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कर्नाटक में यूपी-बिहार के मजदूरों को नहीं समझा जाता इंसान, लॉकडाउन में अपमान-तिरस्कार और भुखमरी के हो रहे शिकार

Prema Negi
11 May 2020 9:57 AM GMT
कर्नाटक में यूपी-बिहार के मजदूरों को नहीं समझा जाता इंसान, लॉकडाउन में अपमान-तिरस्कार और भुखमरी के हो रहे शिकार
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कर्नाटक की येदियुरप्पा सरकार ने प्रवासी मजदूरों की मुश्किलों को कम करने के लिये नहीं उठाया कोई ठोस कदम...

जनज्वार। 'प्रवासी मजदूरों को लेकर सरकार की नीति क्या है? क्या आप चाहते हैं कि मजदूर दोबारा यहां आयें ही नहीं? क्या वहां मजदूरों की स्थिति बहुत चलताऊ है?' का जवाब देते हुए कर्नाटक सरकार के कोविड-19 पर आधिकारिक प्रवक्ता प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा मंत्री सुरेश कुमार कहते हैं,' हम प्रवासी मजदूरों को बहुत चाहते हैं। हम चाहते हैं कि वे यहां बने रहें। वह इसी तरह से यहां रहे, जैसे कि 4-5 साल से यहां रहते आ रहे हैं, लेकिन अब वह अपने घर जाना चाह रहे हैं। यदि वो ऐसा ही चाहते हैं उन्हें जाने से कौन रोक सकता है। हमने उन्हें रोका नहीं है। दिक्कत यह आ रही है कि जिन राज्यों के यह मजदूर हैं, वहां की सरकार ने उन्हें वापस आने की अभी तक इजाजत नहीं दी है।'

र्नाटक सरकार के प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा मंत्री सुरेश कुमार सरकार के आधिकारिक प्रवक्ता हैं। उन्हें सीएम बीएस येदियुरप्पा ने कोविड-19 पर सरकार की ओर से बोलने के लिये अधिकृत किया हुआ है। सरकार की ओर से वह पत्रकारों से बातचीत करते हैं। मजदूरों को लेकर उनसे यह सवाल तकरीबन पांच बार पूछा जा चुका है।

हालाांकि सबसे पहले सुरेश कुमार ने खुद बताया था कि उन्होंने जब मजदूरों के राहत शिविर में जाकर उनसे बातचीत की तो उन्होंने वापस अपने घर जाने का आग्रह किया था। उनके इसी आग्रह को आधार बनाकर सरकार ने उन्हे वापस भेजने का निर्णय भी ले लिया था।

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सके लिए सरकार ने मजदूरों की घर वापसी के लिए ट्रेन का इंतजाम भी कर दिया था। सरकार के इस निर्णय के बाद मजदूर उत्साहित थे कि वह अब अपने घर जा पायेंगे, क्योंकि यहां उनके पास न काम था और न ही खाने—पीने का उचित प्रबंध था।

सी बीच हुआ यह कि सरकार के साथ कन्फेडरेशन ऑफ रियल एस्टेट एंड डेवलपर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (क्रेडाई) के पदाधिकारियों की एक बैठक हुई। इसके बाद सीएम ने एक घोषणा की कि प्रदेश में जल्दी ही कामकाज शुरू हो जाएगा। इससे मजदूरों को काम मिल जायेगा।

सीएम ने किसी की बात नहीं सुनी, बस घोषणा कर दी। इधर मजदूरों को सरकार की इस घोषणा की जानकानी नहीं मिली। वह रेल पकड़ने के लिए अपने अपने शिविरों से निकल कर स्टेशन की ओर चल पड़े। कई मजदूर तो 35 किलोमीटर की दूरी तय कर स्टेशन तक पहुंचे, लेकिन यहां पहुंचते ही उन्हें पता चला कि सरकार ने ट्रेन कैंसिल कर दी है।

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भूख और थकान से बदहाल मजदूरों को जैसे ही पता चला कि सरकार ने ट्रेन कैंसिल कर दी है, तो उनके सब्र का बांध टूट गया। गुस्साएं प्रवासी मजदूरों ने प्रदर्शन कर दिया, जिससे कानून व्यवस्था की स्थिति गड़बड़ा गयी। मजदूरों की भीड़ ने सोशल डिस्टेंसिंग के नियमों की धज्जियां उड़ा दीं। स्थिति को काबू से बाहर होता देख कर सरकार के रणनीतिकार भी परेशान हो गये। स्थिति को काबू करने के लिए राजस्व मंत्री आर अशोका और पुलिस आयुक्त भास्कर राव तुरंत मौके पर पहुंच कर मजदूरों को समझा कर शांत करने की कोशिश में जुट गये।

