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विमर्श

भीड़ हमेशा हिंसक होती है और कारवां विवेकशील!

Prema Negi
21 Dec 2019 6:51 AM GMT
भीड़ हमेशा हिंसक होती है और कारवां विवेकशील!
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भीड़ वर्दीधारी हो या बकौल प्रधानमन्त्री ‘कपड़े’ की पहचान वाली हो, दोनों ही हिंसक हैं। कल किस तरह वर्दीधारी भीड़ ने एक गांधीवादी इतिहासकार को सरेआम लाइव टीवी पर धमकाया और धकियाया था, वैसा ही लखनऊ की अराजक और हिंसक भीड़ ने किया, पर था दोनों जगह खौफ़ और आतंक...

CAA के बाद देशभर में हो रहे हिंसक माहौल पर वरिष्ठ रंग चिंतक मंजुल भारद्वाज की तल्ख टिप्पणी

ब से छात्रों के शांतिपूर्ण प्रतिरोध पर भीड़ की हिंसा और विश्वविधालय परिसर में छात्रों पर पुलिस की हिंसा के दृश्य देखें हैं मन बहुत विह्लल हो उठा है। सवाल दर सवाल उठ रहे हैं और जवाब दूर क्षितिज पर टंगे हुए हैं। सबसे पहले यह समझ लीजिये की भीड़ हमेशा हिंसक होती है। भीड़ किसी भी शांतिप्रिय नागरिक में खौफ़ पैदा करती है...खौफ़ पैदा करना भावनिक और वैचारिक हिंसा है।

भीड़ वर्दीधारी हो या बकौल प्रधानमन्त्री ‘कपड़े’ की पहचान वाली, दोनों ही हिंसक हैं। कल किस तरह वर्दीधारी भीड़ ने एक गांधीवादी इतिहासकार को सरेआम लाइव टीवी पर धमकाया और धकियाया था, वैसा ही लखनऊ की अराजक और हिंसक भीड़ ने किया, पर था दोनों जगह खौफ़ और आतंक!

र पिछले 68 महीने के मोदी राज में यह भीड़ शांत थी... नोटबंदी के दमन पर शांत थी, बेरोजगारी की बाढ़ में शांत थी, पकौड़े नीति पर शांत थी,चुनावी जुमलों पर शांत थी, किसानों की आत्महत्या पर शांत थी, बेटियों की चीत्कारों पर शांत थी,370 पर शांत थी, स्मार्ट सिटी और बुलेट ट्रेन पर शांत थी, GST पर शांत थी, राम मंदिर पर शांत थी, पुलवामा पर शांत थी... फिर इस भीड़ के जिन्न को जगाया किसने?

स भीड़ के जिन्न को जगाया मोदी और शाह ने। आंकड़ों के दर्प में विकास के कपड़ों में आये विषधारियों ने। विकास के विषधारियों ने जनता के मौन को कायरता समझ लिया। बहुमत को ‘मनमाने’ दमन का अधिकार समझ लिया। शांत पर खदकते समाज को बुझदिल समझ लिया। संसद में बहुमत को अपने कुकर्मों से ध्यान हटाने और जवाबदेही से बचने का मार्ग समझ लिया... और NRC के झूठ का पिटारा जब सामने आया तो नागपुर का षड्यंत्र जगजाहिर हो गया।

शकों से हजारों बार झूठ बोला गया करोड़ों विदेशी मुसलमान घुसपैठिये भारत में घुस आये हैं। उसी झूठ का परिणाम असम में NRC हुआ, 19 लाख लोग निकले जिसमें 16 लाख हिन्दू और 3 लाख मुलसमान!

गर ये 16 लाख मुसलमान निकल आते तो मोदी-शाह को दिक्कत नहीं होती, पर 19 लाख में 16 लाख हिन्दू और 3 लाख मुलसमान अब ये 16 लाख हिन्दू मोदी-शाह के गले की फांस बन गए छद्दम हिंदूवादी अगर इन हिन्दुओं को देश से खदेड़ देती है तो उसका ‘हिन्दू मुखौटा’ उतर जाएगा और हिन्दू वोट बैंक खत्म हो जाएगा। इस पाखंड को वैध बनाने के लिए नागरिकता कानून में संशोधन किया गया, अब ये संशोधन ‘भारत एक विचार’ को खत्म कर संविधान को लहूलुहान करने वाला काला कानून बन गया।

मोदी-शाह और उनके परिवार की वोट के तुष्टिकरण और धुर्वीकरण की पोल खुल गई। अब तक हिन्दू और मुसलमान का खेल वो अच्छे से बिना दाग के सरेआम भेड़ बनी जनता के साथ खेल रहे थे और बहुमत के नशे में चूर थे, पर संशोधित नागरिकता कानून ने खेल पलट दिया और मामला हिन्दू मुसलमान की बजाए मोदी–शाह सरकार बनाम भारत के अस्तित्व का हो गया! ये भारत विरोधी काला कानून अगर वापस नहीं लिया तो यह अंतिम बहुमत की संघ सरकार साबित होगी!

भारत और भारतीयता पर प्रहार करने वाले कानून को बनाने वाली भीड़ जो अपने आप को ‘बहुमत का आंकड़ा’ कहती है मूलतः यह भीड़ हिंसक है। इस ‘आंकड़ों के बहुमत’ की भीड़ को बकौल प्रधानमन्त्री आप ‘कपड़ों’ से पहचान सकते हो। ‘आंकड़ों के बहुमत’ की भीड़ ने देशभर में आतंक फैलाया है। देश की संसद में ताल ठोंक कर इस ‘आंकड़ों के बहुमत’ की भीड़ ने पूरे देश को खौफ़नाक मंजर बना देश के ज़र्रे ज़र्रे को फूंक डाला है। आज देश में हिंसा,आगज़नी, पत्थरबाज़ी, मौत का कोई जिम्मेदार है तो वो है ‘आंकड़ों के बहुमत’ की भीड़!

नता को अपना शांतिपूर्ण प्रतिरोध करना चाहिए। जो हिंसा में लिप्त हैं वो CAA और NRC के प्रतिरोध में नहीं है! शांतिपूर्ण आन्दोलन से ही सफ़लता मिलेगी। सत्ता चाहती है कि शांतिपूर्ण आन्दोलन हिंसक हो, ताकि उसे अपराध और देशद्रोह करार दिया जाए! हम किसी के द्वारा भी फैलाई हिंसा के खिलाफ़ हैं चाहे वो सत्ता का दमन हो या उग्र भीड़ की हिंसा!

नता भीड़ नहीं एक प्रतिरोध का कारवाँ बने, क्योंकि भीड़ हिंसक और कारवाँ विवेकशील और निर्णायक होता है!

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