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तनाव और घुटन की चपेट में कश्मीरी, लगातार बढ़ रहे हैं मानसिक रोगी

Prema Negi
31 Oct 2019 2:20 AM GMT
तनाव और घुटन की चपेट में कश्मीरी, लगातार बढ़ रहे हैं मानसिक रोगी
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सरकारी बंदी और प्रतिबंध जब 5 अगस्त को शुरू हुआ, तब उसके एक सप्ताह के भीतर ही मानसिक रोगियों की संख्या बढ़ने लगी तेजी से, लोग होने लगे हैं भावविहीन, डॉ. अजीज अहमद खान कहते हैं पहले उनके क्लीनिक में प्रतिदिन 70 से 80 मानसिक रोगी आते थे, पर अब उनकी संख्या पहुँच गयी है 130 से 150 तक...

महेंद्र पाण्डेय की टिप्पणी

ब ऐसी समस्याओं से लोग लम्बे समय तक घिरे रहते हैं, जिनका निदान उनके पास नहीं होता, तब मानसिक समस्याएं, अवसाद, तनाव और चिंता उस आबादी पर हावी होने लगती है। हांगकांग में लम्बे समय से चले आ रहे आन्दोलनों की यही परिणति है और अब कश्मीर में भी ऐसा ही हो रहा है।

हांगकांग में लम्बे समय से संघर्ष के बाद भी कोई हल नहीं निकलने से आन्दोलनकारी मानसिक समस्याओं से घिर गए हैं और अनेक आन्दोलनकारी आत्महत्या की तरफ मुड़ रहे हैं। आन्दोलनकारियों के अलावा सामान्य आबादी भी लगातार चलते आंदोलनों से लगातार प्रभावित होती जा रही है और इसमें भी मानसिक परेशानियां बढ़ रही हैं।

श्मीर में लगभग तीन महीने से सबकुछ बंद है, चारों तरफ सेना और अर्धसैनिक बलों का जमावड़ा है, किसी को पता नहीं कि कब उसे जेल में बंद कर दिया जाएगा या फिर यातनाएं दी जायेंगी। लोग अपने सगे-सम्बन्धियों से नहीं मिल पा रहे हैं, कुल मिलाकर सामान्य जनजीवन पूरी तरह से ठप्प है। अनेक खबरें ऐसी आई थीं जिनके अनुसार लोगों को चिकित्सा की सुविधाएं और दवाएं भी नहीं मिल रहीं हैं। इन सबके बीच, तनाव, भविष्य की चिंता और डर का साया कश्मीरियों को मानसिक रोगों की चपेट में ले रहा है।

श्मीर लम्बे समय से संकटग्रस्त क्षेत्र रहा है, आतंकवादी और सुरक्षाकर्मी लम्बे समय से इस क्षेत्र में सक्रिय रहे हैं और अधिकतर निरपराध लोग इन सबकी चपेट में रहे हैं। बंद और आन्दोलनों का भी सामान्य जीवन पर असर पड़ा है। जाहिर है, वहां के लोग मानसिक तौर पर परेशान होंगे।

कश्मीर की आबादी का करीब 45 फीसदी है किसी न किसी मानसिक ​बीमारी का शिकार

र्ष 2015 में मेडिसिन्स सैंस फ्रंटियर्स नामक संस्था ने कश्मीर में सर्वेक्षण के बाद पाया कि लगभग 41 प्रतिशत आबादी डिप्रेशन की शिकार है, 26 प्रतिशत आबादी चिंता की शिकार है और 19 प्रतिशत आबादी में आघात के बाद के तनाव के लक्षण हैं। कुल 18 लाख वयस्क आबादी में से 45 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या विभिन्न मानसिक अवसादों का शिकार थी। पर अगस्त 2019 के सरकारी प्रतिबंध के बाद मानसिक रोग से उबर चुके लोगों में भी फिर से इन रोगों ने डेरा बना लिया और साथ ही नए रोगियों की संख्या भी तेजी से बढ़ी है।

श्रीनगर के श्री महाराजा हरी सिंह हॉस्पिटल में मानसिक रोगों के विशेषज्ञ डॉ. अजीज अहमद खान के अनुसार यह स्थिति लगातार और खराब होती जा रही है। सरकारी बंदी और प्रतिबंध जब 5 अगस्त को शुरू हुआ, तब उसके एक सप्ताह के भीतर ही मानसिक रोगियों की संख्या तेजी से बढ़ने लगी। लोग भावविहीन होने लगे हैं। डॉ. अजीज अहमद खान के अनुसार पहले उनकी क्लिनिक में प्रतिदिन 70 से 80 मानसिक रोगी आते थे, पर अब उनकी संख्या 130 से 150 तक पहुँच गयी है।

ह हालत तब है, जब दूर के क्षेत्रों से लोग श्रीनगर नहीं आ पा रहे हैं और अधिकतर लोग घर से बाहर निकलना ही नहीं चाहते। सबसे बुरी हालत तो महिलाओं की है, क्योंकि तनाव और समस्याओं के कारण वे घर से बाहर आ ही नहीं रही हैं।

मानसिक रोगों के इलाज के क्षेत्र में प्राइवेट प्रैक्टिस करने वाले डॉ. अब्दुल हमीद के अनुसार कश्मीर के लोगों में सरकारी प्रतिबन्ध के बाद से चिंता, तनाव और आघात के बाद तनाव के मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है, पर इनमें से कुछ को ही इलाज के अवसर मिल पा रहे हैं। सेना की लगातार मौजूदगी और बेगुनाहों पर अत्याचार और जेल में डाले जाने के कारण यह स्थिति लगातार गंभीर होती जा रही है।

दुनियाभर के देशों में जिस तरह से कट्टरपंथियों, स्वघोषित राष्ट्रवादियों और लोकतंत्र में तानाशाहों का वर्चस्व बढ़ता जा रहा है, उसमें संभव है आने वाले वर्षों में शारीरिक रोगों की तुलना में मानसिक रोगों से त्रस्त आबादी की संख्या अधिक हो जाये। जब शासन ही असामान्य और मानसिक रोगों से घिरे लोगों के हाथ में आ जाए तब जनता के हालात का अंदाजा लगाना कठिन नहीं है।

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