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विमर्श

स्टूडियो में वामपंथी पैनलिस्टों को नहीं बोलने देते एंकर, कॉमरेड करें जनविरोधी मीडिया का बहिष्कार

Prema Negi
3 Jun 2019 7:33 AM GMT
स्टूडियो में वामपंथी पैनलिस्टों को नहीं बोलने देते एंकर, कॉमरेड करें जनविरोधी मीडिया का बहिष्कार
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अखबार खून से सने हैं और टेलीविजन आग उगल रहे हैं। आज मीडिया युवाओं को नफरत और उन्माद से भरकर आक्रामक और हिंसापरस्त बनाने में भगवा एजेंट की तरह काम कर रहा है। चुन-चुनकर जनसरोकार की ख़बरों की हत्या की जा रही है...

सुशील स्वतंत्र का विश्लेषण

देश में लोकसभा चुनाव के परिणामों की घोषणा के बाद यह साफ हो गया है कि भारत अब एक ऐसे युग में प्रवेश कर चुका है जहां सत्ता पर जनमत के अपरहण से कब्जा किया जा चुका है। एक नया भारत जिसमें अधिकारों से अधिक कर्तव्यों पर जोर दिया जा रहा है। हमारा देश दुनिया का कोई अजूबा मुल्क नहीं है, जहां फासीवाद का उदय प्रचंड जन समर्थन और षड्यंत्रों के मिश्रित लहर की बदौलत संभव हुआ हो।

ऐसे अनेक उदाहरण हमारे सामने हैं जहां तानाशाह का स्वागत जनता ने यह सोच कर किया कि उनका कोई मसीहा आ गया है। एक तानाशाह उस विचार की पैदाईश होता है जो जनता को छद्म राष्ट्रवाद और देशप्रेम के उम्माद की भट्ठी में झोंककर उन पर राज करता है और फिर एक दिन उसी जनता को, जो उसको अपना मसीहा समझती थी, हिंसा और नफरत के जलजले के हवाले कर देता है।

हमारे देश में इस विचार को लाने के लिए मुंजे इटली गए और मुसोलिनी के फासीवादी मॉडल को भारत में कैसे लागू किया जाए इसकी रणनीति सीखकर आए। डॉ बालकृष्ण शिवराम मुंजे हिन्दू महासभा से जुड़े रहे और वे सन 1927-28 में अखिल भारत हिन्दू महासभा के अध्यक्ष भी रहे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को बनवाने में इनका बहुत बड़ा योगदान था।

संघ के संस्थापक केशव बलिराम हेडगेवार के वे राजनितिक गुरु थे। डॉ. मुंजे भारत में नागरिकों के सैनिक-शिक्षा के घोर पक्षधर थे। इतालवी लेखिका मार्जिया कोसालेरी ने 'Hindutva’s foreign tie-up in the 1930s: Archival evidence' शीर्षक से लिखे एक आलेख में लिखा है कि बीएस मुंजे पहले हिंदुत्ववादी नेता थे, जो ‌द्वितीय विश्वयुद्ध के पहले की इटली की फासीवादी सरकार के संपर्क में आए। वे हेडगेवार के मेंटॉर और गहरे दोस्त थे।

नवंबर 1930 से जनवरी 1931 तक लंदन में हुए पहले गोलमेज सम्मेलन में मुंजे हिंदू पक्ष के प्रति‌निधि के रूप में शामिल हुए थे, हालांकि कांग्रेस उनका विरोध करती रही। लेखिका कोसालेरी के मुताबिक, मुंजे ने गोलमेज सम्मेलन के बाद फरवरी से मार्च 1931 तक यूरोप का दौरा किया, जिसमें वह 15 मार्च से 24 मार्च 1931 तक इटली में भी रुके।

