नर्मदा घाटी के सरदार सरोवर बांध से प्रभावित मछुआरों का प्रदर्शन, मध्य प्रदेश सरकार ने दो दिन पहले ही जाहिर की सरदार सरोवर जलाशय में बिक्री के ठेके की निविदा सूचना, मछुआरों की निविदा रद्द करने की मांग..

भोपाल से रोहित शिवहरे की रिपोर्ट

जनज्वार। नर्मदा घाटी के सरदार सरोवर बांध से प्रभावित मछुआरों ने प्रदर्शन किया। मध्यप्रदेश सरकार ने दो दिन पहले ही सरदार सरोवर जलाशय में बिक्री ठेके की निविदा सूचना जारी की। मछुआरे इस निविदा को रद्द करने की मांग कर रहे हैं।

मछुआरा मंसाराम का कहना है कि हमने 10 साल तक लड़कर सुप्रीम कोर्ट- हाईकोर्ट और मैदानी लड़ाई के द्वारा अपनी समिति का हक लिया है। हम परम्परागत और विस्थापित मछुआरे हैं। 2007 में मध्य प्रदेश सरकार ने विस्थापित मछुआरों और जलाशय के स्तर की यूनियन को प्राथमिकता देने का निर्णय लिया जिसका वृतांत उपलब्ध है और 2008 में लायी गयी मध्य प्रदेश सरकार की मत्स्य व्यवसाय नीति यही कहती है कि मछुआरों को ही प्राथमिकता देनी चाहिए, ना की बाहरी ठेकेदार या बाहरी मछुआरों को।

वे आगे कहते हैं, ‘हम मछुआरों की 31 समितियां सरकारी सिद्धांत पर पंजीकृत हो चुकी हैं। उन समितियों का एक संघ मध्य प्रदेश राज्य की मत्स्य व्यवसाय नीति के अनुसार प्रस्तावित है।’

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बता दें कि निविदा सूचना जारी हो चुकी है जिसमें सभी बाहरी व्यक्तियों और संस्थाओं को आमंत्रित किया गया है कि वह 13 जनवरी तक टेंडर भरकर और 10 लाख की टेंडर फीस का भुगतान करते हुए इस प्रक्रिया में शामिल हो जाएं।

विक्रम बर्मन कहते हैं, ‘मछली पर रॉयल्टी तो वह भी सरकार को दे सकते हैं लेकिन टेंडर भरना और फी देना तथा जलाशय बड़ी रकम अदा करके ले लेना, ये उनसे कभी नहीं हो सकता है, न हीं यह उनके लिए जरूरी लगता है। यह निविदा सूचना नीति और नियमों के खिलाफ है और मध्य प्रदेश शासन ने चुनाव के दौरान तथा चुनाव आने के बाद जो आश्वासन दिये हैं उन आश्वासनों का भी इसमें उल्लंघन हो रहा है।

गुरुवार 26 दिसंबर को करीब 20 मछुआरा सहकारी समितियों के 100-150 प्रतिनिधियों और नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेता मेधा पाटकर ने अन्य कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर बड़वानी के संचालक मत्स्य व्यवसाय विभाग में पहुँचकर ज्ञापन दिया। इस दौरान दिल्ली से आयी वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता शबनम हाशमी भी मछुआरों के समर्थन के लिए मौजूद थी।

धरमपूरी, चिखल्दा, पिपलूद, सेमल्दा, बिजासन, दतवाडा, गांगली, राजघाट आदि गाँवों के मछुआरों के प्रतिनिधियों ने अधिकारियों के सामने अपना आक्रोश जताया और कहा कि तत्काल भोपाल के संबंधित अधिकारी और मंत्री जी को खबर करते हुए निविदा सूचना रद्द करवाई जाए।

पिछोड़ी गाँव की मछुआरा श्यामा कहती हैं, ‘किसानों को पुनर्वास में जो जमीन दी जा रही है वह अगर उनके लिए सोना है तो नदी हमारे लिए चांदी है। नदी हमारी खेती है। उन्होंने कहा कि मछुआरों को बेरोजगार करने का यह कदम धोखाधड़ी का है और हम इसे नामंजूर करते हैं।

