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बुक्सा जनजाति उत्पीड़न मामला पहुंचा सुप्रीम कोर्ट

Janjwar Team
18 Sep 2017 8:39 PM GMT
बुक्सा जनजाति उत्पीड़न मामला पहुंचा सुप्रीम कोर्ट
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रामनगर, जनज्वार। कांग्रेस के पूर्व दर्जाधारी मंत्री सोहन सिंह द्वारा ग्रामीणों के खेतों पर रास्ता बनाकर डम्फर चलाने, विरोध करने पर महिलाओं को बन्दूक की बटों से मारने, उनके घरों में आग लगाने, गोलियां चलवाने और उल्टा 307 का मुकदमा भी लगवाने का 4 साल पुराना मामला अब देश की सर्वोच्च न्यायालय में पहुंच चुका है।

सुप्रीम कोर्ट में अब तक इस साल इस मामले में 14 अप्रैल, 13 जुलाई और 14 अगस्त की तारीखें लग चुकी हैं। कल 19 सितंबर को भी इस पर सुनवाई की तारीख है। गौरतलब है कि यह उत्तराखंड का बहुचर्चित मामला रहा है, जिसमें कांग्रेस—माफिया गठजोड़ उजागर हुआ था।

उत्तराखण्ड हाईकोर्ट में ग्रामीणों के खिलाफ कांग्रेस नेता द्वारा लगाया गया यह मुकदमा खारिज हो चुका था, जिसके बाद कांग्रेसी नेता सोहन सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में ग्रामीणों के खिलाफ केस डाला था।

उत्तराखंड के नैनीताल जिले का छोटा सा गांव है वीरपुर लच्छी, जो कि खनन माफिया व तत्कालीन कांग्रेस सरकार के गुनाहों का आज भी गवाह बना हुआ है। पुलिस व खनन माफिया के खौफ से भागकर खेतों में छुप जाने वाले अनुसूचित जनजाति के लोग अब खनन माफिया से लोहा ले रहे हैं, उसकी हर चाल का मजबूती से मुकाबला कर रहे हैं।

1 मई, 2013 को जब बुक्सा समुदाय की महिलाओं ने सोहन सिंह के डम्फर चालकों से कहा कि तुम सड़क पर पानी क्यों न डाल रहे हो, धूल उड़ने से हमारे आंगन व खाने में मिट्टी भर रही है। महिलाओं का इतना बोलना भी कांग्रेस के पूर्व दर्जाधारी मंत्री सोहन सिंह को बर्दाश्त नहीं हुआ। वो अपने दोनों पुत्रों डीपी सिंह व सुमितपाल सिंह के साथ गुंडों की फौज लेकर गांव में घुस गया।

वहां उसने गोलियां चलाईं, बन्दूक की बटों से महिलाओं व ग्रामीणों को घायल कर दिया, उनके 3 घरों में आग लगा दी। गांव का रास्ता रोककर ग्रामीणों को अस्पताल भी नहीं जाने दिया गया।

ग्रामीणों के मुताबिक 100 नंबर पर सूचना देने के बाद पुलिस मौके पर पहुंची। पुलिस के अधिकारी ने कहा कि बाबूजी (सोहन सिंह) से कहो कि वे यहां से चले जाएं नहीं तो उन्हें गिरफतार करना पड़ सकता है। खनन माफिया सोहन सिंह व उनके लोगों द्वारा रास्ता खाली करने के बाद घायलों को इलाज के लिए सरकारी एम्बुलेन्स सर्विस 108 के द्वारा रामनगर अस्पताल में भर्ती करवाया गया।

गांव वाले कहते हैं कि हमने पुलिस थाने में घटना की रिपोर्ट करवाई तो सोहन सिंह ने भी क्रास फर्जी मुकदमा दर्ज करवा दिया। ग्रामीणों के खिलाफ आईपीसी की धारा 307 (हत्या का प्रयास) 147, 148, 149, 386, 341, 427, 323 व एससीएसटी एक्ट आदि लगवा दी गयीं।

रामनगर पुलिस ने जांच में जब उक्त मुकदमा फर्जी पाया तो सोहन सिंह ने अपनी पहुंच का इस्तेमाल कर जांच अधिकारी ही बदलवा दिया। जांच अधिकारी सीओ जीसी टम्टा ने सोहन सिंह व उसके दोनों पुत्रों को क्लीनचिट दे दी तथा 13 ग्रामीणों को दफा 307 व अन्य संगीन धाराओं का अभियुक्त बना दिया। जीसी टम्टा ने उन लोगों को भी मुकदमे में अभियुक्त बना दिया, जिन्होंने पुलिस के समक्ष सोहन सिंह के खिलाफ सच बोलने का साहस दिखाया था।