इटली में उन्होंने कई महत्वपूर्ण मिलिट्री शिक्षण संस्‍थानों का दौरा किया। उन्होंने उस यात्रा का जिक्र अपनी डायरी में भी किया है। इटली की राजधानी रोम में उन्होंने 19 मार्च, 1931 को मिलिट्री कॉलेज, सेंट्रल मिलिट्री स्कूल ऑफ फिजिकल एजूकेशन और द फासिस्ट अकेडमी ऑफ फिजिकल एजुकेशन को दौरा किया। जिन दो अन्य महत्वपूर्ण संस्थानों में वे गए, वे द बाल्लिया और अवांगार्दिस्त ऑर्गेनाइजेशन थे। वे दोनों ही संस्थान फासीवादी राजनीति के केंद्र थे, जहां युवाओं को फासीवादी विचारधारा का प्रशिक्षण दिया जाता था।

कोसालेरी के मुताबिक, उन संस्थानों की प्रशिक्षण पद्धति और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रशिक्षण पद्धति में अद्भुत समानताएं हैं। यह बात सही है कि आरएसएस का सांगठनिक ढांचा पहले संघ प्रमुख केशव बलिराम हेडगेवार ने तय किया था, लेकिन मुंजे ने उसे फासीवाद की लाइन पर ढालने का काम किया।

फासीवादी संस्थानों की तारीफ करते हुए मुंजे ने अपनी डायरी में लिखा है कि 'फासीवादी विचार स्पष्ट रूप से जनता में एकता स्थापित करने की परिकल्पना को साकार करता है...। भारत और विशेषकर ‌हिंदुओं को ऐसे संस्थानों की जरूरत है, ताकि उन्हें भी उन्हें भी सैनिक के रूप में ढाला जा सके।' मुंजे आगे लिखते हैं कि 'नागपुर स्थित डॉ. हेडगेवार का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ऐसा ही संस्थान है।'

फासीवादी कार्यकर्ताओं की पोशाक और शैली की तारीफ करते हुए उन्होंने लिखा है कि, मैं लड़कों और लड़कियों को सैन्य पोशाकों में देखकर मंत्रमुग्ध रह गया।' मुंजे ने 19 मार्च, 1931 को इटली की फासीवादी सरकार के मुख्यालय 'पलाजो वेनेजिया' में दोपहर 3 बजे मुसोलिनी से मुलाकात की थी।

वर्तमान समय में हमारे सामने मोदी-शाह उसी मुंजे की लिखी पटकथा के ही किरदार हैं, जिसका हेडगवार और बाद में गोलवरकर ने भारतीयकरण किया। देश को हिंदुत्व की धधकती भट्ठी में तब्दील करने की योजना एक दिन में लागू नहीं हो सकती है, यह बात संघी आकाओं को बखूबी मालूम थी, इसलिए चरणबद्ध तरीके से दीर्घकालीन योजना तैयार की गयी।



इस योजना के पहले चरण में छोटे-छोटे बच्चों में दिमाग में हिंदुत्व का जहर भरना, फासीवादी कार्यकर्ताओं के तर्ज पर भारतीयों के लिए एक परिधान (जिसे वे गणवेश कहते हैं), एक ध्वज, कठिन अनुशासन के साथ शास्त्र या शौर्य प्रशिक्षण एवं दिमागों में वैचारिक जहर भरने के लिए देश भर में शाखा का संचालन करना, समाज में धर्म और जाति की खाई को बड़ा करके लोगों के दिलों को नफरत से भर देना और विशेष वरीयता के साथ कम्युनिष्टों, मुसलमानों, दलितों और ईसाईयों पर हमले तेज करना शामिल था।

1925 में संघ की स्थापना से लेकर 1951 में जनसंघ की स्थापना के पहले तक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने पहले चरण की सुनियोजित रणनीति को देशभर में बहुत मेहनत और धैर्य के साथ लागू किया। अनेक परिधीय संगठनों और मिशन की स्थापना की गयी।

