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महात्मा ज्योतिबा फुले : 19 वीं सदी में सबसे पहले जिन्होंने हिंदू समाज में फैली कुरीतियों और रूढ़िवादिता के खिलाफ उठायी थी आवाज

Janjwar Desk
11 April 2021 7:57 AM GMT
महात्मा ज्योतिबा फुले : 19 वीं सदी में सबसे पहले जिन्होंने हिंदू समाज में फैली कुरीतियों और रूढ़िवादिता के खिलाफ उठायी थी आवाज
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फुले समाज को कुप्रथा, अंधश्रद्धा की जाल से समाज को मुक्त करना चाहते थे, अपना सम्पूर्ण जीवन उन्होंने स्त्रियों को शिक्षा प्रदान कराने में, स्त्रियों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करने में व्यतीत किया....

जनज्वार डेस्क। आज समाज सुधारक ज्योतिराव गोविंदराव फुले की जयंती है। उन्हें ज्योतिबा फुले के नाम से भी जाना जाता है। 24 सितंबर 1873 को दलितों और निर्बल वर्ग को न्याय दिलाने के लिए ज्योतिबा ने 'सत्यशोधक समाज' स्थापित किया। 18वीं शाताब्दी के दौरान ब्राहाम्णवादी व्यवस्था अपने चरम पर थी और इसी पंरपरा को रोकने के लिए ज्योतिबा ने ब्राह्मण-पुरोहित के बिना ही विवाह-संस्कार आरंभ कराया और इसे मुंबई हाईकोर्ट से भी मान्यता मिली। अछूतोद्धार के लिए ज्योतिबा ने उनके अछूत बच्चों को अपने घर पर पाला और अपने घर की पानी की टंकी उनके लिए खोल दी। नतीजतन उन्हें जाति से बहिष्कृत कर दिया गया। समाज सेवा के कार्यों से उनकी बढ़ती ख्याति देखकर प्रतिक्रियावादियों ने उन्हें मारने का भी षड्यंत्र रचा। पर हत्यारे ज्योतिबा की समाजसेवा देखकर उनके शिष्य बन गए।

समाजसेवा भाव को देखकर 1888 में मुंबई की एक विशाल सभा में उन्हें 'महात्मा' जिसका मतलब है पवित्र आत्मा की उपाधि दी गई। आज वर्तमान पर नजर डालें तो राजनीतिक पार्टियों में फुले को अपना बताने की होड़ लगी रहती है। उधर, भाजपा ने महात्मा ज्योतिबा फुले की जयंती से बाबा साहब की जयंती तक टीका उत्सव मनाने का ऐलान किया है। आखिर क्यों आजादी के 75 सालों सालों बाद भी ज्योतिबा के विचार इतने प्रासंगिक क्यों हैं?

ज्योतिबा फुले भारत के महान विचारक, समाजसेवी, लेखक और दार्शनिक थे। लोगों के मन में आज भी ज्योतिबा फुले के विचार जिंदा हैं जो समाज के लिए प्रेरणास्त्रोत हैं। ज्योतिबा फुले का जन्म 11 अप्रैल 1827 में महाराष्ट्र के पूणे में हुआ था। ज्योतिबा फुले की पत्नी का नाम सवित्रीबाई फुले है और उन्हें भारत में शिक्षा की देवी माना जाता है। ज्योतिबा ने महिलाओं के लिए भी कई बड़े काम किए हैं। ज्योतिबा फुले के काल में भारतीय महिलाओं की स्थिति बड़ी ही दयनीय थीं। जहां एक ओर महिलाएं पुरुषवादी वर्चस्व की मार झेल रही थीं, तो दूसरी ओर समाज की रूढ़िवादी सोच के कारण तरह-तरह की यातनाएं व अत्याचार सहने को विवश थीं।

हालात इतने बदतर थे कि घर की देहरी लांघकर महिलाओं के लिए सिर से घूंघट उठाकर बात करना भी आसान नहीं था। लंबे समय तक दोहरी मार से घायल हो चुकी महिलाओं का आत्मगौरव और स्वाभिमान पूरी तरह से ध्वस्त हो चुका था और इस दौरान ज्योतिबा फुले ने महिलाओं के लिए देश का पहला महिला शिक्षा स्कूल खोला था। महिलाओं को घर से बाहर निकलकर शिक्षा का अधिकार दिया था। इनका मूल उद्देश्य स्त्रियों को शिक्षा का अधिकार प्रदान करना, बाल विवाह का विरोध, विधवा विवाह का समर्थन करना रहा है।

फुले समाज को कुप्रथा, अंधश्रद्धा की जाल से समाज को मुक्त करना चाहते थे। अपना सम्पूर्ण जीवन उन्होंने स्त्रियों को शिक्षा प्रदान कराने में, स्त्रियों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करने में व्यतीत किया। महिलाओं के समान अधिकारों को बढ़ाने हेतु उन्होंने अपनी पत्नी सावित्रीबाई फुले को पढ़ाया और जिसके बाद वो दूसरों को पढ़ाने लगीं। सावित्रीबाई फुले आगे चलकर देश की पहली प्रशिक्षित महिला अध्यापिका बनीं। ज्योतिराव गोविंदराव फुले की मृत्यु 28 नवंबर 1890 को पुणे में हुई. 1888 में उन्हें 'महात्मा' की उपाधि दी गई थी।

ये वो दौर था जब देश को अंग्रेजों से आजादी नहीं मिली थी। एक तरफ भारत अंग्रेजों की मार झेल रहा था तो वहीं दूसरी ओर भारत जाति धर्म और कई सामाजिक असमानताओं के भेदभाव का शिकार हो रहे थे। ज्योतिबा फुले भारतीय समाज में होने वाले जातिगत आधारित विभाजन और भेदभाव के कट्टर दुश्मन थे। उस समय महाराष्ट्र में जाति प्रथा बड़े पैमाने पर फैली हुई थी इसके लिए उन्होंने प्रार्थना समाज की स्थापना की। ज्योतिबा फुले के विचार जो आज भी प्रासंगिक हैं।

ज्योतिबा फुले का मानना था कि भारत में राष्ट्रीयता की भावना का विकास तब तक नहीं होगा, जब तक खान -पान एवं वैवाहिक सम्बन्धों पर जातीय बंधन बने रहेंगे। शिक्षा स्त्री और पुरुष दोनों के लिए समान रूप से आवश्यक है।आर्थिक असमानता के कारण किसानों का जीवन अस्त-व्यस्त हो गया है।

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