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मंत्री सतीश चंद्र द्विवेदी के भाई को गरीबी कोटे से प्रोफेसर बनाने का कुलपति को मिला इनाम, राज्यपाल ने बढ़ाया कार्यकाल!

Janjwar Desk
24 May 2021 12:47 PM GMT
मंत्री सतीश चंद्र द्विवेदी के भाई को गरीबी कोटे से प्रोफेसर बनाने का कुलपति को मिला इनाम, राज्यपाल ने बढ़ाया कार्यकाल!
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सतीश चंद्र द्विवेदी योगी के वही ​बेसिक शिक्षा मंत्री हैं, जो पंचायत चुनाव में कोविड से मरे हजार से भी ज्यादा शिक्षकों की मौत के बाद सार्वजनिक बयान देते हैं कि सिर्फ 3 की मौत हुई 

अपनी रसूख का लाभ उठाते हुए बेसिक शिक्षा मंत्री सतीश चंद्र द्विवेदी ने अपने भाई का चयन करा लिया और बदले में कुलपति के समाप्त हुए कार्यकाल को आगे बढ़ाने में मदद पहुंचाई....

जितेंद्र उपाध्याय की रिपोर्ट

जनज्वार। सिद्धार्थ विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर एक नियुक्ति को लेकर आरोपों से घिरे बेसिक शिक्षा मंत्री और कुलपति अब विपक्ष के बीच निशाने पर हैं। इसी बहाने एक बार फिर वर्ष 2019 में दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय में शिक्षकों की नियुक्ति में फर्जीवाड़ा के लगे आरोपों का मामला लोगों के जेहन में ताजा हो गया है, जिसमें सिद्धार्थ विश्वविद्यालय के कुलपति के बेटे समेत कई लोगों का नियमों को ताक पर रखकर कर चयन करने का आरोप लगा था। लेकिन जांच व करवाई ठंडे बस्ते में पड़ा रहा।

लोग सवाल करन लगे हैं कि जो योगी सरकार नियुक्तियों में पारदर्शिता रखने व अनियमितता मुक्त रखने की बात करती थी, वही हर भर्ती में दागदार साबित हो रही है। मंत्री ही नहीं योगी सरकार में कुलपतियों पर भी नियुक्ति में खेल के मामले लगातार उठ रहे हैं।

भर्ती में अनियमितता का ताजा प्रकरण सिद्धार्थ विश्वविद्यालय सिद्धार्थ नगर का है, जहां ईडब्ल्यूएस कोटे के एकमात्र एसोसिएट प्रोफ़ेसर के पद पर विश्वविद्यालय को कोई सामान्य वर्ग में गरीब अभ्यर्थी नहीं मिला और बेसिक शिक्षा मंत्री सतीश चंद्र द्विवेदी के सगे भाई की नियुक्ति कर डाली। ऐसे में आरोप लग रहा है कि अपनी रसूख का लाभ उठाते हुए बेसिक शिक्षा मंत्री ने अपने भाई का चयन करा लिया और बदले में कुलपति के समाप्त हुए कार्यकाल को आगे बढ़ाने में मदद पहुंचाई।

भर्ती में अनियमितता का यह है आरोप

सिद्धार्थ विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान विभाग में दो एसोसिएट प्रोफ़ेसर के पद पर रिक्तियां निकली थीं, जिसमें एक पद ईडब्ल्यूएस व दूसरा ओबीसी के लिए आरक्षित है। ईडब्ल्यूएस के पद पर इटवा तहसील के शनिचरा निवासी डॉ. अरुण कुमार द्विवेदी की नियुक्ति हुई है। ये बेसिक शिक्षा मंत्री सतीश चंद्र द्विवेदी के सगे छोटे भाई हैं। ये पहले से राजस्थान के वनस्थली विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं।

सवाल उठ रहा है कि आखिर इनका अल्प आय वर्ग (ईडब्ल्यूएस) का प्रमाणपत्र कैसे जारी हो गया। मानकों के अनुसार ईडब्ल्यूएस के लिए पात्रता यह है कि वार्षिक आय 8 लाख रुपए से अधिक नहीं होनी चाहिए। साथ ही खेती योग्य जमीन पांच एकड़ तक व मकान एक हजार वर्ग फुट तक हो, जबकि शहरी क्षेत्र में 900 वर्ग फुट से अधिक आवासीय भूमि न हो।