समाजसेवा के लिए 'सेवा भारती', आदिवासियों को साथ लेने के लिए 'वनवासी कल्याण आश्रम', बच्चों की शिक्षा के लिए 'सरस्वती शिशु मंदिर', महिला विंग के रूप में राष्ट्र सेविका समिति, राजनीतिक मंच के रूप में पहले जनसंघ और बाद में भारतीय जनता पार्टी, छात्र संगठन के रूप में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और अनेक संगठनों जैसे स्वदेशी जागरण मंच, विद्या भारती, दुर्गा वाहिनी, राष्ट्रीय सिख संगत, भारतीय मजदूर संघ, संस्कार भारती, विज्ञान भारती, भारतीय किसान संघ, अखिल भारतीय साहित्य परिषद इत्यादि का निर्माण संघ के पहले चरण की रणनीति के तहत किया गया।

इसके अलावा अनेक अन्य नामों से हिंदूवादी संगठनों का निर्माण और संचालन संघ की सरपरस्ती में हो रहा है। ख़ुफ़िया एजेंसियों को अभिनव भारत, सनातन संस्था और अन्य नामों के संचालित आतंकी संगठनों के लिंक भी संघ से जुड़े मिले हैं। अंग्रेजी और हिंदी में संघ की पत्रिकाएँ पाञ्चजन्य और आर्गनाइजर प्रकाशित हो रही हैं। एक बाल पत्रिका देवपुत्र भी संघ द्वारा ही पोषित है।

देश के भगवाकरण का दुसरा चरण शुरू होता है, संघ के सक्रिय राजनीति में प्रवेश से। पहले संघ का दावा था कि वह एक सांस्कृतिक संगठन है, लेकिन राजनीति में उसकी दखल से उसका दावा झूठ साबित हो जाता था, इसलिए संघ ने 1951 में भारतीय जनसंघ नमक राजनीतिक ईकाई बना दी। सभी राजनीतिक क्रियाकलाप भारतीय जनसंघ से संचालित किए जाने लगे जो बाद में 1980 में भारतीय जनता पार्टी बन गई।

भाजपा ने केंद्र में दो बार अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में सरकार बनाई और दो बार नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में। अटलकाल से ही संघ ने दूसरे चरण की रणनीति का क्रियान्वयन शुरू कर दिया था, जिसमें संचार और सूचना प्राद्योगिकी माध्यमों पर कब्जा करना प्रमुख उद्देश्य था। सरकारी ब्रॉडकास्टर के माध्यम से विशुद्ध भगवा एजेंडा परोसना उस समय संभव नहीं हो पाता, इसलिए निजी मीडिया समूहों के लिए रास्ता सुगम बनाया गया। देश में अनेक गैर-सरकारी मनोरंजन और सामाचार चैनलों की बाढ़ आ गई।

वर्तमान समय में स्थिति यह है कि देश के मीडिया का पूरी तरह से भगवाकरण हो चुका है। भारतीय मीडिया पर कुछ कॉर्पोरेट घरानों का नियंत्रण हो चुका है और मोदी उन पूंजीपतियों के तलवे चाटने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। इसमें संघ और मीडिया मालिकों दोनों का फायदा है। एक को भारत के संघीकरण से मतलब है तो दूसरे को मुनाफाखोरी से। ख़बरों के लगभग सभी चैनल संघपरस्त हो गये हैं या बोलचाल की भाषा में कहें तो आज देश का मीडिया संघ की गोद में जा बैठा है। यही कारण है कि इसको 'गोदी मीडिया' जैसे प्रचलित नाम से पुकारा जाने लगा है।

2019 के लोकसभा चुनाव के बाद तमाम जनाक्रोश और असंतोष के बावजूद मोदी के दोबारा गद्दीनशीन होते ही संघ अपने तीसरे चरण की रणनीति को लागू करेगा। इस चरण में अधिक आक्रमकता के साथ संघी एजेंडे को लागू करने के लिए संवैधानिक ढांचों और कानूनों में बदलाव किए जायेंगे।

