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RSS प्रमुख भागवत का भक्तों को दिया दिव्यज्ञान, स्वदेशी का मतलब विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार नहीं

Janjwar Desk
13 Aug 2020 3:55 AM GMT
RSS प्रमुख भागवत का भक्तों को दिया दिव्यज्ञान, स्वदेशी का मतलब विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार नहीं
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मोहन भागवत ने कहा देश की आजादी के बाद जिस तरह की आर्थिक नीतियों की जरूरत थी, उस तरह की नीतियां नहीं बन सकीं, उस समय पाश्चात्य देशों के मॉडल का अंधाधुंध अनुकरण किया गया...

नई दिल्ली। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सर संघचालक मोहन भागवत ने आत्मनिर्भर भारत अभियान पर बोलते हुए विकास के तीसरे मॉडल की जरूरत पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आत्मनिर्भर भारत की बात इसी के आधार पर की है।

संघ प्रमुख ने प्रो राजेंद्र गुप्ता की दो पुस्तकों का बुधवार 12 अगस्त को ऑनलाइन विमोचन करते हुए स्वदेशी मुहिम और विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार के मुद्दों पर भी चर्चा की। संघ प्रमुख ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि स्वदेशी का मतलब विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार नहीं है, लेकिन विदेशी सामानों को अपनी शर्तों पर हमें लेना है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर संघचालक मोहन भागवत ने कोरोना के दौर में नए विकास मॉडल पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि देश की आजादी के बाद जिस तरह की आर्थिक नीतियों की जरूरत थी, उस तरह की नीतियां नहीं बन सकीं। उस समय पाश्चात्य देशों के मॉडल का अंधाधुंध अनुकरण किया गया। भारत के अनुकूल नीति नहीं तैयार हुई। हालांकि संघ प्रमुख ने मौजूदा समय इस दिशा में हो रहे प्रयासों पर संतोष जाहिर किया।

संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि पहले एक मॉडल में कहा गया कि मनुष्य की सत्ता है और दूसरा कहता है कि समाज की सत्ता है। ऐसा विचार आया कि दुनिया को एक वैश्विक बाजार बनना चाहिए, लेकिन कोरोना काल की परिस्थितियों में अब विकास के तीसरे मॉडल की जरूरत है, जो मूल्यों पर आधारित हो।

भागवत ने कहा कि ज्ञान के बारे में दुनिया से अच्छे विचार आने चाहिए। अपने लोगों, अपने ज्ञान, अपनी क्षमता पर विश्वास रखने वाला समाज, व्यवस्था और शासन चाहिए। सरसंघचालक ने कहा कि भौतिकतावाद, जड़वाद और उसकी तार्किक परिणति के कारण व्यक्तिवाद और उपभोक्तावाद जैसी बातें आई। ऐसा विचार आया कि दुनिया को एक वैश्विक बाजार बनना चाहिए और इसके आधार पर विकास की व्‍याख्‍या की गई।

उन्होंने कहा कि इसके फलस्वरूप विकास के दो तरह के मॉडल आए। इसमें एक कहता है कि मनुष्य की सत्ता है और दूसरा कहता है कि समाज की सत्ता है।

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