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सेना में 3 महीने के अंदर महिला अफसरों को स्थायी कमीशन दे केंद्र, शारीरिक अक्षमता का तर्क बेतुका : सुप्रीम कोर्ट

Prema Negi
18 Feb 2020 7:43 AM GMT
सेना में 3 महीने के अंदर महिला अफसरों को स्थायी कमीशन दे केंद्र, शारीरिक अक्षमता का तर्क बेतुका : सुप्रीम कोर्ट
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कोर्ट ने कहा कमांड नियुक्तियों से महिलाओं का पूर्ण बहिष्कार संविधान के अनुच्छेद 14 के खिलाफ, शारीरिक सीमाओं और सामाजिक मानदंडों के चलते महिला अफसरों को स्थाई कमीशन नहीं देने की केंद्र की दलील परेशान कर देने वाली, ऐसी दलीलों को नहीं किया जा सकता कतई मंजूर...

जेपी सिंह की टिप्पणी

च्चतम न्यायालय ने कहा है कि सेना में उपलब्धियों और भूमिकाओं को लेकर महिलाओं की क्षमताओं पर संदेह पैदा करना न सिर्फ महिलाओं का, बल्कि सेना का भी अपमान होगा। उच्चतम न्यायालय ने सोमवार 17 फरवरी को सेना में महिलाओं को परमानेंट कमीशन की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार को फटकार लगते हुए कहा है कि सामाजिक और मानसिक कारण बताकर महिला अधिकारियों के इस अवसर से वंचित करना न सिर्फ भेदभावपूर्ण है, बल्कि यह अस्वीकार्य है। उच्चतम न्यायालय ने यह भी कहा कि कमांड नियुक्तियों से महिलाओं का पूर्ण बहिष्कार संविधान के अनुच्छेद 14 के खिलाफ है और अनुचित है।

च्चतम न्यायालय में 9 साल लंबी कानूनी लड़ाई के बाद थलसेना में महिलाओं को बराबरी का हक मिलने का रास्ता साफ हो गया है। उच्चतम न्यायालय के फैसले के बाद अब आर्मी में महिलाओं को पुरुष अफसरों से बराबरी का अधिकार मिल गया है। अभी तक आर्मी में 14 साल तक शॉर्ट सर्विस कमीशन (एसएससी) में सेवा दे चुके पुरुष सैनिकों को ही स्थाई कमीशन का विकल्प मिल रहा था, लेकिन महिलाओं को यह हक नहीं था। वायुसेना और नौसेना में महिला अफसरों को स्थाई कमीशन मिल रहा है। यह फैसला जस्टिस डीवाई चंद्रचूड और जस्टिस अजय रस्तोगी की पीठ ने सुनाया।

च्चतम न्यायालय ने कल 17 फरवरी को दिये गये एक अहम फैसले में कहा कि उन सभी महिला अफसरों को तीन महीने के अंदर आर्मी में स्थाई कमीशन दिया जाए, जो इस विकल्प को चुनना चाहती हैं। उच्चतम न्यायालय ने केंद्र की उस दलील को निराशाजनक बताया, जिसमें महिलाओं को कमांड पोस्ट न देने के पीछे शारीरिक क्षमताओं और सामाजिक मानदंडों का हवाला दिया गया था।

पीठ ने व्यवस्था दी है कि शॉर्ट सर्विस कमीशन के तहत आने वाली सभी महिला अफसर स्थायी कमीशन की हकदार होंगी। शॉर्ट सर्विस कमीशन के तहत 14 साल से कम और उससे ज्यादा सेवाएं दे चुकीं महिला अफसरों को परमानेंट कमीशन का मौका दिया जाए। महिलाओं को कॉम्बैट रोल देने का फैसला पीठ ने सरकार और सेना पर छोड़ा है। पीठ ने कहा कि जंग में सीधे शामिल होने वाली जिम्मेदारियां (कॉम्बैट रोल) में महिलाओं की तैनाती नीतिगत मामला है। दिल्ली हाईकोर्ट ने भी यही कहा था। इसलिए सरकार को इस बारे में सोचना होगा।

लसेना में महिला अफसरों को कमांड पोस्टिंग नहीं देने पर पूरी तरह से रोक लगाना बेतुका है और बराबरी के अधिकार के खिलाफ है। महिलाओं को कमांड पोस्टिंग का अधिकार मिले।' कमांड पोस्टिंग यानी किसी यूनिट, कोर या कमान का नेतृत्व करने वाली पोस्टिंग।

न्यायालय ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा है कि महिला अफसरों की तैनाती को लेकर केंद्र सरकार के नीतिगत फैसले बहुत ही अनोखे रहे हैं। हाईकोर्ट के फैसले के बाद केंद्र को महिलाओं को सेना में स्थाई कमीशन देना चाहिए था। केंद्र ने महिला अफसरों को स्थाई कमीशन न देकर पूर्वाग्रह दिखाया है। शारीरिक सीमाओं और सामाजिक मानदंडों के चलते महिला अफसरों को स्थाई कमीशन नहीं देने की केंद्र की दलील परेशान कर देने वाली है। ऐसी दलीलों को कतई मंजूर नहीं किया जा सकता।