जदूरों को शांत करने के लिए पुलिस आयुक्त भास्कर राव ने दावा किया कि प्रवासी मजदूरों को यहीं काम मिलेगा। यदि कोई मजदूर वापस जाना चाहता है तो उसे वापस भेजा जाएगा, लेकिन इसके लिए पहले वहां की सरकार की मंजूरी लेनी होगी। हमने बिहार और बंगाल की सरकारों को लिखा है। जैसे ही हमें उनकी मंजूरी मिल जाएगी, हम आपको भेज देंगे। उन्होंने मजदूरों से कहा, तब तक आप अपने अपने घरों को वापस चले जायें।

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धर मौके पर मजदूरों की संख्या तेजी से बढ़ती जा रही थी। मंत्री और पुलिस अधिकारी की बात को मजदूर मानने को तैयार नहीं थे, क्योंकि उन्हें लग रहा था कि अब वह अपने अपने गृह प्रदेशों में चले जायेंगे। इसलिए वह जहां किराये पर रह रहे थे, उसे खाली कर आये थे, अब वह वहां वापस कैसे जा सकते है?

क प्रवासी मजदूर दुर्गाचरण कहते हैं, यहां उनके लिए कोई काम नहीं है, और हमें यहां कोई भोजन भी नहीं मिलता है। हमारी इस स्थिति पर यहां कोई ध्यान नहीं दे रहा है, मगर हमारी बात सुनने वाला कोई नहीं था।

रकार की कोशिश थी कि किसी भी तरह से मजदूरों को रोका जाए। प्रदर्शन कर रहे मजदूरों को बोला गया कि वह इंतजार करें, उनके लिये बस मंगायी गयी है, यह बस उन्हें वहां तक छोड़कर आयेंगी जहां से वह स्टेशन तक आये हैं।

प्रवासी मजदूर जहां रहते थे, वहां तक उन्हें वापस भेजने के लिए शासन-प्रशासन को 24 घंटे तक का समय लगा। इधर कर्नाटक के अलग अलग जिले के मजदूर सिर्फ इसलिए अपने घरों तक पहुंचने में कामयाब हो गए, क्योंकि कुछ ट्रेड यूनियनों और लोगों ने जोर—शोर से इसके लिए आवाज उठायी। फिर भी कर्नाटक राज्य सड़क परिवहन निगम ने बसों के किराये के तौर पर उनसे 950 रुपये प्रति टिकट वसूल किया। हालांकि मुख्यमंत्री येदियुरप्पा ने दो दिनों के लिए मुफ्त यात्रा का आदेश दिया था। मुफ्त यात्रा की सुविधा को आगे बढ़ा भी दिया गया था।

लेकिन अन्य राज्यों के प्रवासी मजदूरों की ओर किसी ने ध्यान नहीं दिया। उनके साथ ऐसा व्यवहार किया गया जैसे कि वह भारत के नागरिक ही न हों।

कोई है जो हमारी मुश्किलों को सुनेगा?

डिशा निवासी 28 वर्षीय गजेन्द्र यहां कुक का काम करते हैं, उन्होंने बताया कि “हमें मार्च का वेतन मिला था, लेकिन लॉकडाउन की वजह से काम बंद हो गया। अब हमें अप्रैल का वेतन नहीं मिला है। हमें नहीं पता हम यहां क्या करेंगे। इससे तो बेहतर है हमें हमारे घर वापस भेज दिया जाये।

क्या आपने यात्रा करने के लिए फॉर्म भर कर सरकार को दिया? पूछने पर वो कहते हैं, "नहीं। पुलिस ने हमसे कहा कि हम केवल अपना नाम और फोन नंबर लिखें, जिस जगह से हम लोग हैं। हमें थाने में लिखे हुए तीन दिन हो चुके हैं। लेकिन हमें अभी तक कोई सूचना नहीं मिली है।”

