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सिक्योरिटी

धर्म के नाम पर वोट देंगे फिर भूखे पेट ही सोएंगे

Janjwar Team
15 Dec 2017 1:44 PM GMT
धर्म के नाम पर वोट देंगे फिर भूखे पेट ही सोएंगे
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भाजपा से किसी भी मुद्दे पर प्रश्न पूछने वाले को सब मिलकर देशद्रोही घोषित कर देते हैं। पेट्रोल-टमाटर के बढ़ते दाम पर पूछें तो अंधभक्त एक सुर में पोस्टबाजी पर उतर आते हैं कि हमने भाजपा को सस्ती चीजों के लिए नहीं चुना, बल्कि मुल्लों को बाहर खदेड़ने के लिए चुना है...

मनु मनस्वी

विकास, रोजगार, गरीबी आदि मुद्दों की बजाय सत्ता के मठाधीश जब बेवकूफाना मुद्दों पर पिले पड़े हों तो सोचकर हंसी आती है कि क्या संविधान बनाते वक्त कभी अंबेडकर ने भी यह सोचा होगा कि सत्ता में बैठकर राजनेता और सरकारें जनता को धरातली मुद्दों से इतर ऐसे वाहियात मसलों में उलझा देंगी, जिनका कोई अर्थ ही न हो।

अब कोई जनेऊ पहने या नहीं, तिलक लगाए या नहीं, धोती पहने या कुर्ता-पायजामा, टोपी पहने या मूंछ रखे, मीट खाए या साग-सब्जी, इससे किसी दूसरे को क्या लेना देना? लेकिन नहीं, राजनेता इन्हीं सबको मुद्दा बना रहे हैं। और मुद्दा भी इतना बड़ा कि प्रिंट से लेकर इलेक्ट्रानिक और सोशल मीडिया तक इसमें डुबकी मारते-मारते यह भूल जाते हैं कि समाज के अन्य जनहित से जुड़े मुद्दे उनकी नजर में आने की बाट जोह रहे हैं।

मां बेटे की सरकार, रेनकोट वाले प्रधानमंत्री, करोड़ों रुपए की गर्लफ्रेंड जैसे कटाक्ष अब ‘नीच’ जैसे शब्दों में वापस मिल रहे हैं तो इसको ही मुद्दा बनाकर पूरे दलित समाज को अपमान बताकर क्या साबित करना चाहते हैं आप? क्या जनता ने इन झूठे आंसुओं के लिए आपको चुना था कि आप जनता का चैकीदार कह कहकर अपने चरणभाटों द्वारा देश के पापा साबित कर दिए जाएं?

अब क्या यह आश्चर्य नहीं कि हिंदुत्व का डंका पीटने वाली भाजपा के दिग्गज सुशील मोदी ने घोषणा की है कि तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं को आर्थिक सहायता दी जाएगी। क्या यह मुस्लिम वोट बैंक को इस्तेमाल करने की राजनीति नहीं? और अगर है तो हिुदुत्व का ढोंग क्यों? खुलकर कहिये कि आप भी राजनीति की रोटी भकोसने के लिए उसी पंगत में बैठे है, जहां सभी पार्टियां पहले से तशरीफ टिकाए बैठी हैं।

पता है हम 1857 का युद्ध क्यों हारे? इसलिए नहीं कि हममें युद्ध कौशल या साहस की कमी थी। या इसलिए नहीं कि हमारे पास ब्रिटिश सेना के मुकाबले सैनिक कम थे। इसलिए कि अंग्रेज उस समय के लिहाज से अत्याधुनिक तोपों से हमला कर रहा था और हमारे सेनापति हाथियों पर बैठकर उनसे लड़ने और जीतने का ख्वाब देख रहे थे। वे तोपों का मुंह खोल रहे थे और हम तीर भालों और तलवार से उनका मुकाबला कर रहे थे। कई सैनिकों की मौत इसलिए भी हुई क्योंकि तोपों की आवाज सुनकर हाथी पगला गए और अपने ऊपर बैठे सैनिकों को ही गिरा दिया। हाथी वैसे भी घोड़े के मुकाबले सुस्त होता है सो उसे संभालना ही किसी युद्ध से कम न था।

