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कपड़े उतारे बिना 12 साल की बच्ची के ब्रेस्ट दबाना यौन हमला नहीं, त्वचा से त्वचा का संपर्क जरूरी : बॉम्बे हाईकोर्ट की महिला जज ने सुनाया फैसला

Janjwar Desk
25 Jan 2021 5:32 AM GMT
कपड़े उतारे बिना 12 साल की बच्ची के ब्रेस्ट दबाना यौन हमला नहीं, त्वचा से त्वचा का संपर्क जरूरी : बॉम्बे हाईकोर्ट की महिला जज ने सुनाया फैसला
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प्रतीकात्मक

बॉम्बे हाईकोर्ट ने 39 साल के व्यक्ति द्वारा 12 साल की नाबालिग बच्ची का यौन उत्पीड़न करने वाले मामले में सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति पुष्पा गनेडीवाला ने कहा कि बच्ची को निर्वस्त्र किए बिना, उसके ब्रेस्ट को छूना, यौन हमला नहीं कहा जा सकता...

मुंबई, जनज्वार। बॉम्बे हाईकोर्ट ने आज एक ऐसा फैसला सुनाया है, जिससे यौन अपराधी खासकर छोटे बच्चों का यौन उत्पीड़न करने वाले जरूर खुश हो रहे होंगे। कोर्ट ने कहा कि अगर कोई व्यक्ति किसी 12 साल की बच्ची के कपड़े उतारे बिना उसकी ब्रेस्ट को दबाता है तो वह यौन उत्पीड़न नहीं माना जायेगा। ऐसी हरकतें पोक्सो एक्ट के तहत यौन उत्पीड़न के बतौर नहीं गिनी जायेंगी।

बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच की न्यायमूर्ति पुष्पा गनेडीवाला ने 19 जनवरी को दिये गये एक आदेश में कहा कि किसी हरकत को यौन हमला माने जाने के लिए 'गंदी मंशा से त्वचा से त्वचा (स्किन टू स्किन) का संपर्क होना' जरूरी है। महज छूना भर यौन हमले की परिभाषा में नहीं आता है। न्यायमूर्ति गनेडीवाला ने एक सेशन्स कोर्ट के फैसले को संशोधित करते हुए यह फैसला दिया। गौरतलब है कि 12 वर्षीय लड़की का यौन उत्पीड़न करने के लिए 39 वर्षीय व्यक्ति को तीन वर्ष कारावास की सजा सुनाई थी।

बॉम्बे हाईकोर्ट ने 39 साल के व्यक्ति द्वारा 12 साल की नाबालिग बच्ची का यौन उत्पीड़न करने वाले मामले में सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति पुष्पा गनेडीवाला ने कहा कि बच्ची को निर्वस्त्र किए बिना, उसके वक्षस्थल (ब्रेस्ट) को छूना, यौन हमला (Sexual Assault) नहीं कहा जा सकता। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि इस तरह की हरकत पोक्सो ऐक्ट के तहत यौन हमले के रूप में परिभाषित नहीं की जा सकती। हालांकि ऐसे आरोपी के खिलाफ आईपीसी की धारा 354 (शीलभंग) के तहत मुकदमा चलाया जाना चाहिए।

यह फैसला बॉम्बे हाईकोर्ट ने तब सुनाया है, जबकि नाबालिग पीड़िता ने कोर्ट में गवाही दी थी कि, दिसंबर 2016 में आरोपी सतीश नागपुर में लड़की को खाने का कोई सामान देने के बहाने अपने घर ले गया। उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में यह दर्ज किया कि अपने घर ले जाने पर सतीश ने उसके ब्रेस्ट को पकड़ा और उसे निर्वस्त्र करने की कोशिश की।

इसी पर टिप्पणी करते हुए हाईकोर्ट ने कहा, चूंकि आरोपी ने लड़की को निर्वस्त्र किए बिना उसके ब्रेस्ट को छूने की कोशिश की, इसलिए इस अपराध को यौन हमला नहीं कहा जा सकता है और यह आईपीसी की धारा 354 के तहत महिला के शील को भंग करने का अपराध है। धारा 354 के तहत जहां न्यूनतम सजा एक वर्ष की कैद है, वहीं पोक्सो कानून के तहत यौन हमले की न्यूनतम सजा तीन वर्ष कारावास है।