पीठ ने कहा है कि थलसेना में महिला अफसरों को स्थाई कमीशन देना चाहिए। अतीत में महिला अफसरों ने देश के लिए बहादुरी दिखाई है। अंग्रेजों का दौर खत्म होने के 70 साल बाद भी सरकार को सशस्त्र बलों में लैंगिक आधार पर भेदभाव खत्म करने के लिए मानसिकता बदलने की जरूरत है।

गौरतलब है कि 2010 में दिल्ली हाईकोर्ट ने महिला अफसरों को स्थायी कमीशन देने की इजाजत दे दी थी। 2 सितंबर 2011 उच्चतम न्यायालय ने भी साफ कर दिया कि हाईकोर्ट के फैसले पर रोक नहीं रहेगी। इसके बावजूद केंद्र ने एक दशक तक इस पर अमल नहीं किया और दिल्ली हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के फैसले को तवज्जो नहीं दी।

17 साल पहले यानी 2003 में बबीता पुनिया पहली महिला वकील थीं, जिन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट में इस मामले में याचिका दायर की थी। उनके बाद 9 महिला अफसरों ने 2009 तक हाईकोर्ट में इसी मुद्दे पर अलग-अलग याचिकाएं दायर कीं। 2010 में दिल्ली हाईकोर्ट ने इन याचिकाओं पर फैसला सुनाया और महिलाओं को सेना में स्थाई कमीशन देने का आदेश दिया। हाईकोर्ट ने कहा था कि यह साफ किया जाता है कि जो महिला अफसर रिटायरमेंट की उम्र तक नहीं पहुंचीं हैं, उन सभी को स्थाई कमीशन दिया जाए। साथ ही उन्हें प्रमोशन जैसे लाभ भी दिए जाएं। हम महिलाओं पर कोई एहसान नहीं कर रहे, हम उन्हें उनके संवैधानिक अधिकार दिला रहे हैं।

हाईकोर्ट के फैसले के 9 साल बाद केंद्र सरकार ने फरवरी 2019 में सेना के 10 विभागों में महिला अफसरों को स्थायी कमीशन देने की नीति बनाई, लेकिन यह कह दिया कि मार्च 2019 के बाद से सर्विस में आने वाली महिला अफसरों को ही इसका फायदा मिलेगा। इस तरह वे महिलाएं स्थाई कमीशन पाने से वंचित रह गईं, जिन्होंने इस मसले पर लंबे अरसे तक कानूनी लड़ाई लड़ी। केंद्र ने उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर कर दलील दी थी कि पुरुष सैनिक महिला अफसरों से आदेश लेने को तैयार नहीं होंगे।

में थलसेना में महिलाएं शॉर्ट सर्विस कमीशन के दौरान आर्मी सर्विस कोर, ऑर्डनेंस, एजुकेशन कोर, जज एडवोकेट जनरल, इंजीनियर, सिग्नल, इंटेलिजेंस और इलेक्ट्रिक-मैकेनिकल इंजीनियरिंग ब्रांच में ही एंट्री पा सकती हैं। उन्हें कॉम्बैट सर्विसेस जैसे- इन्फैंट्री, आर्मर्ड, तोपखाने और मैकेनाइज्ड इन्फैंट्री में काम करने का मौका नहीं दिया जाता। हालांकि, मेडिकल कोर और नर्सिंग सर्विसेस में ये नियम लागू नहीं होते। इनमें महिलाओं को परमानेंट कमीशन मिलता है। वे लेफ्टिनेंट जनरल पद तक भी पहुंची हैं।

वायुसेना और नौसेना में महिला अफसरों को स्थाई कमीशन का विकल्प है। वायुसेना में महिलाएं कॉम्बैट रोल, जैसे- फ्लाइंग और ग्राउंड ड्यूटी में शामिल हो सकती हैं। शॉर्ट सर्विस कमीशन के तहत महिलाएं वायुसेना में ही हेलिकॉप्टर से लेकर फाइटर जेट तक उड़ा सकती हैं। नौसेना में भी महिलाएं लॉजिस्टिक्स, कानून, एयर ट्रैफिक कंट्रोल, पायलट और नेवल इंस्पेक्टर कैडर में सेवाएं दे सकती हैं।

पीठ ने कहा कि सेना में महिला अधिकारियों की नियुक्ति एक विकासवादी प्रक्रिया है। कोर्ट ने केंद्र सरकार को फटकार लगाई और कहा कि SC द्वारा हाई कोर्ट के फैसले पर रोक नहीं लगाई गई, फिर भी केंद्र ने हाई कोर्ट के फैसले को लागू नहीं किया। हाई कोर्ट के फैसले पर कार्रवाई करने का कोई कारण या औचित्य नहीं है। सभी नागरिकों को अवसर की समानता और लैंगिक न्याय सेना में महिलाओं की भागीदारी का मार्गदर्शन करेगा।' महिलाओं की शारीरिक विशेषताओं पर केंद्र के विचारों को कोर्ट ने खारिज किया।

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