लेकिन नहीं, हमारे पुरखों ने हाथी पाले तो हम उन्हें ही ढोएंगे। वहीं लखनऊ के एक नवाब का भी किस्सा खूब चर्चित है, जो अंग्रेजों के आक्रमण के बाद भी केवल इसलिए अपने महल से बाहर नहीं निकला, क्योंकि उसे जूते पहनाने वाला नौकर गायब था, सो जूते खुद कैसे पहनते? महल के भीतर ही धर लिए गए।

160 वर्षों बाद भी हम उन्हीं पुरानी दकियानूसी सोच को ढोए जा रहे हैं, जिसका फायदा उठाकर राजनेता अपनी रोटियां सेंक रहे हैं। राजनेताओं को पता है कि जिस दिन जनता धर्म, जाति, भूख, गरीबी, बेरोजगारी आदि मुद्दों से ऊपर उठकर सत्ता से प्रश्न करने लग जाएगी, उस दिन राजनेताओं का खेल खत्म। इसलिए सरकारें हमें इन्ही मुद्दों पर उलझाए रखना चाहती हैं। वर्ना क्या कारण है कि चुनाव में गरीबी हटाने, बेरोजगारी कम करने, दलितों का उद्धार करने जैसे दावे करके सत्ता पर काबिज होने वाली सरकारें अब तक इस ओर कुछ नहीं कर पाईं। ग्लोबल हंगर इंडेक्स में हम बांग्लादेश और पाकिस्तान जैसे मुल्कों से भी गए गुजरे हैं।

सीबीआई को सरकारी तोता कहने वाली भाजपा ने सत्ता में आने के बाद कई कदम आगे बढ़कर मीडिया और सोशल मीडिया को जिस प्रकार अपनी रखनी बना दिया है, वह भविष्य की राजनीति की स्याह तस्वीर ही पेश करती है। सोशल मीडिया में रोजगार पर रखे हुए युवा तुर्क सुबह से शाम तक मोदीगान के लिए चुन चुनकर हर छोटी-बड़ी खबर को मोदी की उपलब्धि बताकर वेतन पा रहे हैं।

ऐसे ठप्पमति अंधभक्त पैदा किए जा रहे हैं, जिनका बौद्धिक स्तर भले ही नर्सरी कक्षा के छात्र से भी निम्नतर हो, लेकिन भाजपा से किसी भी मुद्दे पर प्रश्न पूछने वाले को सब मिलकर देशद्रोही घोषित कर देते हैं। पेट्रोल-टमाटर के बढ़ते दाम पर पूछें तो अंधभक्त एक सुर में पोस्टबाजी पर उतर आते हैं कि हमने भाजपा को सस्ती चीजों के लिए नहीं चुना, बल्कि मुल्लों को बाहर खदेड़ने के लिए चुना है।

तो अंधभक्तो! कल तक महंगाई पर छाती क्यों पीटते थे? जबकि कागजी हकीकत यह है कि बीते तीन वर्षों में हमारे शहीद जवानों की संख्या में इजाफा हुआ है और पाकिस्तान का रुख मोदी के आने के बाद रत्तीभर भी नहीं बदला है कश्मीर मुद्दे पर। बल्कि अब तो फारुख अब्दुल्ला जैसे नेता खुलकर पीओके को पाकिस्तान को सौंपने की बात कहने का साहस दिखा रहे हैं, जिस पर भाजपा मौन है।

हाल ही में चहुंओर पद्मावती का मुद्दा छाया हुआ था, अब कहां है विरोध? पद्मावती के मुद्दे के बीच क्या आपको पता है कि जूनियर शाह का मुद्दा कहां गया? गोरखपुर में मारे गए मासूमों का मुद्दा कहां गया, जिस पर होना तो यह चाहिए था कि जनता सरकार का गिरेबां पकड़कर उनसे प्रश्न करती।

कहीं नजर आ रहे हैं आपको ये मुद्दे? क्यों? क्योंकि सरकार ने खुद ही अपने कुछ दलाल रख छोड़े हैं, जिनका काम ही है ऐसे मुद्दों को लपकना। कल को कोई आश्चर्य नहीं कि विरोध करने वाले किसी पार्टी का दामन थामकर सत्ता का सुख भोग रहे हों।

जरा बिचारिएगा इस पर। वर्ना फिर कोई नया मसीहा तलाशिये जो हम जसे मूर्खों को फिर से भूख से मुक्ति का, गरीबी को छूमंतर करने का पुराना सपना नई बोतल में डालकर दिखाए...

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