खबरदार जो गप मारने की आदत को को बुरी आदत कहकर जोड़ा सिर्फ महिलाओं से

खबरदार जो गप मारने की आदत को को बुरी आदत कहकर जोड़ा सिर्फ महिलाओं से, कार्यक्षमता बढ़ाने के लिए बहुत जरूरी है गाॅसिप
महेंद्र पाण्डेय की रिपोर्ट
Gossip is not just a loose talk, it is a serious subject. समाज विज्ञानी "गॉसिप" की परिभाषा में कहते हैं – ऐसे व्यक्ति या समूह की चर्चा जो आपके सामने नहीं है। इस सन्दर्भ में देखें तो अंगरेजी के शब्द गॉसिप के लिए हिंदी में सही मायनों में कोई शब्द नहीं है – गप-शप हम बढ़ाचढा कर बताने को कहते हैं और ऐसी चर्चा करने वाले अपने बारे में भी बता सकते हैं, कानाफूसी या खुसरफुसर चर्चा करने वाले लोग अपने नजदीक बैठे लोगों के बारे में भी कर सकते हैं, चुगली महज एक आरोप होता है और प्रलाप भी अनर्गल हो सकता है।
गॉसिप पर शायद ही कभी गंभीर चर्चा की जाती हो, अक्सर इसे हम बहुत हलके-फुल्के में लेते हैं। इसे हमेशा शिकायत वाले लहजे में बताया जाता है, मानो यह समय की बर्बादी हो। गॉसिप को शायद ही किसी समाज में अच्छी आदत माना जाता हो। इसे महिलाओं की आदतों में शुमार किया जाता है, इसे सभ्य और शिष्ट लोगों से दूर रखा जाता है, और इसे फुर्सत से बैठे लोगों से जोड़ा जाता है। पर अब बहुत सारे समाजशास्त्री और मनोवैज्ञानिक गॉसिप पर गंभीर अध्ययन कर रहे हैं और अध्ययन के दौरान इससे जुड़े अनेक पूर्वाग्रह ध्वस्त होते जा रहे हैं।
यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफ़ोर्निया में मनोविज्ञान की प्रोफ़ेसर मेगन रोब्बिंस (Megan Robbins) ने स्नातक छात्र एलेग्जेंडर करेन (Alexander Karen) के साथ मिलकर इस पर गम्भीर अध्ययन किया है। मेगन रोब्बिंस के अनुसार गॉसिप कोई बुरी आदत नहीं है बल्कि यह सामाजिक और भाषाई विकास की देन है, और न ही इसपर महिलाओं का एकाधिकार है। जब लोग चर्चा करते हैं तब जरूर ऐसे लोगों के बारे में भी बात करते हैं जो उस समय उनके सामने नहीं है, और इस परिभाषा के अनुसार दुनिया का हरेक आदमी या औरत गॉसिप करता है।
एक धारणा यह भी है कि समाज का वंचित तबका या निम्न आय वर्ग के लोग ही गॉसिप करते हैं और कुलीन लोग गॉसिप नहीं करते भी महज एक मिथ्या है। इस अध्ययन में बताया गया है कि आम अमेरिकी नागरिक हरेक दिन औसतन 52 मिनट गॉसिप में व्यतीत करता है। इस अध्ययन को सोशल साइकोलॉजिकल एंड पर्सनालिटी साइंस (Social Psychology & Personality Science) नामक जर्नल में प्रकाशित किया गया है।
गॉसिप के तीन मुख्य प्रकार हैं – पॉजिटिव, न्यूट्रल और नेगेटिव। मेगन रोब्बिंस के दल ने 18 वर्ष से 58 वर्ष के बीच के 467 लोगों पर अध्ययन किया, इसमें 269 महिलायें और 198 पुरुष थे। इनकी आपसी बातचीत इलेक्ट्रानिकली एक्टिवेटिड रिकॉर्डर से रिकॉर्ड की जाती थी और फिर उसमें से ऐसी चर्चा को अलग कर दिया जाता था जो किसी ऐसे व्यक्ति के बारे में थी जो वहां मौजूद नहीं था। अलग किये गए रिकॉर्डिंग को गॉसिप माना गया, अध्ययन के दौरान इस श्रेणी में 4003 रिकॉर्डिंग के अंश थे जो सभी प्रकार की रिकॉर्डिंग की संख्या का 14 प्रतिशत था।
इन 4003 रिकॉर्डिंग का गहन विश्लेषण करने पर पता चला कि इसमें से तीन-चौथाई से अधिक गॉसिप न्यूट्रल थी – यानि न तो किसी की बुराई की गयी थी और न ही किसी को महान बताया गया था। नेगेटिव श्रेणी में 604 गॉसिप थे, जिसे अधिकतर युवा लोगों ने किये थे। पॉजिटिव श्रेणी में कुल 376 गॉसिप थे। गॉसिप किसी जानने वाले के बारे में भी की जा सकती है और किसी अनजान व्यक्ति के बारे में भी।
अनजान व्यक्तियों में सेलेब्रिटी प्रमुख हैं, जिनके बारे में गॉसिप की जाती है। गॉसिप की कुल 4003 रिकॉर्डिंग में से 3292 पहचान वाले व्यक्ति से सम्बंधित थी और महज 369 किसी सेलेब्रिटी के बारे में थी। अध्ययन से स्पष्ट था कि अधिकतर गॉसिप जान-पहचान के लोगों के बारे में की जाती है, और युवा वर्ग सबसे अधिक नेगेटिव गॉसिप करता है। महिलायें संख्या में भले ही अधिक गॉसिप करती हों, पर उनकी अधिकतर गॉसिप न्यूट्रल होती है, और सूचना के आदान-प्रदान वाली होती है।
