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चीफ जस्टिस रंजन गोगोई पर लगे यौन उत्पीड़न की जांच के लिए समिति गठित

Prema Negi
24 April 2019 11:47 AM GMT
चीफ जस्टिस रंजन गोगोई पर लगे यौन उत्पीड़न की जांच के लिए समिति गठित
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यौन उत्पीड़न मामले में जस्टिस बोबडे और दो अन्य जज करेंगे जाँच, मगर 33 बुद्धिजीवियों-सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इसकी जांच के लिए स्वतंत्र कमेटी बनाने की रखी मांग, कहा जांच पूरी होने तक सीजेआई रहें प्रशासनिक कामकाज से दूर...

वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट

मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने अपने ऊपर लगे यौन उत्पीड़न के आरोपों को जिस तरह शनिवार 20 अप्रैल को एक विशेष पीठ बनाकर स्वयं को क्लीनचिट देने का प्रयास किया, उसकी विधिक और न्यायिक क्षेत्रों में कड़ी प्रतिक्रिया हुई। उच्चतम न्यायालय द्वारा स्वयं बनाई गयी प्रक्रिया के तहत जाँच की मांग बहुत बड़े पैमाने पर उठी। अंततः मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के खिलाफ लगे यौन उत्पीड़न के आरोपों की आंतरिक जांच के लिए मंगलवार 23 अप्रैल को उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठतम न्यायाधीश न्यायमूर्ति एसए बोबडे को नियुक्त किया गया।

न्यायमूर्ति बोबडे मुख्य न्यायाधीश के बाद वरिष्ठतम न्यायाधीश हैं। न्यायमूर्ति बोबडे ने उच्चतम न्यायालय के दो न्यायाधीशों न्यायमूर्ति एनवी रमन और न्यायमूर्ति इंदिरा बनर्जी को शामिल कर एक समिति गठित की है। न्यायमूर्ति रमन वरिष्ठता में न्यायमूर्ति बोबडे के बाद हैं और न्यायमूर्ति बनर्जी को इसलिए शामिल किया गया है, क्योंकि वह महिला न्यायाधीश हैं।

उच्चतम न्यायालय के वकीलों के दो संगठनों ने कहा था कि यौन उत्पीड़न की शिकायत मिलने के बाद मुख्य न्यायाधीश ने जिस तरह कुछ जजों की बैठक बुलाई थी और उसकी अध्यक्षता भी खुद ही की थी, वह ग़लत था। इसके अलावा लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता और पूर्व न्यायाधीश,वरिष्ठ अधिवक्ता आदि महत्वपूर्ण लोगों ने इस मामले की उच्चस्तरीय जाँच कराने की माँग की थी।

उच्चतम न्यायालय के वकीलों की दो शीर्ष संस्थाओं ने मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई द्वारा खुद के खिलाफ लगे अमर्यादित आचरण के आरोपों से निपटने के तरीके को अनुचित बताया है। सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (एससीबीए) और सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड एसोसिएशन (एससीएओआरए) ने पूर्ण पीठ से आरोपों की निष्पक्ष जांच के लिए आवश्यक कदम उठाने का आग्रह किया है।

जस्टिस गोगोई के खिलाफ शनिवार 20 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट की एक पूर्व कर्मचारी ने आरोप लगाए थे। वह जस्टिस गोगोई के मुख्य न्यायाधीश बनने के बाद अक्टूबर में दिल्ली स्थित उनके आवासीय कार्यालय में काम करती थी। तीन सदस्यीय पीठ की अध्यक्षता करते हुए मुख्य न्यायाधीश ने इस मामले पर आपात सुनवाई करते हुए अपने खिलाफ लगे आरोपों को ‘अविश्वसनीय’ बताया था।

एससीबीए ने अपनी कार्यकारी समिति की आपात बैठक के बाद बयान में कहा बिना किसी पक्षपात के शुरू की जा सकने वाली जांच के लिए पूर्ण पीठ को इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट, सोशल मीडिया और अन्य स्नोतों पर आरोपों के संबंध में उपलब्ध सभी सामग्रियों और तथ्यों को अगली बैठक में सुनवाई के लिए समेटना चाहिए।

एससीबीए के सचिव विक्रांत यादव ने कहा है कि सीजेआई के खिलाफ लगाए गए आरोपों की सुनवाई के लिए 20 अप्रैल को अपनाई गई प्रक्रिया कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के साथ ही साथ स्वाभाविक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ भी है, जबकि एससीएओआरए ने सोमवार 22 अप्रैल को पारित प्रस्ताव में कहा, ‘सुप्रीम कोर्ट की पूर्व कर्मचारी द्वारा लगाए गए ओरोपों पर स्थापित प्रक्रिया के तहत सुनवाई होनी चाहिए और प्रत्येक मामले में समान रूप से कानून को लागू किया जाना चाहिए।’ एसोसिएशन ने आरोपों की निष्पक्ष जांच के लिए फुल कोर्ट की अध्यक्षता में एक कमेटी के गठन की भी मांग की है।

