नोटबंदी और राफेल फाइटर जेट डील पर ऑडिट रिपोर्ट लाने में अस्वाभाविक और अकारण देरी पर चिंता पैदा हो रही है और रिपोर्ट संसद के शीत सत्र में पटल पर रखी जानी चाहिए।

नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक ने कहा था कि ऑडिट में नोटों की छपाई पर खर्च, रिजर्व बैंक के लाभांश भुगतान तथा बैंकिंग लेन-देन के आंकड़ों को शामिल किया जाएगा, लेकिन नोटबंदी पर वादे के मुताबिक ऑडिट रिपोर्ट पर कोई कारवाई नहीं हुई। ऐसी खबरें आ रही थीं कि राफेल सौदे पर ऑडिट सितंबर 2018 तक हो जायेगी, लेकिन संबंधित फाइलों का कैग ने अब तक परीक्षण नहीं किया है। कैग सरकार के दबाव में आकर मई 2019 के चुनाव के पहले नोटबंदी और राफेल सौदे पर ऑडिट रिपोर्ट में जानबूझकर देरी कर रहा है, ताकि मौजूदा सरकार की किरकिरी नहीं हो।

नोटबंदी और राफेल सौदे को लेकर समय पर ऑडिट रिपोर्ट पेश करने में कैग की नाकामी को सभी संस्थानों पर सरकार के अनावश्यक दबाव व हस्तक्षेप के रूप में देखना चाहिए। इस सरकार ने सभी संस्थानों की स्वायत्ता छीनकर उन्हें पंगु बना दिया है। सरकार ने सभी सूचनाओं को अपने नियंत्रण में ले रखा है। अब केवल उतनी ही सूचनाएं बाहर निकलकर आ पाती हैं जितनी सरकार चाहती है।

बेरोजगारी के आकड़े इकठ्ठा न करना

केंद्रीय श्रम एवं रोजगार राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) संतोष कुमार गंगवार ने हाल ही में संसद में रोजगार के आकंड़ों को लेकर पूछे गए सवाल के जवाब में जो कुछ कहा उसने खुद ब खुद भारत में रोजगार की खराब हालत को बयां कर दिया है। गंगवार ने संसद में कहा कि भारत सरकार ने साल 2016 से देश में रोजगार के वास्तविक आंकड़ों को जानने के लिए कोई भी देशव्यापी सर्वे नहीं कराया है।

देश में बेरोजगारी की समस्या दिन ब दिन भयावह होती जा रही है। यह समस्या कितनी गंभीर हो चुकी है इसका अंदाजा सरकार को नहीं है क्योंकि उसके पास बेरोजगारी के आंकड़े ही नहीं हैं। सरकार बेरोजगारी की समस्या को गंभीरता से नहीं ले रही। 2016 के बाद से सरकार के पास देश में रोज़गार/बेरोजगारी की स्थिति का कोई सुराग नहीं है।

अगर नौकरियों और रोजगार की बात की जाए तो भारत के लिए यह स्थिति बेहद डरावनी है। पिछली बार जब श्रम विभाग (लेबर ब्यूरो) ने नौकरियों और रोज़गार के आंकड़े जारी किए थे तब यह देखा गया था कि 2015-16 में बेरोजगारी 5 फीसदी बढ़ी थी जोकि बेरोज़गारी का बीते पांच साल का उच्चतम स्तर था।

नोटबंदी से भारतीय अर्थव्यवस्था को अपूरणीय क्षति हुई। लाखों युवाओं का रोजगार नोटबंदी की भेंट चढ़ा है। मोदी जी प्रतिवर्ष 2 करोड़ रोजगार सृजन का वादा करके सत्ता में आये थे, किन्तु रोजगार देने की बजाय उन्होंने युवाओं का रोजगार छीना है। इस कड़वी सच्चाई को बर्दाश्त न कर पाने की हालत में पुराने नोटों के साथ बेरोजगारी के आंकड़ों का संकलन भी बंद कर दिया।