समाज विज्ञानी कैथरीन वाडीन्गियोन (Katherine Waddingion) ने गॉसिप पर एक चर्चित पुस्तक लिखी है – गॉसिप: आर्गेनाइजेशन एंड वर्क। इस पुस्तक के अनुसार गॉसिप का आज के दौर की राजनीति में और दुनिया को चलाने में महत्वपूर्ण स्थान है। गॉसिप के मामले में महिलायें बदनाम है, और यह हरेक स्तर पर दिखाई देता है। गूगल पर गॉसिप से सम्बंधित शुरू की 100 तस्वीरों में से 62 महिलाओं की हैं, केवल 7 पुरुषों की हैं और 31 में महिला और पुरुष दोनों ही हैं। गॉसिप की शुरुआत तब से होती है जब से भाषा का विकास हो रहा है। प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक, रोबिन डनबर, के अनुसार गॉसिप के कारण ही अनेक भाषाओं का विकास हुआ है।
यह मानव विकास का एक महत्वपूर्ण पहलू है जिसके तहत आप सामाजिक तथ्य को उन तक पहुंचाते हैं जिनपर आप भरोसा करते हैं। यह समाज को जोड़ने की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। गॉसिप शब्द मध्ययुगीन शब्द "गॉडसिब्ब" (Godsibb) से आया है, जिसका मतलब था बच्चे पैदा होने के समय मदद करने वाली महिला। तब इसे देवदूत या मित्र के समान समझा जाता था।
समय के साथ-साथ यह शब्द बदल कर "गॉसिप" हो गया और इसका मतलब बदलकर खाली समय के दौरान की जाने वाली चर्चा हो गया। पर इसे सामाजिक तौर पर खराब नहीं समझा जाता था। इसे खराब आदत समझाने की शुरुआत 16वीं शताब्दी में हुई, जब इसे यूरोपीय देशों में काल्पनिक चुडैलों के आपसी वार्तालाप से जोड़ा गया। यूरोप में 16वीं से 18वीं शताब्दी के बीच बहुत सारे महिलाओं की ह्त्या उन्हें चुडैल मानकर की गयी थी।
पुरुष-प्रधान समाज हमेशा महिलाओं को ही गॉसिप के लिए ताना देता है और उन्हें बदनाम करता है। गॉसिप सभी कार्यालयों का, विशेष तौर पर सरकारी कार्यालयों का, एक अभिन्न अंग है। समाज-शास्त्रियों के अनुसार गॉसिप के वर्तमान स्वरुप को समाज का अभिन्न अंग बनाने में योगदान केवल पुरुषों का है। वर्तमान गॉसिप का दौर, जिसे समाज अच्छा नहीं मानता और इसे केवल महिलाओं से जोड़ा जाता है, का आरम्भ बड़े पैमाने पर कॉफ़ी हाउस से होता है।
यूरोप में 17वीं शताब्दी से शहरों में कॉफ़ीहाउस का प्रचलन शुरू हुआ, जिसमें बैठककर समाज का प्रबुद्ध वर्ग दिनभर गॉसिप करता था, पर बाहर निकल कर इसे गंभीर चर्चा का नाम देता था। यहाँ यह ध्यान रखना आवश्यक है कि लगभग दो शताब्दी तक कॉफ़ी हाउस में महिलाओं का प्रवेश वर्जित था। काफी हाउस में केवल साफ़-सफाई का काम महिलाओं के जिम्मे था।
पुरुषों में भी गॉसिप की आदत होती है, पर वे इसे हमेशा दूसरा नाम देते हैं। कार्यालयों में बैठकों के बाद की वार्ता जिसे पोस्ट-मीटिंग डीब्रीफिंग कहा जाता है, गॉसिप का ही एक परिष्कृत स्वरुप है। इसके अतिरिक्त कार्यालयों के कॉरिडोर और कैंटीन गॉसिप के अड्डे होते हैं। जब छुट्टियों से वापस कार्यालय आकर अपने सहकर्मी से कोई पूछता है, और कार्यालय कैसा चल रहा है, तब दरअसल वह कार्यालय की तरक्के के बारे में नहीं बल्कि गॉसिप के बारे में ही जानना चाहता है।
कैथरीन वाडीन्गियोन ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि गॉसिप कभी-कभी संस्थाओं के लिए बहुत लाभकारी होते हैं, क्योंकि किसी संस्था में स्वस्थ बदलाव के बारे में गॉसिप के माध्यम से ही लोग बात करते हैं, और अधिकतर कार्यालयों में सर्वोच्च अधिकारी भी लोगों के गॉसिप का विषय जानने का प्रयास करता है। गॉसिप कुछ समय के लिए तनाव कम करता है, जिससे कार्य-क्षमता बढ़ती है। जाहिर है गॉसिप केवल गॉसिप ही नहीं है, बल्कि यह हमारे समाज का एक गूढ़ विषय है।