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इसके साथ ही लेखिका अरुंधति राय, सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर और अरुणा राय जैसे 33 मशहूर लोगों ने एक साझे बयान में माँग की है कि मुख्य न्यायाधीश पर लगे आरोपों की निष्पक्ष जाँच के लिए स्वतंत्र कमेटी बनाई जानी चाहिए।

साझे बयान में यह भी कहा है कि जब तक इन आरोपों की जाँच पूरी नहीं हो जाती, मुख्य न्यायाधीश हर तरह के प्रशासनिक कामकाज से दूर रहें क्योंकि शिकायत करने वाली महिला ने जिन प्रत्यक्षदर्शियों के नाम लिए हैं, उनमें से ज़्यादातर अदालत में काम करते हैं। इस बयान पर एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया के कार्यकारी निदेशक आकार पटेल, हर्ष मंदर, पी साइनाथ, योगेंद्र यादव और दूसरे मशहूर और महत्वपूर्ण लोगों के दस्तख़त हैं।

यौन उत्पीड़न के मामले में अब महिला वकीलों के संगठन 'वुमेन इन क्रिमिनल लॉ एसोसिएशन' ने भी एक बयान जारी किया है। बयान में कहा गया है कि दर्जे और ताकत में इतना अंतर होने की वजह से हमें लगता है कि आरोप की जांच के दौरान मुख्य न्यायाधीश को अपने पद पर नहीं रहना चाहिए। यौन उत्पीड़न के ऐसे आरोप लगने पर जांच का तरीका और क़ायदा इसी अदालत ने तय किया था, पर फ़िलहाल वो इसे लागू नहीं कर रहा है।

यौन उत्पीड़न की रोकथाम के लिए बनाए गए क़ानून 'सेक्सुअल हैरेसमेंट ऑफ़ वुमेन ऐट वर्कप्लेस (प्रिवेन्शन, प्रोहिबिशन एंड रिड्रेसल)' 2013 का हवाला देकर अब न सिर्फ़ इस आरोप की निष्पक्ष जांच की मांग की जा रही है, बल्कि मुख्य न्यायाधीश के जांच के दौरान पद छोड़ने की मांग भी उठ गई है।

मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई ने एक तीन सदस्यीय पीठ के साथ शनिवार 20 ​अप्रैल को ख़ुद पर लगे यौन उत्पीड़न के आरोपों की सुनवाई की और इन आरोपों को ग़लत बताया। कई महिला वकीलों ने इस तरह की सुनवाई को यौन उत्पीड़न की शिकायत के लिए तय प्रक्रिया का उल्लंघन बताया है।

बेटे व दामाद के आयकर रिटर्न्स का खुलासा करें

दरअसल यह यह पूरा मामला यौन उत्पीड़न से भी ज्यादा गम्भीर हो गया है। इसका अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि यतीन ओझा ने रंजन गोगोई को पर काफ़ी गंभीर आरोप लगाए हैं। यतीन ओझा ने कहा है कि जज सरकार से नहीं डरते हैं, बल्कि वे आपसे डरते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि यदि उन्होंने आपके ज़रिए सरकार को नाराज़ कर दिया तो सरकार उन्हें इसकी सज़ा देगी।

ओझा ने मुख्य न्यायाधीश से कहा है कि वह अपने बेटे और दामाद की आयकर रिटर्न्स का खुलासा करें, जिन्होंने अरबों रुपये कमाए हैं। गोगोई ने शनिवार 20 अप्रैल की बैठक के बाद कहा था कि इतनी लंबी न्यायिक सेवा के बाद उनके बैंक खाते में 6.80 लाख रुपये हैं, उनसे ज़्यादा पैसे तो उनके चपरासी के पास हैं।

क्या है मामला?

उच्चतम न्यायालय की एक 35 वर्षीया महिला जूनियर क्लर्क ने 19 अप्रैल को अदालत के 22 जजों को एक चिट्ठी लिखी। उन्होंने उसमें कहा कि 10 और 11 अक्टूबर 2018 को जब वह रंजन गोगोई के घर पर थी, गोगोई ने उसके साथ अभद्र व्यवहार (सेक्सुल अडवांसेज) किया था, जिसका उन्होंने विरोध किया था। वह गोगोई के आवासीय कार्यालय में अगस्त 2018 से काम कर रही थी, इस घटना के बाद उन्हें वहाँ से हटा दिया गया। दो महीने बाद 21 दिसंबर, 2018 को उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया। उन्हें नौकरी से निकालने के लिए जो तीन कारण बताए गए थे, उनमें एक यह भी था कि उसने पूर्व स्वीकृति के बग़ैर ही एक दिन की आकस्मिक छुट्टी ले ली थी।

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