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उत्तर प्रदेश

UP में पुलिस के सामने जातीय बर्बरता का नंगा नाच, औरतों के साथ मारपीट कर छातियां नोची, 8 दिन बाद भी नहीं हुई कार्रवाई

Prema Negi
31 May 2020 11:05 AM GMT
UP में पुलिस के सामने जातीय बर्बरता का नंगा नाच, औरतों के साथ मारपीट कर छातियां नोची, 8 दिन बाद भी नहीं हुई कार्रवाई

गोविंदपुर गांव में अभी भी भारी दहशत है व्याप्त, बर्बरता की तस्वीरें और लोगों में देखा जा सकता है खौफ का माहौल, दुधमुहे को दबंगों ने उठाकर फेंक दिया, बच्चा कुएं की देहरी पर गिरा, महिला का ब्लाउज फाड़ दिया, वो बच्चे की तरफ भागी तो दबंगों में से एक ने उसकी छाती ऐसी नोची की खून टपक पड़ा...

मनीष दुबे की रिपोर्ट

जनज्वार। उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ में 22 मई 2020 को थाना कोतवाली पट्टी के ग्राम गोविंदपुर, में जातीय हिंसा हुई थी। कुर्मी (पटेल) जाति के लोगों के कुछ घर जला दिए गए। कुर्मियो के खेत में ऊंची जाति यानी ब्राह्मण जाति के दबंग लोग जानवर छोड़ दे रहे थे, जिसका दबा विरोध काफी दिनों से चल रहा था।

पीड़ित परिवार कहते हैं, 22 मई को एक-दो जानवरों को खेत के मालिक ने दौड़ा लिया, जिससे दबंग जाति के लोग भड़क गए। पड़ोसी मजरों तक पटेलों को दौड़ाकर मारा-पीटा और उनके घरों पर हमला बोल दिया गया। घर में घुसे। मारपीट, लूटपाट, छेड़छाड़ की। घरों के मवेशी जिंदा फूंक दिए गए। सबसे भीतर के कमरे में सोई महिला की छाती पर झपट्टा मारा। 3 माह का बच्चा माँ की छाती में चिपका, दूध पीता हुआ अधसोया हुआ था। उस दुधमुहे को दबंगों ने उठाकर फेंक दिया। बच्चा कुएं की देहरी पर गिरा। महिला का ब्लाउज फाड़ दिया। वो बच्चे की तरफ भागी तो दबंगों में से एक ने उसकी छाती ऐसी नोची की खून टपक पड़ा और जो जहां मिला उसे लाठी-डंडों से बेतहाशा पीटा गया। सिर फ़टे, इज्जत लुटी।

ऐसे फूंक दिये दबंगों ने कुर्मी परिवारों के घर

स मामले का वीडियो एक युवक ने बचते बचाते बना लिया, जो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। किसी तरह पटेलों ने पुलिस को फोन किया। पीड़ित कहते हैं, पुलिस आई जरूर, मगर हम पर हमला रुका नहीं, दबंगों का तांडव जारी रहा। दरोगा-सिपाही की मौजूदगी में बर्बरता हुई। इसके बाद गांव में पटेल बिरादरी के नेताओं का जमघट लगा है। कुछ आंसू पोछने गए, कुछ शोहरत बटोरने। अब वहां पुलिस का पहरा है।

स मामले की रिपोर्टिंग करने प्रतापगढ़ के गोविंदपुर पहुंचे वरिष्ठ पत्रकार बृजेन्द्र प्रताप सिंह कहते हैं, गांव की सीमा पर तैनात पुलिस इंस्पेक्टर सुशील कुमार सिंह और उनके साथ मौजूद सब इंस्पेक्टर बच्चन राम और अन्य सिपाहियों ने गांव के अंदर घटनास्थल तक उन्हें जाने से रोक दिया। इंस्पेक्टर ने कहा कि कोई गाँव के अंदर नहीं जा सकता। जब उन्होंने बताया कि वह पत्रकार हैं और उत्तर प्रदेश के सूचना एवं जनसंपर्क विभाग से अधिमान्य भी हैं। अगर जिला मजिस्ट्रेट का ऐसा कोई आदेश हो कि पत्रकार घटना स्थल पर नहीं जाएगा तो दिखाया जाए। इंस्पेक्टर एक घण्टे तक धमकाते रहे, जलील करने की कोशिश की, मुकदमे की धमकी देते हुए वीडियोग्राफी कराते रहे और कहा कि जो मैं कह रहा हूँ, होगा वही। उन्होंने ताना दिया कि पत्रकार हैं तो कानून तोड़ेंगे।