सेशन्स कोर्ट ने पोक्सो ऐक्ट और आईपीसी की धारा 354 के तहत उसे तीन वर्ष कैद की सजा सुनाई थी और आरोपी पर दोनों सजाएं साथ-साथ चलनी थीं, मगर हाईकोर्ट ने उसे पॉक्सो ऐक्ट के तहत अपराध से मुक्त करते हुए सिर्फ आईपीसी की धारा 354 के तहत सजा बरकरार रखी। यानी एक यौन अपराधी की 3 साल की सजा माफ कर दी गयी।

कोर्ट ने इस मामले में सुनवायी करते हुए कहा, 'किसी खास ब्योरे के अभाव में 12 वर्षीय बच्ची के वक्ष को छूना और क्या उसका टॉप हटाया गया या आरोपी ने हाथ टॉप के अंदर डाला और उसके ब्रेस्ट को छुआ, यह सब यौन हमले की परिभाषा में नहीं आता है।'

जस्टिस गनेडीवाला ने अपने फैसले में कहा कि ब्रेस्ट छूने की हरकत शील भंग करने की मंशा से किसी महिला/लड़की के प्रति आपराधिक बल प्रयोग है। पोक्सो कानून के तहत यौन हमले की परिभाषा है कि जब कोई यौन मंशा के साथ बच्ची/बच्चे के निजी अंगों, वक्ष को छूता है या बच्ची/बच्चे से अपना या किसी व्यक्ति के निजी अंग को छुआता है या यौन मंशा के साथ कोई अन्य हरकत करता है, जिसमें संभोग किए बगैर यौन मंशा से शारीरिक संपर्क शामिल हो, उसे यौन हमला कहा जाता है।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि यौन हमले की परिभाषा में स्किन टू स्किन टच होना चाहिए या सीधा शारीरिक संपर्क होना चाहिए। स्पष्ट रूप से अभियोजन की बात सही नहीं है कि आवेदक ने उसका टॉप हटाया और उसका ब्रेस्ट छुआ। इस तरह बिना संभोग के यौन मंशा से सीधा शारीरिक संपर्क नहीं हुआ, इसलिए इसे यौन हमला नहीं माना जायेगा।।'

बॉम्बे हाईकोर्ट के इस आदेश के खिलाफ सोशल मीडिया पर जमकर हंगामा मचा हुआ है। गीता यथार्थ कहती हैं, सेक्सुअल असॉल्ट, ब्रा या फ्रॉक निकाले बिना, छोटी बच्ची की छाती पर हाथ मार दिया, या बूब्स दबा दिया, ये सेक्सुअल असॉल्ट नहीं है, (पोस्को के तहत)! कोर्ट का ये कहना है, तो फिर अब अगर इस बात को थोड़ा गहराई से समझे तो- कपड़े पहनी हुई बच्ची को पीछे से दबोच ले, या हिप्स या ब्रेस्ट पर कपड़े है, उस पर काट लें, या तेज से हाथ मार दे, या या कपड़ो के ऊपर से ही वेजाइना में फिंगर डाल दे या कुछ और डाल दे ( जैसा कि आजकल क्रिमिल्स के लिए फैशन सा हो गया है), तो वो सेक्सुअल एब्यूज़ नहीं माना जायेगा?? इस हिसाब से तो कल को कंडोम पहनकर बलात्कार करने (पेनिस को जबरदस्ती वेजाइना में इन्सर्ट करने को) भी एब्यूज़/ बलात्कार नहीं माना जायेगा! पेनिस टच ही नहीं हुआ न, वेजाइना को, कंडोम था बीच में।

गीता आगे कहती हैं, 'क्या जज ऐसे फैसले लिखते समय अपने कर्मों को तो याद नहीं कर रहे होते हैं! पूरी संभावना है कि कपड़े पहनी किस बच्ची के साथ जज ने ऐसा किया हो, और वो खुद को एब्यूजऱ ना मानता हो तो इस हिसाब से वो किसी और क्रिमिनल को भी दोषी ना मानता हो. महिला जज भी ऐसा सोच सकती है, क्योंकि हो सकता है महिला ने अपने ऐसे कर्मों वाले पति/ बेटे को निर्दोष मानकर माफ किया हो कभी! #GirlChildDay की मुबारकबाद देनी है या नहीं, ये पढ़ने वाले ही बताएंगे!'

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