जीडीपी के बेस ईयर में बदलाव

मोदी जी के 'पोलिटिकल स्टंट' नोटबंदी से भारतीय अर्थव्यवस्था बुरी तरह से प्रभावित हुयी है। भारतीय अर्थव्यवस्था अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। रुपये में लगातार गिरावट आ रही है। रुपया लुढ़ककर डालर के मुकाबले अपने न्यूनतम स्तर 74 पर पहुंच गया है। रूपये की कीमत में आ रही लगातार गिरावट संयोग मात्र नहीं है। यह दिन प्रतिदिन जर्जर होती भारतीय अर्थव्यवस्था का सूचक है।

सरकार ने आर्थिक क्षेत्र में अपने ख़राब प्रदर्शन को छिपाने के लिये सबसे पहले जीडीपी के बेस ईयर को बदलकर 2004-05 से 2011-12 किया। अभी की जीडीपी के आंकड़े 2011-12 के बेस ईयर से हैं। इसके पहले के जीडीपी के आंकड़े 2004-05 के बेस ईयर के हिसाब से हैं। 2018 के अंत तक सरकार नेशनल अकाउंट्स के लिए बेस इयर को 2011-12 से बदलकर 2017-18 करने को तैयार है।

इस तरह से बार-बार बेस ईयर बदलकर भी जब सरकार अपनी असफलता नहीं छिपा पाई तो उसने एक नया हथकंडा अपनाया। जीडीपी आंकड़ों की नयी सीरीज (न्यू बैक सीरीज जीडीपी डेटा) जारी की जिसमे पिछली सरकार के कार्यकाल के जीडीपी विकास दर का नये तरीके से आकलन कर उसमें संशोधन किया। सरकार अपना रिपोर्ट कार्ड दिखाने के बजाय पिछली सरकार के रिपोर्ट कार्ड को गन्दा करने की घिनौनी हरकत कर रही है।

केंद्रीय सांख्यिकीय संगठन (सीएसओ) का काम मौजूदा वित्तवर्ष में जीडीपी का आंकलन करना है। यह अपना कामकाज छोड़कर पिछली सरकार के जीडीपी का आंकलन कर रहा है। यह दिखाता है कि किस तरह से सभी स्वायत्त संस्थाओं के कामकाज में अनावश्यक हस्तक्षेप करके उन्हें अपना काम करने से रोका जा रहा है और विपक्ष के खिलाफ एक मोहरे के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है।

सरकार ने जीडीपी को लेकर जो नये आंकड़े जारी किये हैं उसके तरीके से सहमत नहीं हुआ जा सकता है। सरकार के पास अब अर्थव्यवस्था को न संभाल पाने की नौबत आ गयी है। इसीलिए वह ऐसे कदम उठा रही है। यह न सिर्फ अर्थव्यवस्था के साथ छल है, बल्कि देश के साथ भी धोखा है। नयी जीडीपी सीरीज जारी करके जीडीपी के पुराने डेटा को गलत और अपने नये डेटा को सही बताना आर्थिक धोखाधड़ी है।

मजदूर, किसान और नौजवान

देश की स्थिति के बारे में सरकार अपने नागरिकों को अंधेरे में रखकर गुमराह नहीं कर सकती। नागरिकों को अपनी सरकार के कामकाज के बारे में जानने का हक़ है। कृषि मंत्रालय की पुरानी (सही और सच्ची) रिपोर्ट को दुबारा संसदीय समिति के पास भेजा जाय। कृषिमंत्री राधामोहन जी अपने कुकृत्य के लिये माफ़ी मांगें। नोटबंदी और राफेल डील पर कैग की रिपोर्ट को जल्द से जल्द पेश किया जाय ताकि शीतकालीन सत्र में उस पर व्यापक बहस हो सके।

सरकार द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर बेरोजगारी और किसान आत्महत्या का सर्वे फिर से शुरू किया जाय। जीडीपी के आंकड़ों में फेर बदल बंद हो। सरकार मजदूर, किसान और नौजवान से जुड़े सभी आंकड़े जल्द से जल्द पेश करे ताकि आगामी लोकसभा चुनाव 'मजदूर, किसान और नौजवान' के मुद्दे पर लड़ा जाय।

(अभिषेक आज़ाद दिल्ली विश्वविद्यालय के दर्शन विभाग में शोधछात्र और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य हैं।)

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