त्रकार बृजेन्द्र ने जब कहा कि मुझे घटनास्थल तक जाने दें, अकेला जाऊंगा, परन्तु इंस्पेक्टर लगातार कहते रहे कि 10 गाड़ी में 100 आदमियों के साथ आये हो, जबकि डॉ हरिश्चन्द्र पटेल लगातार इसका वीडियो बनाते रहे, सही तथ्य भी रखते रहे। तब तक गांव की पीड़ित महिलाएं भी पुलिस बैरिकेडिंग तक आ गईं। मैंने फिर निवेदन किया कि मुझे घटना स्थल तक जाने दें। इंस्पेक्टर ने मेरे कान के पास आकर कहा कि क्यों जेल जाना चाहते हो, ऊपर से आदेश है। अंदर गए तो मुकदमे के लिए तैयार रहना। मैंने कहा कि पहचान पत्र की फोटो ले लीजिए। लाठी मत तानिये और विधि सम्मत जो भी करना हो वह कीजिये। मैं घटनाघटन तक जाऊंगा जरूर। मीडिया पर बंदिश का कोई आदेश दिखा देंगे तो यहीं से लौट जाऊंगा।

स पर इंस्पेक्टर बोले, जाओ करो नेतागीरी... जाओ 100 लोग लेकर जाओ... धमकी देकर इंस्पेक्टर ने बेरिकेडिंग खोल दी तो मैं पैदल ही घटनास्थल के लिए चल दिया। अभी तक मुझे नहीं मालूम कि पुलिस ने कोई रिपोर्ट दर्ज की या सिर्फ डरा धमकाकर इंस्पेक्टर मुझे वहीं से वापस कर देना चाहते थे।

प्रतापगढ़ में पुलिस के संरक्षण में गोविंदपुर गांव में सामंतों ने पटेल बिरादरी के किसानों-मजदूरों के घर जलाये हैं। इस आगजनी, बर्बरता की रिपोर्ट स्थानीय पुलिस ने 8 दिनों तक नहीं दर्ज की, जबकि हमलावर पक्ष की रिपोर्ट भी लिखी और पीड़ितों में से कई को गिरफ्तार करके जेल भेज दिया। तथ्यों की पड़ताल में यह सामने आया कि कुछ महिलाएं और लड़कियां कई दिनों हवालात में रखी गईं। बाद में पीड़ित परिवारों की जाति के कुछ सांसद-विधायक और दूसरे लोग गांव गए तो पुलिस ने हवालात में अवैध रूप से बंद की गईं लड़कियों को छोड़ दिया। इसके बाद भी गोविंदपुर के पीड़ित पक्ष की रिपोर्ट दर्ज नहीं की गई। गोविंदपुर गांव की सीमाओं पर पुलिस का पहरा लगा दिया गया। जो भी लोग पीड़ितों से सहानुभूति जताने गए, उनके खिलाफ अलग अलग धाराओं में मुकदमे दर्ज कर दिए गए। मुख्य धारा की मीडिया से जुड़े पत्रकार एक हफ्ते में इन पीड़तों के पास नही गए।

पीड़ितों ने इस जातीय बर्बरता के पीछे उत्तर प्रदेश सरकार के एक मंत्री पर मिलीभगत के आरोप लगाए जा रहे हैं। जिले के एसपी और डीएम का पीड़ितों के पक्ष में कोई वैधानिक कदम न उठाया जाना इस आरोप को और बल दे रहे हैं। मंत्री के खिलाफ लगातार सोशल मीडिया पर आरोप लग रहे हैं। पुलिस ने जातीय टिप्पणियों पर कुछ लोगों के खिलाफ रिपोर्ट भी दर्ज की है। पीड़ित पटेल जाति के लोग और हमलावर जाति के लोगों की टिप्पणियों, बयानों से समाज में जातीय वैमनस्यता फैल रही है। यह दूसरे गांवों से होते हुए अन्य जिलों तक भी पहुँच रही है।

जातीय हिंसा की इस भयानक घटना के 8 दिनों बाद भी 30 मई तक गोविंदपुर के पीड़ितों की रिपोर्ट नहीं लिखी गई है। मौके पर पहुंचे पत्रकार बृजेन्द्र कहते हैं, 'मेरे बनाये वीडियो में महिलाएं यह सच बताती हुई दिखेंगी। सोशल मीडिया में कुछ लोग क्रेडिट के लिए भले नए नए वीडियो जारी करते हुए दिखें। हकीकत ये है कि घटनास्थल तक न जिले के पुलिस कप्तान गए न ही जिलाधिकारी। राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग द्वारा इस घटना का स्वत संज्ञान लेकर 25 मई 2020 को डीएम से रिपोर्ट तलब की गई तो उन्होंने दूसरे दिन मजिस्ट्रेटी जांच के आदेश कर दिए। एक विधायक के पत्र पर एडीजी ने पुलिस क्षेत्राधिकारी के नेतृत्व में जांच के आदेश कर दिए। मगर इन जांच आदेशों के 4-5 दिन बीत जाने के बाद भी कोई जांच अधिकारी घटना स्थल पर नहीं पहुँचा।