भूमि अधिग्रहण, शिक्षा, श्रम और आरक्षण से जुड़े कानूनों को कमजोर करने के लिए पिछली सरकार में नरेन्द्र मोदी ने कदम उठाया था लेकिन राज्य सभा में बहुमत की कमी और जनाक्रोश के कारण कई बार बैकफुट पर आना पड़ा। इस बार ईवीएम हेराफेरी के कारण स्थिति पूरी तरह संघ के पक्ष में है। बहुत तेजी से भगवा मंसूबों को अंजाम पर पहुँचाया जाएगा।

सरकार के शपथ ग्रहण के तुरंत बाद नई शिक्षा नीति पर काम शुरू कर दिया गया है। अनेक पब्लिक सेक्टर कंपनियों के साथ-साथ एयर इंडिया और रेलवे को निजी हाथों में बेचने का मन भी मोदी सरकार बना चुकी है। संघ के इन काले मंसूबों को गोदी मीडिया राष्ट्रहित में बताकर देश के सामने परोस रहा है। मीडिया बहसों में भगवा एजेंडे को न्यासंगत साबित किया जा रहा है।

भाजपा को सही और अन्य राजनीतिक दलों को गलत साबित करने के मिशन में गोदी मीडिया जुट गया है। संघ की खास रणनीति के तहत मीडिया में ब्राह्मणवाद का बोलबाला कायम किया गया है। किसी भी विरोधी स्वर को आज गोदी मीडिया बर्दाश्त नहीं कर सकता है। उन सभी पत्रकारों को चुन-चुनकर अकारण ही मीडिया घरानों से बाहर निकाल दिया गया, जो मोदी और संघ के खिलाफ बोलते थे। अभिसार और पुण्य प्रसून वाजपेयी का निष्कासन इसका ताजा उदाहरण है।

अखबार खून से सने हैं और टेलीविजन आग उगल रहे हैं। आज मीडिया युवाओं को नफरत और उन्माद से भरकर आक्रामक और हिंसापरस्त बनाने में भगवा एजेंट की तरह काम कर रहा है। चुन-चुनकर जनसरोकार की ख़बरों की हत्या की जा रही है।

जनांदोलनों, लोकतांत्रिक बहसों और स्वस्थ्य खबरों को नहीं दिखाकर मीडिया भड़काऊ, नफरत और सरकार की प्रशंसा से भरी ख़बरों को परोस रहा है। भगवा एजेंडे को आगे बढाने के लिए चाहे फेक न्यूज, हेट न्यूज या प्रायोजित खबरों को ही क्यों न दिखाना पड़े, आज का गोदी मीडिया इसमें पीछे रहने वाला नहीं है। मतलब साफ़ है कि संघ के निर्देश पर गोदी मीडिया वैकल्पिक आवाजों का गला घोंट रहा है।

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सूचना क्रांति के इस आधुनिक दौर में संघ का सबसे बड़ा हथियार ही मीडिया है जो बहुत तेजी से जनमानस में भगवा जहर घोल रहा है। देश के नागरिक अंधे-बहरों की फौज की तरह तैयार हो रहे हैं, जिनका अपना विवेक धीरे-धीरे मर रहा है। ऐसे में विपक्ष का यह कर्तव्य बन जाता है कि भगवा एजेंडा परोस रहे मीडिया का पूर्ण बहिष्कार करे।

समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने बाकायदा घोषणा की है कि उनका कोई भी प्रवक्ता किसी मीडिया बहस में भाग नहीं लेगा। सोशल मीडिया के मुताबिक जनता दल सेकुलर, बहुजन समाज पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल ने भी गोदी मीडिया का बहिष्कार कर दिया है। आम आदमी पार्टी पहले से ही मीडिया बहसों में अपने प्रवक्ता नहीं भेजती है। जब पत्रकार संघ के कार्यकर्त्ता की तरह व्यवहार करने लगे और चैनल भाजपा कार्यालय की तरह संचालित होने लगे तो सभी विपक्षी पार्टियों को गोदी मीडिया का पूर्ण बहिष्कार कर ही देना चाहिए।