खास बात है कि अरुण कुमार द्विवेदी सिद्धार्थ विश्वविद्यालय में आवेदन करने के पूर्व से ही राजस्थान के वनस्थली विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत रहे हैं। इस पद के उच्च वेतनमान के बाद भी इनका अल्प आय वर्ग का प्रमाण पत्र कैसे जारी हो गया। लेखपाल छोटई प्रसाद इस बारे में पूछने पर पहले तो कहते हैं कि 'मैंने कोई प्रमाणपत्र जारी करने के संबंध में रिपोर्ट नहीं लगाई थी', लेकिन बाद में रिपोर्ट लगाने की बात स्वीकार करते हुए वर्ष 2019 में अरुण द्विवेदी कि वार्षिक आय आठ लाख रुपए से कम होने की बात करते हैं।

प्रमाणपत्र को लेकर सवाल उठाए जाने पर इटवा के एसडीएम उत्कर्ष श्रीवास्तव का कहना है कि तहसील से प्रमाणपत्र जारी होता है। प्रमाण पत्र को लेकर कोई शिकायत मिलती है तो जांच कराई जाएगी।

कुलपति डॉ सुरेंद्र दुबे का आरोपों से पुराना नाता

सिद्धार्थ नगर विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ सुरेंद्र दुबे भी आरोपों के घेरे में हैं। सवाल यह उठाया जा रहा है कि अरुण कुमार द्विवेदी से अधिक एक अन्य आवेदक के अंक थे, पर उसे साक्षात्कार में फेल कर दिया गया। अब दूसरी तरफ डॉ. सुरेंद्र दुबे का कार्यकाल बढ़ाने में बेसिक शिक्षा मंत्री द्वारा मदद किए जाने की बात कही जा रही है। कुलपति का कार्यकाल 21 मई को समाप्त हो रहा था। इसके एक दिन पूर्व अपने अधिकारों का प्रयोग करते हुए कुलाधिपति सुश्री आनंदीबेन पटेल ने नियमित कुलपति की तैनाती होने तक इनके कार्यकाल को विस्तारित कर दिया है।

यह भी पढ़ें : बेसिक शिक्षा मंत्री बोले, पूरे UP में चुनाव के बाद कोरोना से सिर्फ 3 शिक्षक मरे, लेकिन उन्हीं के ​जिले में 18 शिक्षकों की मौत

विपक्ष का आरोप है कि कुलपति ने इसी लाभ का ऋण बेसिक शिक्षा मंत्री को चुकाया है। अब बात करते हैं कुलपति डॉक्टर दुबे के पूर्व में अपने पुत्र की नियुक्ति संदर्भ का। वर्ष 2019 में दीनदायल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग में कुलपति डॉ. दुबे के पुत्र डॉ. प्रत्यूष दुबे का चयन भी विवादों के घेरे में था। कहा जाता है कि चयन के दौरान विभागीय कमेटी ने यह रिपोर्ट लगायी थी कि प्रत्यूष नियुक्ति के लिए अहर्ता ही नहीं रखते हैं। यह बात विभाग के दस्तावेजों में दर्ज है। इसके बाद भी नियमों को ताक पर रखकर उनका चयन कर लिया गया।

गोरखपुर विश्वविद्यालय में बड़ी संख्या में फर्जी तैनाती की मिली थी शिकायत

वर्ष 2019 दीनदयाल उपाध्याय विश्वविद्यालय, गोरखपुर में नियुक्ति में फर्जीवाड़ा का आरोप लगा था। इसको लेकर विश्वविद्यालय कार्यसमिति के सदस्य व डॉ. राम मनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय अयोध्या के पूर्व कुलपति डॉ राम अचल सिंह ने शिकायत की थी।

डॉ. अचल सिंह कहते हैं 'कुलपति, गोरखपुर सदर विधायक, शिक्षा मंत्री,राज्यपाल तक से शिकायत की थी। इसके बाद भी कोई जांच नहीं हुई। शिकायत को लेकर जांच का मात्र आश्वासन मिलता रहा। न जाने किस कारण से तमाम आरोप लगाने के बाद भी कोई अभ्यर्थी न्यायालय के शरण में नहीं गया, जिसके चलते फर्जी नियुक्ति की शिकायतों का प्रकरण फाइलों में दबकर रह गया।

डॉ. अचल सिंह ने जनज्वार से हुई बातचीत में कहा, 'डॉक्टर सुरेंद्र दुबे के पुत्र की अलावा भी हिंदी विभाग में अन्य दो नियुक्तियां नियमों को ताक पर रखकर की गई। महाराणा प्रताप शिक्षण संस्थान के अध्यक्ष डॉ. यूपी सिंह के पुत्र विजय सिंह दीनदयाल उपाध्याय विश्वविद्यालय के कुलपति थे। मेरा मानना है कि यह ऐसा संबंध है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने नाराजगी तो जताई, लेकिन कार्रवाई के स्तर पर आगे नहीं बढे। सदर विधायक राधा मोहन अग्रवाल ने जरुर कुछ आवाज उठाई। सोशल मीडिया से लेकर समाचार पत्रों तक शिकायत दर्ज कराई, लेकिन उनकी शिकायतों को भी संज्ञान नहीं लिया गया। एक बार फिर नियुक्ति संबंधित प्रकरण सिद्धार्थ विश्वविद्यालय का चर्चा में हैं, जिसके चलते लोगों के जेहन में गोरखपुर विश्वविद्यालय में हुए फर्जीवाड़ा का प्रकरण ताजा हो गया है।'