जनता के विरोध के बाद डीआईजी द्वारा मामले की पुनः तीसरी बार जांच करायी गयी। नये जांच अधिकारी एएसपी हल्द्वानी श्रीवास्तव ने सच का साथ देते हुए सोहन सिंह, उसके पुत्रों की संलिप्तता को बखूबी उजागर कर दिया तथा ग्रामीणों के आरोपों को सही पाते हुए अपनी रिपोर्ट पेश कर दी।

प्रभावित ग्रामीणों के मुताबिक सोहन सिंह ने अपने व पुत्रों के खिलाफ मुकदमे को खत्म करने को लेकर ग्रामीणों पर दबाव बनाना शुरू कर दिया। डरा-धमकाकर उनसे झूठे शपथ पत्रों पर अंगूठे भी लगवाए गये, परन्तु ग्रामीणों ने अपनी एकता व संघर्ष को बरकरार रखा और अंततः सोहन सिंह, उसके पुत्रों व गुर्गों को ग्रामीणों द्वारा दर्ज करवाए गये मुकदमे में जेल जाना पड़ा।

घटना में घायल ग्रामीण व जले हुए घरों के स्वामियों को सरकार ने नाममात्र का मुआवजा भी नहीं दिया। उल्टा तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने खनन माफिया सोहन सिंह के खिलाफ ग्रामीणों द्वारा लिखवाए गये मुकदमे वापसी की प्रक्रिया शुरू कर दी। जनता के विरोध के कारण यह प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पायी।

खुद को दलितों-पिछड़ों का रहनुमा बताने वाले अनुसूचित जाति, जनजाति संगठन, आयोग व दल बुक्सा जनजाति के ग्रामीणों की मदद के लिए आगे नहीं आए। संकट की इस घड़ी में उत्तराखंड के जन संगठन ही ग्रामीणों के साथ खड़े रहे। उन्होंने दमन विरोधी संघर्ष समिति का गठन कर ग्रामीणों के संघर्षों को आगे बढ़ाया।

इस बीच मार्च, 2015 में खनन ट्रेक्टर की चपेट में आने से गांव की एक किशोरी की मौत हो गई, जिसके बाद ग्रामीणों ने अपने खेतों के ऊपर चल रहा रास्ता बन्द कर दिया। ग्रामीणों ने कहा कि गांव का यह रास्ता हमने अपनी जमीनों पर अपनी जरुरत के लिए बनाया है। हम इस पर डम्परों व खनन वाहनों को नहीं चलने देंगे। इस पर तत्कालीन कांग्रेस सरकार सोहन सिंह के समर्थन में आ गयी तथा रामनगर एसडीएम पुलिस बल ले जाकर जबरन रास्ता खुलवाने गांव में पहुंच गये।

ग्रामीणों की एकता के आगे सोहन सिंह रास्ता खुलवाने में कामयाब नहीं हुआ। पुलिस बल को वापस लौटना पड़ा। इस सबसे बौखलाकर सोहन सिंह ने अपने गुर्गों द्वारा ग्रामीणों के संघर्ष को नेतृत्व दे रहे उपपा के महासचिव प्रभात ध्यानी व समाजवादी लोक मंच के सहसंयोजक मुनीष कुमार पर रास्ते में जानलेवा हमला करवा दिया। नामजद रिपोर्ट होने के बाबजूद भी पुलिस ने इस मामले में सोहन सिंह को गिरफ्तार नहीं किया तथा जांच में उसे फिर क्लीनचिट दे दी।

ग्रामीणों ने सोहन सिंह द्वारा अपने खिलाफ लगाए गये फर्जी मुकदमे को खारिज करने के लिए उत्तराखंड हाईकोर्ट में अपील की। हाईकोर्ट में 3 साल से भी अधिक समय तक सुनवाई के बाद सोहन सिंह द्वारा ग्रामीणों पर लगाया गया मुकदमा फर्जी साबित हुआ और हाईकोर्ट ने इसे निरस्त कर दिया था।

देखें वीडियो कांग्रेस नेता सोहन सिंह के गुंडों द्वारा हुए हमले में क्या हालत हो गई थी महिलाओं की

वीडियो को यू ट्यूब ने न दिखाया जाने वाला कंटेंट मानते हुए डिलीट कर दिया है। अगर आप वीडियो देखना चाहते हैं तो facebook.com/janjwar पर जाएं।

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