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विमर्श

प्रधानमंत्री जी कश्मीर से आतंकवाद खत्म हो न हो, कश्मीरियत जरूर खत्म हो जायेगी!

Prema Negi
9 Aug 2019 4:30 PM GMT
प्रधानमंत्री जी कश्मीर से आतंकवाद खत्म हो न हो, कश्मीरियत जरूर खत्म हो जायेगी!
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सरकारों को आतंकवाद केवल कश्मीर में ही आता है नजर, उन्मादी समूह द्वारा देश में मारे जा रहे लोगों पर नहीं बोलता कोई, कभी गाय, कभी जय श्री राम तो कभी डायन के नाम पर पूरे देश में हिंसा का जो सिलसिला चल रहा है, वह किसी आतंकवाद से नहीं है अलग...

महेंद्र पाण्डेय का विश्लेषण

नोटबंदी के समय का प्रधानमंत्री जी का भाषण याद कीजिये। प्रधानमंत्री जी बड़े गर्व से आतंकवाद ख़तम करने का आश्वासन दे रहे थे। काश्मीर पर फिर से प्रधानमंत्री ने देश को बताया और इसमें भी वही राग अलापा, आतंकवाद ख़त्म हो जाएगा। जैसे नोटबंदी से आतंकवाद ख़त्म नहीं हुआ, बल्कि लाइनों में लोग दम तोड़ते रहे, बेरोजगारी बेतहाशा बढ़ गयी, छोटे उद्योग बंद हो गए और इसका नकारात्मक असर आज तक देश की आम जनता भुगत रही है, ठीक वैसे ही आतंकवाद फिर नहीं ख़त्म होगा, पर कश्मीर से कश्मीरियत गायब हो जायेगी।

स बार जम्मू और कश्मीर को केंद्र शासित प्रदेश बनाने के बाद यही कहा जा रहा है की जल्दी ही इसे वापस राज्य का दर्जा दे दिया जाएगा। नोटबंदी के बाद भी 50 दिनों का समय दिया गया था। हालत यह है कि उस समय की मार 50 दिनों तो क्या 5 वर्षों में भी नहीं जायेगी। यही हाल जम्मू और कश्मीर का भी होने वाला है।

श्मीर में जो कुछ किया गया, वह नोटबंदी जैसा ही था। विपक्ष को कुछ नहीं पता, संसद को कुछ नहीं पता और जनता को कुछ नहीं पता – बस एक हुक्म आया, जिसकी तामील आपको करनी है। जरा कल्पना कीजिये, किसी मोहल्ले में किसी घर का। इस घर को बाहर से चारों तरफ से बंद कर दिया गया है, चारों दिशाओं में घर की तरफ मुंह किये टैंक खड़े हैं, घर से फ़ोन और मोबाइल हटा दिया गया है – और बाहर लाउडस्पीकर से मोहल्ला प्रधान लाउडस्पीकर से कह रहा है कि घर के निवासियों को चिंता करने की जरूरत नहीं है, हम आपकी सुरक्षा के लिए काम कर रहे हैं।

दूसरी तरफ घर के अन्दर के लोग भूख, प्यास और बीमार होकर मर रहे हैं। प्रधानमंत्री जी को वहां फ़िल्में बनाने की चिंता है। उन्होंने कहा, पहले यहाँ खूब सारी फिल्मों की शूटिंग होती थी। इसका सीधा सा मतलब है कि जब अनुच्छेद 370 था तब भी वहां फ़िल्में बनतीं थीं, फिर अब फिल्मों की शूटिंग के लिए इसे हटाने की क्या जरूरत थी?

तंकवाद का सबसे बड़ा कारण जल, जंगल और जमीन है। जिस तरीके से प्रधानमंत्री वहां उद्योगपतियों का आह्वान कर रहे हैं, उससे तो यही लगता है की कश्मीर अब एक नए संघर्ष की तरफ अग्रसर होगा, क्योंकि वहां कुछ उद्योगपतियों का एकाधिकार हो जाएगा, प्रदूषण से अनजान जनता अब प्रदूषण की मार झेलेगी और जो परम्परागत बाजार है वह बदल जाएगा। डल झील के शिकारे पर कब्जा जमाने बड़े उद्योगपति कूद पड़ेंगे। स्थानीय हस्तशिल्प पर बड़े लोगों का कब्जा होगा और कारीगर इनके गुलाम होंगे। यदि, ऐसा हुआ तो कश्मीर के परम्परागत आतंकवाद के साथ-साथ झारखंड या फिर छत्तीसगढ़ जैसा आतंकवाद भी पनपने लगेगा।

श्चर्य यह है कि सरकारों को आतंकवाद केवल कश्मीर में ही नजर आता है। उन्मादी समूह द्वारा देश में मारे जा रहे लोगों पर कोई नहीं बोलता। कभी गाय के नाम पर, कभी जय श्री राम के नाम पर तो कभी डायन बताकर पूरे देश में हिंसा का जो सिलसिला चल रहा है, क्या वह किसी आतंकवाद से अलग है? उन्नाव में जो कुछ बीजेपी के तत्कालीन विधायक ने किया क्या वह आतंकवाद नहीं है? सेंगर ऐसे मामलों में अकेला नहीं है, ऐसे आतंकवादियों की एक लम्बी लिस्ट है।

प्रधानमंत्री ने विस्तार से बताया कि कश्मीर के सरकारी कर्मचारियों को क्या सुविधाएं मिलेंगी, पुलिस बल को क्या मिलेगा, पर उस भाषण में जनता कहाँ थी? ग्रामपंचायतों के सरपंच बहुत अच्छा काम कर रहे हैं, यह पूरे दुनिया को बताया गया, पर जिस अच्छे काम की बात की जा रही थी वह तो अनुच्छेद 370 के समेत ही हो रहा था।

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