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सीजेआई से पत्रकार पूछें सवाल अब डेमोक्रेसी बचाने और डेंजर से बचने के लिए क्या किया जा रहा है : इंदिरा जयसिंह

Prema Negi
18 April 2019 5:02 AM GMT
सीजेआई से पत्रकार पूछें सवाल अब डेमोक्रेसी बचाने और डेंजर से बचने के लिए क्या किया जा रहा है : इंदिरा जयसिंह
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जब 'कारवां' ने जज लोया की मौत से जुड़ी खबर को प्रकाशित किया तो पूरे देश में हलचल मची। उसके बाद एक बड़े अखबार ने इस स्टोरी को दबाने के लिए स्टोरी की। ये एक बड़ा झटका था कि जो अख़बार साहसी पत्रकारिता का दावा करता है वही एक संदिग्ध मौत के मामले में नये सवाल उठाने की बजाय उस स्टोरी में क्या कमियां हैं इसे उजागर करता है....

नई दिल्ली, जनज्वार। देश की राजनीति और व्यवस्था का सच क्या है, यह ‘सत्ता की सूली’ पुस्तक में दर्ज है। यह पुस्तक तीन पत्रकारों महेंद्र मिश्रा, प्रदीप सिंह और उपेंद्र चौधरी ने लिखी है। यह पुस्तक जज लोया समेत कई संदिग्ध मौतों की कहानी हमारे सामने रखती है। सत्ता के परत दर परत सच को खोलने वाली पुस्तक ‘सत्ता की सूली’ पुस्तक का विमोचन 15 अप्रैल को दिल्ली प्रेस क्लब तो 16 अप्रैल को अहमदाबाद के सरदार पटेल स्मृति भवन किया गया।

दिल्ली प्रेस क्लब में पुस्तक का विमोचन करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस बीजी कोलसे पाटिल ने कहा कि “न्यायपालिका को सिर्फ़ फ़ैसला नहीं देना चाहिए, बल्कि फ़ैसले में न्याय हुआ है ये भी दिखना चाहिए। हम तो हमेशा कहते हैं कि न्यायपालिका हमेशा न्याय नहीं करती है। कभी-कभी सिर्फ़ जजमेंट होता है और उसमें न्याय नहीं होता। लोया का केस इसका उदाहरण है।”

अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए जस्टिस कोलसे पाटिल ने कहा कि सत्ता से डरने की बजाय उससे संघर्ष करने की जरूरत है। सरकार बहुत करेगी आपको कुछ दिन जेल में डाल देगी। लेकिन इससे डरना नहीं है। लोग अपने को अमेरिका और इग्लैंड रिटर्न कहते हैं लेकिन मैं अपने को जेल रिटर्न कहता हूं। जनता के हित में संघर्ष करते रहिए, कभी न कभी सफलता मिलेगी।

इस पूरे प्रकरण में पीड़ित और गवाह नागपुर से आये अधिवक्ता सतीश यूके ने कहा कि जब सुप्रीम कोर्ट में जज लोया की मौत से जुड़े रिकॉर्ड को एक-एक करके जमा कराया जा रहा था। तभी मुझे संदेह हुआ और हमने जज लोया की मौत से जुड़े ढेर सारे दस्तावेजों को बचा लिया, क्योंकि मुझे पता था कि इस केस का क्या हश्र होने वाला है। अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा कि जज लोया मामले से जुड़े होने के कारण महाराष्ट्र सरकार ने उनको बहुत परेशान किया। उन्होंने सीधा आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री देवेंद्र फणनवीस के लोगों ने उन्हें धमकी दी, प्रशासन ने परेशान किया। उन पर जानलेवा हमले हुए।

सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने कहा कि यह किताब उन तमाम कड़ियों को जोड़ती है जिसमें एक एक मौत के बाद दूसरी मौत होती चली जाती है। उन्होंने लोकतंत्र और उसके ख़तरों का जिक्र करते हुए सुप्रीम कोर्ट के चार जजों का बाहर आकर प्रेस कॉन्फ्रेंस करने को भी याद किया और कहा कि आज उनमें से एक जज हमारे चीफ जस्टिस हैं, जिन्होंने उस समय डेमोक्रेसी को डेंजर बताया था। इस बात को पूरे देश ने महत्व दिया था। उन्होंने पत्रकारों से कहा कि वे चीफ जस्टिस से ये सवाल ज़रूर पूछें कि आज भी वही डेमोक्रेसी और वही डेंजर है जो जनवरी, 2018 में था लेकिन वे आज इसे बचाने के लिए क्या कर रहे हैं।

वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश ने चिंता जताई कि आज मीडिया में फॉलोअप स्टोरी नहीं हो रही है। जज लोया से जुड़ी स्टोरी को जब कारवां पत्रिका ने प्रकाशित किया तो पूरे देश में हलचल मची। उसके बाद एक बड़े अखबार ने इस स्टोरी को दबाने के लिए स्टोरी की। ये एक बड़ा झटका था कि जो अख़बार साहसी पत्रकारिता का दावा करता है वही एक संदिग्ध मौत के मामले में नये सवाल उठाने की बजाय उस स्टोरी में क्या कमियां हैं इसे उजागर करता है। उन्होंने हिन्दी पत्रकारों से खोजी पत्रकारिता और फॉलोअप स्टोरी पर ध्यान देने की अपील की।