भी भी गाँव में भारी दहशत है। बर्बरता की तस्वीरें, लोगों में खौफ देखा जा सकता है। बृजेन्द्र प्रताप बताते हैं कि जिस कुएं की तरफ तीन माह के बच्चे को दबंगों ने फेंका था, उस कुएं में वहीं की लड़कियों और महिलाओं के रंग भरे हैं। लाल, गुलाबी, पीले तमन्नाओं के रंग से कुएं को सजा रखा है। उसी से पटेलों की बस्ती पानी पीती है। दबंगों ने घरों का सामान, साइकिल और आटा, बर्तन सब इसी कुएं में फेंके हैं।

अपनी तकलीफ बताती कुर्मी समाज की पीड़ित महिला

पीड़ित कहते हैं, दबंगों ने इस बस्ती के हैंडपम्प तोड़ दिए। उखाड़ नहीं सके तो पाइप काट दिए। कटहल के पेड़ पर सामन्तों की क्रूरता दिखी। एक युवती के वक्षस्थल पर दराती लेकर दबंग ने हमला बोलना चाहा तो बुजुर्ग महिला बीच में आ गई, उसे जमकर पीटा—डराया। कटहल के फलों को वक्ष की तरह काटते हुए इस दबंग ने कहा...ज्यादा बोलेगी तो पूरे मोहल्ले की लड़कियों का यहीं 'खतना' कर दूँगा। खता सिर्फ इन औरतों की इतनी है कि ये गरीब, पिछड़ी जाति की हैं और खेतों में जानवर जाने से मना कर रही थीं।

गांव तक पहुंचे पत्रकार बृजेंद्र प्रताप कहते हैं, '17 साल की लड़की को सिपाही के हाथ में रखा बांस का बेंत दिखाते हुए एक एक दबंग ने धमकाया था कि यही लट्ठ ऐसी जगह डाल दूंगा कि बच्चा पैदा करने लायक नहीं बचोगी, यह हल्ला मचाते हुए दबंगों ने सामने के घर में लगे नए बिजली के बॉक्स, टाइल्स, टीवी, पंखे इसलिए तोड़ और नोच दिए कि मड़ई की जगह पक्के घर में सुहागरात मनाओगे... गांव की औरतों ने मुझे जो बताया वह इससे अधिक लिखने लायक नहीं था।'

त्रकार बृजेन्द्र आगे कहते हैं, 'औरतें, लड़कियां आईं, बोलीं घर के 5 लोग जेल में हैं। मिलाई करवा देव साहब। मैंने यूपी के जेल मंत्री से बात करने का वचन दिया उनको। मैं कानपुर उस मरहूम पत्रकार प्रमोद तिवारी का साथी हूँ जो डाइरेक्ट जर्नलिज्म की बात करता रहा... मैं उसी दिशा का एक पथिक हूँ। ऐसे में direct journalism के लिए मैं इस पीड़ितों के हक में रिपोर्ट भी लिखूंगा, उनकी तहरीर भी। उनके मुआवजे की मांग करती हुई चिट्ठी भी। जरूरत हुई तो गणेश शंकर विधार्थी को याद करते हुए धरना भी दे सकता हूँ। दिया भी और आगे भी पत्रकारीय सरोकार निभाने को संकल्पित हूँ। आप तमाम पत्रकारों से भी यही आग्रह करूंगा कि तटस्थ न रहिये। सच के लिए लड़िये...उसका उद्घाटन कीजिये। झूठे नेताओं के नकाब नोचिये। जालिम दरोगाओं के बिल्ले नोचिये; पर हाथ से नहीं, कलम से।'

पीड़ित किसानों के सब्जी के खेत इसलिए सूख रहे हैं कि गांव के मर्द पुलिस के खौफ से भागे हैं और पम्पिंग सेट चलाने के लिए डीजल लाने वाला कोई नहीं। एक युवती सायकिल से डीजल लाई तो उसे एक सिपाही ने ही फेंक दिया। रोते हुए लोगों की आंख का खारा पानी देखने के लिए वहां कोई तो जाए। इस जातीय हिंसा के समाचार भी देश की कथित मुख्य धारा की मीडिया ने सिर्फ पुलिस की एफआईआर के आधार पर ही लिखे। वह भी जिले स्तर पर ही कवर किए गए। यह भी पीड़ितों के साथ अन्याय की तरह है।