जेन्द्र ओडिशा में करीब 150 अन्य प्रवासियों के साथ तमिलनाडु में अंतरराज्यीय राजमार्ग होसुर रोड के पास रहते हैं। उन्होंने बताया कि “हमारे सभी साथी यहां सुरक्षा गार्ड या रसोइया हैं। सुरक्षा गार्डों को वेतन का भुगतान नहीं किया गया है, हालांकि उनमें से कई ड्यूटी पर हैं। उन्होंने कहा कि इस हालात में यहां गुजरा करना मुश्किल हो रहा है, कम से कम यदि वह अपने घर पहुंच जाते हैं तो उन्हें यहां रहने के किराये और भोजन की तलाश तो नहीं करनी पड़ेगी।'

क्या आपको खाना मिल रहा है? पूछने पर वह कहते हैं, “कोई भी हमें खाना देने नहीं आया। पहले कुछ दिन पास के अपार्टमेंट में रहने वाले लोगों ने हमें कुछ खाने को दिया। तब हमें बताया गया कि सरकार हमारे खाने पीने का इंतजाम कर रही है। लेकिन हमें सरकार की ओर से कुछ भी नहीं दिया गया।

file photo

फिर एक स्वयंसेवी संस्था की मैडम ने हमें 10 किलो चावल, दो किलोग्राम दाल, एक किलो तेल और नमक दिया। गजेंद्र ने बताया खाने के इस समान से वह अभी तक गुजारा कर रहे हैं।

न तमाम मुश्किलातों के बीच भी गजेंद्र जैसे लोगों को भाग्यशाली माना जा सकता है, क्योंकि शहर के दूसरे हिस्सों में प्रवासी मजदूरों को खासी अपमानजनक स्थिति का सामना करना पड़ रहा है। सीधे तौर पर ये लोग नस्लीय हिंसा का शिकार हो रहे हैं। भाषा—बोली को लेकर उनका मजाक उड़ाया जा रहा है।

स्थितियां इतनी बदतर हैं कि विभिन्न स्वयंसेवी संगठनों के लोगों को भी प्रवासियों के बीच भोजन के पैकेट वितरित करने से रोका जा रहा है।

हां अलग अलग एजेंडे के तहत कई तरह के अराजक तत्व सक्रिय हो गये थे। महिला घरेलू नौकरों के कल्याण के लिए काम करने वाली गैर सरकारी संस्था की गीता मेनन कहती हैं, "अराजक तत्वों ने हमसे वह सारा सामान ले लिया था, जो हमें इन लोगों को देने के लिए सरकार ने दिया था।

एक बैठक के बाद अचानक ही हालातों में आया बदलाव

लॉकडाउन में छूट मिलने के दूसरे ही दिन निर्माण उद्योग के प्रतिनिधियों की एक बैठक मुख्यमंत्री के साथ हुई। निर्माण उद्योगपतियों का प्रतिनिधित्व कर रहे एक शख्स ने बैठक में बताया कि क्योंकि निर्माण संबंधी गतिविधि चलाने के लिए प्रवासी मजदूर चाहिये, अब यदि वह वापस अपने प्रदेश चले जाते हैं तो वापस नहीं आयेंगे, जिससे निर्माण का काम प्रभावित होगा। बस फिर क्या था? अचानक ही सबकुछ बदल गया।

लटरनेटिव लॉ फोरम (ALF) के विनय श्रीनिवास कहते हैं, एक महीने पहले तक जो प्रवासी मजदूरों को वह इंसान ही नहीं मान रहे थे, अब उनकी अहमियत समझ में आने लगी है।'

स बैठक के कुछ घंटों बाद, भारतीय रेलवे की तरफ से सूचित किया गया कि कर्नाटक सरकार को प्रवासी मजदूरों को भेजने के लिए किसी विशेष ट्रेन की आवश्यकता नहीं है।

कनार्टक प्रशासन की तरफ से कहा गया हमारी प्रशासनिक ढांचा इतना खराब नहीं है। एक ब्यूरोक्रेट ने बताया कि प्रवासी मजदूरों के साथ जो भी व्यवहार हो रहा था, इसके लिए कम से कम मुख्य सचिव जिम्मेदार नहीं है।

लटरनेटिव लॉ फोरम श्रीनिवास स्पष्ट कहते हैं, “शासन-प्रशासन का यह प्रवासियों के लिए कोई चिंता नहीं है, बल्कि आप सिर्फ उनका श्रम चाहते हैं। आप प्रवासी श्रमिकों को लोगों को इंसान के रूप में देखते ही नहीं हैं। उनके पास राशन कार्ड तक नहीं है। उनका कोई अस्तित्व ही नहीं है। जब आपने महसूस किया है कि अर्थव्यवस्था उनके बिना आगे नहीं बढ़ेगी, इसलिए अब जब वे कहते हैं कि हम घर जाना चाहते हैं, तो उन्हें नहीं जाने दिया जा रहा।"