पूर्व आईपीएस विकास नारायण राय ने क्रिमिनल प्रोसीजर में कमियों और राज्य के नजरिये में कमी को फोकस करते हुए बताने की कोशिश की कि कैसे अपराधी छूट जाते हैं। इस मामले में उन्होंने पूरी प्रणाली पर फिर से विचार करने की जरूरत पर बल दिया।

भाकपा-माले नेता कविता कृष्णन ने लोया मामले की शुरुआत का जिक्र करते हुए बताया कि कैसे जब आप किसी पीड़ित को न्याय दिलाने के लिए आवाज उठाते हैं तो सत्ता से जुड़े लोग आपकी आवाज को दबाने के लिए आपको बदनाम करने लगते हैं।

अहमदाबाद के सरदार पटेल स्मृति भवन में "सत्ता की सूली" पुस्तक के विमोचन समारोह में मशहूर गुजराती लेखक एवं निरीक्षक पत्रिका के संपादक प्रकाश शाह, पूर्व आईपीएस और लेखक राजन प्रियदर्शी, शिक्षा के क्षेत्र में कार्य करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता सुखदेव पटेल, पाटीदार अनामत आंदोलन के अतुल पटेल और मजदूर पंचायत के नेता जयंती पंचाल मौजूद थे।

शुरुआत में जनचौक के संपादक महेंद्र मिश्र ने पुस्तक का संक्षेप में विवरण दिया। जज लोया की संदिग्ध मौत को लेकर सबसे पहले कारवां मैगज़ीन ने खुलासा किया था। शुरू में हम लोग फॉलो अप स्टोरी कर रहे थे।, लेकिन कुछ समय बाद जब मालिकान के दबाव में कारवां ने उन खबरों से किनारा करना शुरू किया तब आगे की जिम्मेदारी जनचौक ने संभाली। हालांकि बाद में मजबूरी बस ही सही कारवां को भी खबरें छापनी पड़ीं। मिश्र ने आगे बताया इस पुस्तक में हमारा अपना कोई विचार नहीं है, सबकुछ तथ्यों, दस्तावेजों तथा प्रकाशित खबरों पर आधारित है।

पहले हम अपने आप को केवल जज लोया तक सीमित रखना चाहते थे, परंतु सारा मामला हरेन पांड्या और दूसरे कुछ पीड़ितों से जुड़ा हुआ था। इस मामले में सीधे-सीधे कुछ व्यक्तियों पर आरोप थे। लिहाजा पंड्या और लोया के बीच और उससे आगे की दूसरी मौतें मसलन सोहराबुद्दीन, कौसर बी, तुलसीराम प्रजापति, एडवोकेट श्रीकांत खंडेलकर, रिटायर्ड जज प्रकाश थ्रोम्बे की मौतें भी इसी कड़ी का हिस्सा बन गयीं। किताब में सारी चीजें डॉक्यूमेंट के आधार पर दी गयी हैं।

प्रकाश शाह ने कहा कि "इसे किताबी शक्ल देना एक बुनियादी कार्य है।" शाह ने प्रशांत दयाल द्वारा जगृति पांड्या के पत्र का हवाला देते हुए कहा कि “सत्ता के दबाव में परिवार के लोगों ने घटना को भूल जाना ही बेहतर समझा। ऐसे में कुछ लोगों ने (पत्रकार) पूरी घटना की कड़ी को जोड़ कर दस्तावेज़ तैयार किया है। यह एक बड़ा कार्य हुआ।" सुखदेव पटेल ने “सत्ता की सूली” किताब लिखे जाने को ऐतिहासिक कार्य बताते हुए लेखकों को बधाई दी।

पाटीदार नेता अतुल पटेल ने सत्ता में बैठे लोगों को दमनकारी बताते हुए कहा कि अहिंसा के राज्य में इन लोगों ने हिंसा के रास्ते से सत्ता में पकड़ बनाई है। हम लोग आंदोलनकारी हैं, लेकिन हमने किसी को पत्थर नहीं मारा है, फिर भी सरकार ने मेरे खिलाफ 19-19 धाराओं में मुक़दमा दर्ज किया है। इनके कारण ईमानदार पत्रकार मुख्यधारा से हटकर पोर्टल के माध्यम से आवाज़ें उठा रहे हैं, हम लोग ऐसे पत्रकारों के साथ हैं।"

राजन प्रियदर्शी ने अपने पुलिस में रहने के दौरान नरेंद्र मोदी समेत सत्ता में बैठे लोगों से जुड़ी कई घटनाओं का जिक्र किया। उन्होंने यह बताने की कोशिश की कि सत्ता कैसे पुलिस का दुरुपयोग करती है। अपने तजुर्बे को साझा करते हुए उन्होंने इस किताब के लेखन को हिम्मतवाला कार्य बताया।

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