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विमर्श

गन्ना उद्योग तभी बचेगा जब पहले गन्ना किसान बचाने की योजना बने

Janjwar Team
19 Jun 2018 5:08 AM GMT
गन्ना उद्योग तभी बचेगा जब पहले गन्ना किसान बचाने की योजना बने
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उद्योगपति सरकारी सब्सिडी का लाभ कभी किसानों को नहीं देता। सरकारी सहयोग तथा मिलों से प्राप्त लाभ को उद्योगपति मिलों के आधुनिकीकरण पर खर्च की औपचारिकता कर पूंजी का अन्यत्र स्थानांतरण करता है और बार—बार सरकारी सहयोग की याचना करता है...

आनन्द किशोर

केन्द्र सरकार ने 'जिन्ना हारा, गन्ना जीता' के उछलते नारों के बीच ही चीनी उद्योग के लिए एक बड़ा ऐलान करते हुए 8500 करोड़ का भारी-भरकम पैकेज घोषित किया है। इसे गन्ना किसानों के हित में बताते हुए प्रचारित किया जा रहा है।

यह समय बतायेगा कि किसानों के 22000 करोड़ बकाये गन्ना मूल्य का भुगतान उद्योगपति कब तक करता है। पूर्व में दिये गए राहत पैकेज को भी किसान हित में ही बताया गया था और उसका जो लाभ मिला प्रत्यक्ष नहींं है। हाल के घोषित पैकेज से भी किसानों को बहुत खुश होने का कोई वजह नहीं मालूम पड़ती। लगता है सरकारी पक्ष के चुनावी हार की बेचैनी को भुनाने में चीनी लॉबी सफल रही है, जबकि आमजन पर चीनी की कीमत बढ़ने का प्रत्यक्ष दबाव देखा जा रहा है।

यह कोई पहला आर्थिक पैकेज नहीं है। इससे पूर्व में भी यूपीए, एनडीए तथा राज्य सरकार के द्वारा समय-समय पर पैकेज तथा कर राहत दिये जाते रहे हैं। नये पैकेज में भी किसानों के एक गन्ने के विभिन्न उत्पादों पर अलग—अलग तथा बार-बार राहत दी गई है, जबकि गन्ना उद्योग के प्राण किसानों के गन्ने की बढ़ती उत्पादन लागत को घटाने तथा लाभकारी गन्ना मूल्य दिलाने की दिशा में कोई पहल नहीं दिखती।

सरकार के कृषि उत्पाद का ड्योढा मूल्य देने तथा आय दुगुना बढ़ाने की असलियत यही है कि जब गन्ना मूल्य तय करने का समय आया, तब पेराई सत्र 2016-17 तथा 2017-18 में प्रति क्विंटल गन्ने पर मात्र 10 तथा 25 रुपए की वृद्धि की गई, उस पर भी उक्त गन्ना मूल्य का भुगतान 'गन्ना कानून 'के हिसाब से 14 दिनों के बजाय साल दो साल में भी नहीं होता।

अभी-अभी 22 हजार करोड़ का बकाया किसानों की स्थिति स्पष्ट करने को काफी है।पैकेज से अगर गन्ना मूल्य भुगतान में मामूली सहायता की उम्मीद बनेगी भी तो वह उद्योगपतियों की मर्जी पर होगा। हालांकि उद्योगपति सरकारी सब्सिडी का लाभ कभी किसानों को नहीं देता। इतना ही नहीं सरकारी सहयोग तथा मिलों से प्राप्त लाभ को उद्योगपति मिलों के आधुनिकीकरण पर खर्च की औपचारिकता कर पूंजी का अन्यत्र स्थानांतरण करता है और बार—बार सरकारी सहयोग की याचना करता है।

यहां तक कि मिल बन्द करने तक की भी धमकी देते रहता है। इस बीच ऐसी भी चीनी मिलें हैं जो किसी सहयोगी उद्योग के नहीं रहते भी किसानों का भुगतान करते हुए मिल का परिचालन सुचारू रूप से कर रहे हैं। सरकार को चीनी उद्योग को दिये गये पैकेज तथा सहयोग पर अमल कर समीक्षा की भी जरूरत है।