मोहिपुरा के मछुआरे अशोक कहते हैं, ‘आज भी वह टिन शेड में पड़े हुए हैं। वहां उनके लिए कोई रोजगार नहीं है तो मोहिपुरा में उनकी समिति आज निष्क्रिय हो चुकी है। ऐसी स्थिति में अब पानी भरने के बाद जलाशय में मत्स्याखेट का अधिकार उनको मिलना बेहद जरूरी है, नहीं तो उनका पुनर्वास नहीं हो पायेगा।

शबनम हाशमी ने कहा कि मछुआरों का हक उन्हें नीति अनुसार मिलना चाहिए और उनके पास आजीविका का दूसरा कोई साधन नही है। मत्स्य व्यवसाय को ही आजीविका के रूप में देकर पुनर्वास करना न्यायपूर्ण होगा। मध्य प्रदेश सरकार द्वारा इसके खिलाफ लायी हुई निविदा सूचना तत्काल रद्द होना जरुरी है।

पत्रकार शबनम हाशमी

मेधा पाटकर ने कहा, ‘नर्मदा ट्रिब्यूनल के फैसले के अनुसार अंतर्राज्यीय परियोजना होते हुए भी जलाशय में व्यवसाय का निर्णय मध्य प्रदेश सरकार सरकार ही कर रही है जबकि जबकि मध्य प्रदेश की नीति कहती है कि विस्थापित मछुआरों को ही प्राथमिकता दी जानी चाहिए। अन्य जलाशयों में ठेकेदारों के द्वारा जो हो रहा है वो शोषण हमें नामंजूर है।

मेधा पाटकर ने आगे बताया कि मध्य प्रदेश के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ भोपाल में जो चर्चा  हुई थी उसमें नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण के अतिरिक्त मुख्य सचिव गोपाल रेड्डी ने भी आश्वासित किया था कि मछुआरों को ही हक दिया जाएगा। यही बात नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण के आयुक्त ने भी की थी। नर्मदा घाटी विकास मंत्री सुरेन्द्र सिंह बघेल ने भी यही बात क्षेत्र में कई बार दोहराई थी। इसके बावजूद मछुआरों के खिलाफ निर्णय लेना वादाखिलाफी है। अगर निविदा सूचना तत्काल रद्द नहीं की गई तो उसके खिलाफ हमें लड़ना पड़ेगा

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मत्स्य व्यवसाय विभाग बड़वानी के संचालक महेंद्र पानखेड़े ने कहा, ‘मैं मछुआरों का दर्द और आक्रोश समझता हूँ। यह आवेदन भोपाल के उच्च अधिकारियों तक तत्काल पहुंचाने का कार्य करेंगे और वह भी जानते हैं कि मछुआरे मेहनतकश हैं और उन्हें पीढ़ियों से मछली मारने का अनुभव है, उन्हें ही जलाशय देने से मत्स्याखेट का उत्पादन अधिक से अधिक होगा।’

मेधा पाटकर ने बर्गी बांध की हकीकत बयां करते हुए संचालक महेंद्र पानखेड़े के सामने आंदोलन की तरफ से बात रखी कि बर्गी बांध में भी 54 सहकारी समितियां चलाकर दिखाई थी और अच्छा उत्पादन लेने वाले मछुआरों का हक जब छीन लिया गया तब ठेकेदार ने कम से कम उत्पादन किया और सरकार को घाटे में धकेल दिया। इसीलिए सरदार सरोवर जलाशय में इंदिरा सागर जलाशय के जैसे ठेकेदार आये और 100 या 120 किलो के बदले 24 या 30 रुपये किलो मछुआरों से मछली खरीदकर लूट मचाये तो यह हम मंजूर नहीं और अगर सरकार ने सही निर्णय नहीं लिया तो लड़ाई तेज करेंगे।

Edited By :- janjwar team

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