इस पूरे प्रकरण में कुलपति डॉ सुरेंद्र दूबे का पक्ष जानने के लिए संपर्क करने का प्रयास किया गया, मगर वे उपलब्ध नहीं हुए।

विपक्ष के निशाने पर हैं बेसिक शिक्षा मंत्री, कुलपति व योगी सरकार

गोरखपुर विश्वविद्यालय के बाद अब सिद्धार्थ विश्वविद्यालय में नियुक्ति प्रकरण को लेकर आरोपों के घेरे में योगी सरकार है। सोशल एक्टिविस्ट और बर्खास्त आईपीएस अमिताभ ठाकुर की पत्नी नूतन ठाकुर ने राज्यपाल से शिकायत करते हुए सिद्धार्थ विश्वविद्यालय में बेसिक शिक्षा मंत्री के भाई की नियुक्ति नियम प्रक्रिया को ताक पर रखने का आरोप लगाते हुए जांच की मांग की है।

आम आदमी पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष व प्रवक्ता इंजीनियर इमरान लतीफ ने बेसिक शिक्षा मंत्री के भाई की नियुक्ति को असंवैधानिक बताया है। उन्होंने कहा कि राजनीतिक रसूल के बल पर सामान्य वर्ग के एक गरीब अभ्यर्थी का हक छीना गया है। प्रदेश में संविधान व कानून का राज समाप्त हो चुका है। इस प्रकरण में जांच व कार्रवाई नहीं हुई तो आम आदमी पार्टी इसके खिलाफ अभियान चलाएगी।

सिद्धार्थ नगर सपा जिलाध्यक्ष लालजी यादव ने आरोप लगाया कि नियुक्ति असंवैधानिक है। उन्होंने आरोप लगाया कि मंत्री के संयुक्त परिवार में पैतृक खेती तथा अभ्यर्थी की खुद पत्नी बिहार में डिग्री कॉलेज में शिक्षक होने के बाद भी ईडब्ल्यूएस प्रमाण पत्र जारी होना संदिग्ध है।

वहीं कांग्रेस जिलाध्यक्ष काजी सुहैल अहमद ने भर्ती की उच्च स्तरीय जांच की मांग की है। उन्होंने आरोप लगाया कि पूरे प्रकरण में सत्ता व शासन का दुरुपयोग किया गया है। प्रोफेसर दंपती का अल्प आय वर्ग का प्रमाण पत्र कैसे जारी कर दिया गया। इसकी जांच कर अगर चयन निरस्त नहीं किया गया तो स्थिति सामान्य होने पर कांग्रेस पार्टी धरना प्रदर्शन करेगी।

बसपा जिलाध्यक्ष दिनेश चंद्र गौतम ने कहा कि आपदा को अवसर में बदलने की बात करने वाले नियमों को ताक पर रखकर खूब लाभ उठा रहे हैं। सरकार में भ्रष्टाचार का इससे बड़ा उदाहरण क्या हो सकता है। इस प्रकरण की जांच कराई जाए व दोषियों के खिलाफ कार्रवाई हो।

वहीं स्वपोषित व वित्तविहीन महाविद्यालय शिक्षक एसोसिएशन के प्रवक्ता डॉक्टर चतुरानन ओझा इस मामले में कहते हैं, 'विश्वविद्यालय से संबद्ध स्ववित्त पोषित कॉलेजों के शिक्षकों का लिस्ट जहां ऑनलाइन नहीं है, शासनादेश के अनुसार न्यूनतम वेतन व सुविधाएं तक नहीं दी जाती है। उन विश्वविद्यालयों से क्या उम्मीद की जा सकती है। ईडब्ल्यूएस का समाज के स्थापित अमीरों द्वारा लाभ उठाना व गरीबों का हक मारना आश्चर्यजनक नहीं है। मौजूदा सरकार में विश्वविद्यालय द्वारा किसी नैतिकता व कानून के पालन की उम्मीद नहीं की जा सकती है। शिक्षा माफियाओं व सत्ता के लोगों के लिए ये विश्वविद्यालय लाभ के माध्यम बन गए हैं।'

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