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हापुड़ मॉब लिंचिंग मामले में आगे की जाँच से सुप्रीम कोर्ट ने झाड़ा पल्ला

Prema Negi
28 May 2019 4:45 PM GMT
हापुड़ मॉब लिंचिंग मामले में आगे की जाँच से सुप्रीम कोर्ट ने झाड़ा पल्ला
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मॉब लिंचिंग में मार दिए गए मृतक कासिम के भाई सलीम और नदीम ने मजिस्ट्रेट के सामने 164 सीआरपीसी के तहत बयानों में कई लोगों के नाम लिए हैं, जिन्हें पुलिस ने गिरफ्तार नहीं किया...

जनज्वार। उत्तर प्रदेश के हापुड़ में गोहत्या के आरोप में मॉब लिंचिंग के मामले में उच्चतम न्यायालय ने उत्तर प्रदेश सरकार को ट्रायल कोर्ट में अतिरिक्त चार्जशीट दाखिल करने के लिए निर्देश देने से इनकार कर दिया है। चीफ जस्टिस रंजन गोगोई और जस्टिस अनिरूद्ध बोस की अवकाशकालीन पीठ ने हालांकि याचिकाकर्ता को यह छूट दी कि वो इसके लिए ट्रायल कोर्ट को आवेदन दे सकते हैं।

अवकाश पीठ ने कहा कि मांस निर्यातक 45 वर्षीय कासिम कुरैशी की हत्या मामले में आगे की जांच करने और पूरक आरोप-पत्र दायर करने के लिए राज्य पुलिस को निर्देश देने की मांग वाली याचिका पर फैसला निचली अदालत लेगी। वहीं पीठ ने राज्य सरकार के उस अनुरोध को भी ठुकरा दिया है, जिसमें यह कहा गया था कि इस मामले की जांच पूरी हो चुकी है, लिहाजा वो इस याचिका का निपटारा करे।

याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील वृंदा ग्रोवर ने उच्चतम न्यायालय में अर्जी दाखिल कर कहा था कि मृतक कासिम के भाई सलीम और नदीम ने मजिस्ट्रेट के सामने 164 सीआरपीसी के तहत बयानों में कई लोगों के नाम लिए हैं, जिन्हें पुलिस ने गिरफ्तार नहीं किया। उनका कहना था कि इसे लेकर उच्चतम न्यायालय यूपी सरकार को ट्रायल कोर्ट में अतिरिक्त चार्जशीट दाखिल करने के निर्देश जारी करे।

हालांकि इस दौरान राज्य सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ से आग्रह किया कि मामले का ट्रायल 6 महीने में पूरा हो जाएगा, इसलिए इसकी सुनवाई गर्मियों की छुट्टियों के बाद की जाए, लेकिन पीठ ने कहा था कि इसको लेकर मई में ही सुनवाई की जाएगी।

इस मामले में इससे पहले 8 अप्रैल को उच्चतम न्यायालय ने उत्तर प्रदेश सरकार को मामले की जांच की ताजा स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने को कहा था। इस दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पीठ को बताया गया था कि राज्य पुलिस की जांच सहीं नहीं चल रही है और पीड़ितों को मुआवजा तक नहीं दिया गया है।

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इससे पहले 11 फरवरी को इस मामले के एक अन्य पीड़ित कासिम के बेटे महताब की याचिका पर उच्चतम न्यायालय ने उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था। वृंदा ग्रोवर के माध्यम से दाखिल इस याचिका में इस मामले में उत्तर प्रदेश से बाहर के अधिकारियों की एसआईटी से जांच कराने की मांग की गई थी। पीठ ने मामले के पीड़ित समयद्दीन की याचिका के साथ जोड़ दिया था। इससे पहले 5 सितंबर 2018 को उच्चतम न्यायालय ने यह निर्देश जारी किया था कि मेरठ रेंज के पुलिस महानिरीक्षक (आईजी) खुद इस केस की सीधी निगरानी करेंगे

तत्कालीन चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने यह भी कहा था कि इस मामले में आईजी गलती करने वाले पुलिसकर्मियों के खिलाफ उच्चतम न्यायालय की लिंचिंग को लेकर जारी गाइडलाइन के तहत कार्रवाई करेंगे।