जीरो FIR के आदेश हैं, 8 दिन में रिपोर्ट दर्ज नहीं

सुप्रीम कोर्ट कई बार आदेश दे चुका है कि पीड़ितों की प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) हर हाल में दर्ज की जाए। जीरो एफआईआर का भी प्रावधान है। मुख्यमंत्री आदित्यनाथ खुद भी कह चुके हैं कि एफआईआर दर्ज हो। डीजीपी ने थाने में रिपोर्ट दर्ज न होने की बढ़ती शिकायतों के आधार पर पुलिस कप्तानों के दफ्तर में ही एक विशेष सेल बनाकर रिपोर्ट दर्ज किए जाने की व्यवस्था की है। इसके बाद भी गोविन्दपुर गाँव के पीड़ितों की रिपोर्ट न लिखना पुलिस की भूमिका को संदेह में लाती है। हमलावर पक्ष की तरफ से इसी पुलिस ने 11 नामजद और 50 अन्य लोगों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करके कई लोगों को जेल भेज दिया है। थाने में बनी शांति समिति की बैठक तक नहीं बुलाई गई है।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माले) की राज्य इकाई ने प्रतापगढ़ जिले में किसानों पर सामंत-पुलिस गठजोड़ के हमले की कड़ी निंदा की है। भाकपा की राज्य इकाई माले ने प्रतापगढ़ में किसानों पर हमले की निंदा करते हुए जल्द कार्रवाई की मांग की है। राज्य सचिव के नेतृत्व में टीम ने घटनास्थल का दौरा किया। कहा कि योगी सरकार में सामंती दबंगों का मनोबल बढ़ा हुआ है।

पार्टी के राज्य सचिव सुधाकर यादव के नेतृत्व में तीन सदस्यीय जांच टीम ने जिले में पट्टी तहसील के गोविंदपुर व परिषद गांवों में घटनास्थल का दौरा किया। बीते रविवार यानी 24 मई को हुई घटना में सामंती ब्राह्मण दबंगों ने पुलिस को बुलाकर तथा उसकी मौजूदगी में पिछड़े वर्ग के पटेल किसानों पर बर्बर हमला कर दिया था। इसके अलावा किसानों के घरों में आग लगा दी, जिसमे दो भैंसें जल कर मर गईं। किसानों की तरफ से भी इस हमले का प्रतिवाद हुआ। इस पर पुलिस ने 11 नामजद व 50 अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर 11 किसानों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। धर-पकड़ व दहशत से ज्यादातर किसान गांवों से पलायन कर चुके हैं।

राज्य कार्यालय सचिव अरुण कुमार ने कहा कि उत्तर प्रदेश की योगी सरकार में सामंती दबंगों का मनोबल बढ़ा हुआ है और लॉकडाउन के दौरान भी कमजोर वर्गों पर हमले की घटनाएं खूब हो रही हैं। भाजपा सरकार में दबंग हमलावरों को पुलिस प्रशासन का संरक्षण मिला हुआ 8 और कमजोर लोगों की कहीं सुनवाई नहीं हो रही है। उन्होंने उक्त घटना की स्वतंत्र व निष्पक्ष जांच, सामंती दबंगों व उनका पक्ष लेने वाले पुलिस अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई और पीड़ित किसानों का उत्पीड़न फौरन रोकने की मांग की।

मूल झगड़े की वजह गांव के सवर्ण समुदाय की भैंस द्वारा दलित किसान के खेतों में खड़ी फसल नष्ट कर देना था, जिसमें गांव के अमर तिवारी की भैंस ने पटेल किसान की खेती का नुकसान किया, जिसकी शिकायत किसान महिला ने तिवारी के घर पर जाकर की थी। इसे सामंती धाक को चुनौती समझ तिवारी ने महिला के घर पर चढ़कर उसके पति की बुरी तरह पिटाई की। इस घटना का भी किसानों ने जोरदार विरोध किया। बाद में पुलिस के साथ मिलकर सामंतों ने किसानों के ऊपर हमला बोल दिया। अभी भी किसानों में रोष और भय व्याप्त है। माले की नियुक्त जांच टीम में राज्य सचिव के साथ कर्मचंद वर्मा व अमर बहादुर पटेल थे।

मुख्यमंत्री योगी ने प्रदेश के हर जिले में एक मंत्री को प्रभारी बनाया है। मुख्य सचिव ने भी एक एक जिले की जिम्मेदारी शासन में बैठे अफसरों को दे रखी है। इसके बाद भी बर्बर जातीय हिंसा के घटना स्थल तक न डीएम गए न एसपी। मीडिया पर कोतवाल सुशील कुमार सिंह ने पाबन्दी लगा रखी है।

प्रतापगढ़ में हुई जातीय हिंसा ने कुर्मी समाज के अंदर मौजूदा सत्ता के शीर्ष नेतॄत्व के खिलाफ नाराजगी बढाने का काम किया है।

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