यह भी आवश्यक है कि चीनी उद्योग तथा चीनी के अधिक उत्पादन का रोना रोने की जगह सरकार चीनी उद्योग को चीनी की जगह अन्य खाद्य सामग्री, रासायनिक पदार्थ, जूस, चोकलेट बेकरी उद्योग तथा अन्य उत्पादन को भी चीनी उद्योग से जोड़ने की सलाह दे, जिससे सब्सिडी का भी खेल कम हो सके।

अभी के पैकेज में किसानों के गन्ने से उत्पादित चीनी पर बफर स्टाक बनाकर 1175 करोड़, चीनी का एमएसपी तय कर आयातित चीनी पर 100% करारोपण कर निर्यातित चीनी को करमुक्त कर फिर ईथेनाल के उत्पादन पर 4440 करोड़ सॉफ्ट लोन तथा 1332 करोड़ ब्याज अनुदान, ईथेनाल का ही उत्पाद शुल्क घटाकर तथा कीमत बढ़ाकर बार-बार आर्थिक सहायता दी जा रही है।

इसी प्रकार गन्ना मूल्य पर 5.50 रुपए की सहायता के नाम पर 1540 करोड़ की सहायता दी गई है। इससे पूर्व भी यूपीए तथा एनडीए सरकार तथा बिहार सरकार ने मिल वालों को ब्याजमुक्त ऋृण उपलब्ध कराया था तथा विभिन्न प्रकार के करों की माफी दी थी।

आज जरूरत इस बात की है कि गन्ना उद्योग को बचाने के लिए किसानों की जिन्दगी बचाने की योजना बनाई जाए तथा'किसान पैकेज' का भी ऐलान किया जाए। इसके तहत 'किसान गन्ना कोष' का निर्माण हो, जिससे गन्ना आपूर्ति के साथ ही किसानों का भुगतान हो सके। इसके अलावा गन्ना के उत्पादन लागत को घटाने के लिए उर्वरक तथा सिंचाई की निशुल्क तथा पर्याप्त अनुदान पर व्यवस्था होनी चाहिए।

ऐसे उर्वरक निशुल्क दिये जाएं, जो गन्ने की पेराई से निकले प्रेसमड से तैयार होते हैं, जिसमे वायो फर्टीलाइजर तथा वायो कम्पोस्ट इत्यादि आते हैं। गन्ना किसानों के सभी प्रकार के कृषि ऋृण से मुक्ति का ऐलान हो, जिससे किसान ऋृण बोझ से मुक्त हो खेती कर सके।

ब्याजमुक्त ऋृण उद्योगपति को ही नहीं किसानों को भी उपलब्ध हो। आमजन के लिए चीनी की कीमत 25 रुपए तय किया जाए जबकि चॉकलेट, बेकरी, पेय पदार्थ इत्यादि बनाने वाली बड़ी कम्पनियों के लिए अलग कीमत तय हो। पेट्रोलियम में 25% ईथेनाल मिलाया जाए तथा गन्ने की उत्पादन लागत का सीटू फॉर्मूले से जोड़कर गन्ना का ड्योढा यानि उचित तथा लाभकारी मूल्य तय किया जाय।

इन सारे बिन्दुओं पर सरकार सभी संबधित पक्षों के साथ वार्ता कर एक समेकित कार्य योजना तैयार कर उस पर अमल करे अन्यथा अपनी उपेक्षा तथा अपने हक के लिए देश का किसान बदलते तेवर में अगर 'गन्ना खेती बन्द' करने का निर्णय ले लेगा तो गन्ना उद्योग का भविष्य चौपट हो जायेगा और दुख भोगता किसान तो कुछ भी पैदा कर अपना पेट भर लेगा।

(एसो​सिएट प्रोफेसर आनन्द किशोर संयुक्त किसान संघर्ष मोर्चा उत्तर बिहार के संरक्षक हैं।)

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