उत्तर प्रदेश के हापुड़ में गोहत्या के आरोप में मॉब लिंचिंग के शिकार एक घायल गवाह समयद्दीन ने उच्चतम न्यायालय में अर्जी दाखिल कर अदालत की निगरानी में विशेष जांच टीम (एसआईटी) से जांच कराने की मांग की थी। इस केस में एक टीवी चैनल में स्टिंग ऑपरेशन भी दिखाया गया था। इस याचिका में मामले में 4 आरोपी को जमानत मिलने पर जल्द सुनवाई की मांग की थी।

उन्होंने आरोप लगाया था कि स्थानीय पुलिस ने मॉब लिंचिंग मामले में दिए गए उच्चतम न्यायालय के फैसले का स्पष्ट रूप से उल्लंघन किया है और एफआईआर में पूरी घटना को रोड रेज के रूप में वर्णित किया है। 18 जून 2018 को याचिकाकर्ता समयद्दीन (65) 45 वर्षीय मांस व्यापारी कासिम कुरैशी के साथ थे, जब एक "भीड़" ने गोहत्या के आरोप में उन दोनों पर हमला कर दिया। यह घटना उस दिन के एक दिन बाद हुई जब उच्चतम न्यायालय ने केंद्र से कहा था कि वो मॉब लिंचिंग के दोषी पाए गए लोगों को दंडित करने के लिए एक अलग कानून तैयार करे।

इस हमले की वीडियो रिकार्डिंग भी की गई जिससे पता चलता है कि कुरैशी और याचिकाकर्ता दोनों को फेंक दिया गया था। हमलावरों ने याचिकाकर्ता की दाढ़ी को भी खींच लिया था, और उससे दुर्व्यवहार किया। कुरैशी की तुरंत मौत हो गई थी। मुख्य अभियुक्त के रूप में पुलिस ने चार लोगों को गिरफ्तार किया जिनमें एक स्थानीय युधिष्ठिर सिंह सिसोदिया को नामजद किया गया। बाद में सिसोदिया को जमानत पर छोड़ दिया गया। अपनी जमानत याचिका में उसने यह दावा किया कि वह उस जगह पर मौजूद नहीं था। हालांकि, एक अंग्रेजी समाचार चैनल द्वारा एक स्टिंग ने उसे अपराध के बारे में बताते हुए दिखाया था।

याचिकाकर्ता समयद्दीन ने दो आरोपियों को दी गई जमानत रद्द करने की मांग की थी। याचिकाकर्ता ने कहा था कि लोकल पुलिस उच्चतम न्यायालय द्वारा मॉब लिंचिंग केस में जारी दिशा निर्देशों का पालन नहीं कर रही है। पुलिस एफआईआर को रोड रेज का मामला बना कर केस दर्ज कर रही है। पुलिस ने अभी तक उसका बयान तक दर्ज नहीं किया है। उनकी मांग है कि बयानों को मजिस्ट्रेट के समक्ष दर्ज कराया जाए और साथ ही मामले में विशेष लोक अभियोजक नियुक्त किया जाए।

इसके पहले उच्चतम न्यायालय ने इस मामले में केंद्र और राज्य सरकारों को निर्देश जारी किया था। कोर्ट ने मॉब लिंचिंग और गौरक्षा के नाम पर होने वाली हत्याओं को लेकर कहा था कि कोई भी नागरिक कानून अपने हाथ में नहीं ले सकता। डर और अराजकता की स्थिति में राज्य सरकारें सकारात्मक रूप से काम करें। कोर्ट ने संसद से ये भी कहा था कि वो देखे कि इस तरह की घटनाओं के लिए अलग कानून बन सकता है क्या?

उच्चतम न्यायालय ने केंद्र और राज्य सरकारों को दी गई गाइडलाइन जारी करने को कहा था और अगले 4 हफ्तों में कोर्ट में जवाब पेश करने के निर्देश भी दिए थे। उच्चतम न्यायालय ने जाति और धर्म के आधार पर लिंचिंग के शिकार बने लोगों को मुआवजा देने की मांग पर भी बड़ा झटका दिया था। चीफ जस्टिस ने वकील इंदिरा जयसिंह से असहमति जताते हुए कहा था कि इस तरह की हिंसा का कोई भी शिकार हो सकता है सिर्फ वो ही नहीं जिन्हें धर्म और जाति के आधार पर निशाना बनाया जाता है।

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