से ही प्रवासी मजदूरों के हालात बयां करता कार्टूनिस्ट सतीश आचार्य का एक सटीक कार्टून है, को प्रवासी श्रमिकों की स्थिति को दिखाता है।

लॉकडाउन के बाद हो रही तमाम दिक्कतों की वजह से प्रवासी मजदूरों में आक्रोश बढ़ रहा था। उन्होंने प्रदर्शन करना शुरू कर दिया, जिसे दबाने के लिए पुलिस को बल प्रयोग करना पड़ा। मामला बढ़ता गया तो सरकार पर भी सवाल उठने लगे। इसी बीच एक ट्रेड युनियन ने कर्नाटक उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर कर दी। इसमें येदियुरप्पा सरकार से सवाल किया गया कि प्रवासी मजदूरों की घर वापसी को लेकर सरकार क्या इंतजाम कर रही है।

धर मजदूरों की स्थिति पर सरकार विपक्ष के निशाने पर पर थी। राजनीतिक तौर पर भी जब मुख्यमंत्री ने महसूस किया कि उनके कैबिनेट के सदस्यों ने ट्रेन कैंसिल करने की जो सलाह दी, जिसे उन्होंने मान भी लिया, दअरसल वह देश में कहीं भी आने जाने की स्वतंत्रता के अधिकार के भी खिलाफ है।

खुद को विवादों में आता देख कर उन्होंने ट्रेन कैंसिल करने का अपना फैसला तुरंत पलट दिया। इसके बाद उत्तर प्रदेश के लिए कई ट्रेनें रवाना की गयीं, लेकिन फिर भी बिहार, पश्चिम बंगाल, झारखंड और अन्य राज्यों के प्रवासी मजदूरों को उनके राज्यों तक पहुंचाने के लिए रेल का इंतजाम अभी तक नहीं किया गया है।

प्रवासी मजदूरों के साथ इस तरह से गैर बराबरी का व्यवहार क्यों?

स्माल स्केल इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के एक पदाधिकारी ने एक बार कहा था, “हमारे कन्नाडिगा लड़के सुबह 7.30 बजे मशीन आपरेटर के आने से मशीनों को साफ नहीं करेंगे। क्योंकि उन्हें लगेगा कि यह काम उनके स्तर का नहीं है। वह बाइक पर कोरियर बांट लेगा, इसके विपरीत बिहार या या बंगाल का लड़का सुबह 7 बजे गेट पर होगा क्योंकि उसे घर पैसे भेजने हैं। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि प्रवासी मजदूर अपने काम को लेकर कितना समर्पित है। इसके बाद भी राजनीतिज्ञों ने प्रवासी मजदूरों की अहमियत की ओर कोई ध्यान नहीं दिया। इन प्रवासी मजदूरों के बूते ही यहां की आर्थिक गतिविधियां चल रही हैं। इसके बाद भी उन्हें सम्मान नहीं दिया जा रहा है।

जैसा कि सरकार के प्रवक्ता के शब्दों पर ध्यान दें तो उन्होंने कहा था कि हम उन्हें यहां रहने दे रहे हैं, जैसे कि चार पांच साल पहले उन्हें यहां रहने दिया था। इनके शब्द इस तरह से लग रहे हैं, मानो प्रवासी मजदूरों को वह यहां रहने की अनुमति देकर एक अहसान जता रहे हैं। प्रवासी मजदूर कोई विदेश से नहीं आए, वह भी भारतीय हैं, वह भी इस देश के नागरिक हैं। वह यहां सिर्फ मजदूरी करने के लिए आये हैं।

ले ही वह वह एक आईटी या प्रोफेशनल मैनेजर नहीं हैं, मगर इससे उनकी अहमियत कम नहीं हो जाती। मगर क्योंकि वह प्रवासी हैं, और इस राज्य में उनका वोट नहीं है, इसलिए राजनेताओं को पता है कि यह उनका वोट बैंक नहीं हैं, शायद यहीं कारण है कि उनके बारे में ज्यादा सोचा नहीं जा रहा है।

(कनार्टक के प्रवासी मजदूरों की हालात बयां करती thelede में प्रकाशित खबर से संपादित और अनूदित रिपोर्ट)

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