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विमर्श

राष्ट्रवाद के नाम पर सोशल मीडिया पर लगाम कसने की तैयारी में मोदी सरकार

Janjwar Team
1 Jun 2018 12:41 PM GMT
राष्ट्रवाद के नाम पर सोशल मीडिया पर लगाम कसने की तैयारी में मोदी सरकार
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लोग भावनात्मक मुद्दों से ऊबकर सरकारी दावों को हकीकत के धरातल पर परख रहे हैं, इसलिए मोदी सरकार सोशल मीडिया को करना चाह रही है अपने हिसाब से नियंत्रित...

सोशल मीडिया पर लगाम लगाने के लिए भाजपा सरकार कर रही है एक ऐसी कंपनी की खोज जो सोशल मीडिया पोस्ट्स का विश्लेषण कर राष्ट्रवाद को दे बढ़ावा...

गिरीश मालवीय का विश्लेषण

मोदी सरकार की नजर अब सोशल मीडिया पर है। मोदी सरकार अब एक ऐसी कंपनी खोज रही है जो सोशल मीडिया के पोस्ट्स का विश्लेषण कर सके, ताकि राष्ट्रवाद की भावना को बढ़ावा दिया जा सके।

ब्लूमबर्ग के ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर निकिता सूद ने कहा कि यह कदम देश में लोकतंत्र के सामने कड़ी चुनौती है और देश में भारतीय संविधान द्वारा दिए गए मौलिक अधिकारों के हनन की संभावना है।

आखिर ऐसा क्या हो गया है इन 4 सालों में कि मोदी जिन्होंने 2014 के चुनाव जीतने के लिए सोशल मीडिया का इतनी खूबसूरती से इस्तेमाल किया था, वही सोशल मीडिया उनके गले की फांस बनता जा रहा है।

2014 के लोकसभा चुनावों में भाजपा ने जिस तरह सोशल मीडिया का इस्तेमाल किया, उसे देख कर फाइनेंशियल टाइम्स ने तो मोदी भारत का पहला सोशल मीडिया प्रधानमंत्री तक कह डाला था.

बताया जा रहा है कि भारत की सवा अरब जनसंख्या में लगभग 70 करोड़ लोगों के पास फ़ोन हैं. इनमें से 25 करोड़ लोगों की जेब में स्मार्टफ़ोन हैं. 15.5 करोड़ लोग हर महीने फ़ेसबुक आते हैं और 16 करोड़ लोग हर महीने व्हाट्सऐप पर रहते हैं। भारत में फेसबुक के 50 फीसदी से ज्यादा यूजर्स की उम्र 25 साल से कम है। यानी एक बड़ा तबका सोशल मीडिया पर सक्रिय है।

दरअसल सोशल मीडिया के आगमन से जनमत आकलन का एक नया पैमाना मिला. पहले जनमत निर्माण का कार्य जनमाध्यम जैसे रेडियो, टीवी, अखबार आदि किया करते थे, पर सोशल मीडिया ने इस परिद्रश्य को हमेशा के लिए बदल दिया है। अब ख़बरों के लिए मुख्यधारा का मीडिया सोशल मीडिया पर रहने लग गया है।

पहले परम्परागत राजनीतिक कार्यकर्ता घर घर जाकर नेता का प्रचार करते थे और आज सोशल मीडिया पर आईटी सेल से जुड़े पेशेवर लोग आपके राजनेता और अपने क्लाएन्ट अर्थात् ग्राहक की छवि आपके सामने प्रस्तुत करते हैं।

मोदी की "चाय पर चर्चा" नीतीश के लिए "बिहारी बनाम बाहरी" और पंजाब में कैप्टन अमरिन्दर सिंह के लिए"काफी विद कैप्टन" तथा "पंजाब का कैप्टन" जैसे नारों का सोशल मीडिया पर वायरल हो जाना बताता है कि इस मीडिया का वाकई असर होता है।

फेसबुक, व्हाट्सएप्प, ट्वीटर या यूट्यूब जैसे माध्यमों पर राजनीतिक दलों का जैसा जोर है, उसके पीछे जनसंचार की एक थ्योरी काम कर रही है. इसके मुताबिक, लोग जानकारी के लिए या विचारों के लिए सीधे जनसंचार के किसी स्रोत पर कम ही निर्भर रहते हैं। आज की दुनिया में जिस तरह से फेक न्यूज़ का चलन बढ़ा है, लोग जानकारी समाज के ही किसी अन्य व्यक्ति से कन्फर्म करना पसंद करते हैं.

वह व्यक्ति ओपिनियन लीडर होता है, जिसकी बात सुनी और कई बार मानी जाती है. इसे टू स्टेप थ्योरी कहते हैं. सीधे मीडिया ने कुछ कहा या दिखाया और लोगों ने उसे मान लिया, अब यह कम होता है।

दरअसल भाजपा जैसे राजनीतिक दल जब सोशल मीडिया पर प्रचार करने पर इतना जोर दे रहे होते हैं, तब उनका मकसद इन ओपिनियन लीडर्स तक पहुंचना होता है।

कैम्ब्रिज एनेलिटिका जैसे प्रकरण बताते हैं कि सोशल मीडिया राजनीतिक दलों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। ओपिनियन लीडर्स के माध्यम से अपने पक्ष में माहौल बनाना आसान है, बनिस्बत पुराने तरीकों के इसलिए बहुत सोच—समझ कर इस मीडिया पर तथ्यात्मक होने के बजाए भावनात्मक होने को प्राथमिकता दी जाती है।

मोदी सरकार का यह नया कदम बताता है कि अब सोशल मीडिया पर माहौल उसके खिलाफ जा रहा है। लोग भावनात्मक मुद्दों से ऊबकर सरकारी दावों को हकीकत के धरातल पर परख रहे हैं, इसलिए मोदी सरकार उसे अपने हिसाब से नियंत्रित करना चाह रही है।

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