गौरतलब है कि संघ और भाकपा का गठन एक ही वर्ष 1925 में हुआ था। एक का उद्देश्य भारत को हिंदुत्व की राह पर चलने वाला देश बनाना था तो दुसरे का उद्देश्य समानता पर आधारित एक ऐसा मुल्क बनाना जो शोषणमुक्त हो और जहाँ मेहनतकशों के हाथ में सत्ता की बागडोर हो। समय के साथ चलते हुए आज वामपंथी विचारधारा का जनाधार खिसकता हुआ दिख रहा है वहीं संघ की विचारधारा उफान पर है।

संघ का पूरी तरह से देश की मीडिया पर कब्जा है। आज देश के मीडिया का बड़ा हिस्सा 'मुंजे मीडिया' बन चुका है। मुख्य वैचारिक विरोधी होने के नाते यह सही समय है जब वामपंथी पार्टियों को भी गोदी मीडिया के पूर्ण बहिष्कार की घोषणा कर देनी चाहिए। वैसे भी भगवा पत्रकार राष्ट्रीय चैनलों में कम्युनिस्ट नेताओं को बोलने का मौका बहुत कम देते हैं। लगभग सभी बहसों में कम्युनिस्ट नेताओं को नीचा दिखाने का प्रयास किया जा रहा है, ताकि देश में कम्युनिस्टों के प्रति नकारात्मक धारणा बन सके।

गोदी मीडिया अपनी टीआरपी बढाने के लिए वामपंथी नेताओं को टीवी स्टूडियो में बुलाकर जलील करता है। बार-बार ये सवाल पूछा जाता है कि वामपंथ का जनाधार क्यों खिसकता जा रहा है? पैनल में बैठा बीजेपी का प्रवक्ता वामपंथी नेता पर चिल्लाकर बोलता है कि एक स्थानीय निकाय की सीट तो ये जीत सकते नहीं, चले हैं मोदी को चुनौती देने।

प्रायः वामपंथी नेताओं का ऑडियो कम कर दिया जाता है और बीजेपी-संघ के प्रवक्ताओं को अधिक बोलने दिया जाता है। ऐसे में गाँव और कस्बों में बैठकर टीवी देखने वाले कॉमरेड्स का मनोबल टूट जाता है और वे यही सोचकर चुप रह जाते हैं कि ये मीडिया मोदी के तलवे चाट रहा है। आज मीडिया का जो स्वभाव हो गया है, इसमें एक कम्युनिस्ट नेता टीवी बहस में जाकर भगवा एजेंडा परोसने के मीडिया के मकसद के अप्रत्यक्ष मददगार बन जाते हैं। उनको अपनी बात को रखने का मौका नहीं मिल पाता है और जलालत अलग झेलनी पड़ती है।

स्वस्थ बहस की संस्कृति अब टीवी में खत्म हो गयी है। कम्युनिस्ट पार्टियों को गोदी मीडिया के पूर्ण बहिष्कार के विषय में अविलम्ब गंभीरता से फैसला लेना चाहिए। टीवी स्टूडियो में समय न गवांकर कम्युनिस्ट नेताओं को संगठन निर्माण और जमीनी संघर्षों पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए। वैसे भी क्रांति सोशल मीडिया और टीवी स्टूडियो में नहीं, बल्कि जमीन पर ही हो सकती है।

(लेखक सामाजिक कार्यकर्ता व पत्रकार हैं। वे हिंद वॉच मीडिया वेबसाइट के संपादक हैं। यह लेखक के निजी विचार हैं)

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