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विमर्श

वामपंथियों पर आंदोलन भड़काने का आरोप लगाते ट्रंप

Janjwar Desk
28 July 2020 2:11 PM GMT
वामपंथियों पर आंदोलन भड़काने का आरोप लगाते ट्रंप

अमेरिका में राष्ट्रपति ट्रंप किसी भी तरह से अगला चुनाव जीतने के प्रयास में हैं। उन्होंने कोरे वादों और झूठ के अलावा पिछले चार वर्षों में कुछ किया नहीं है, तब जाहिर है वे सभी समस्यायों को किसी और पर थोपते रहेंगे।

महेंद्र पांडेय का विश्लेषण

दुनिया में जब भी पूंजीवाद का नंगा नाच शुरू होता है, तब घोर दक्षिणपंथी ताकतें फलने-फूलने लगतीं हैं। ऐसे में जाहिर है पूरी दुनिया को यह बताया जाता है कि दुनिया की सभी समस्याएं वामपंथियों और एंटी फ़ासिस्ट ताकतों ने उत्पन्न की हैं। घोर दक्षिणपंथी शासकों के अपने एजेंडा होते हैं, जिसे वे शासन में रहते पूरा करते हैं। सबसे प्रमुख एजेंडा होता है, पूरी आबादी तो ताक पर रखकर एक वर्ग विशेष को बढ़ावा देना और दूसरा एजेंडा जनता को गुमराह करते रहना। कोविड 19 के इस दौर में जो तीन देश सबसे अधिक प्रभावित है, अमेरिका, ब्राज़ील और भारत। तीनों में यही हो रहा है। तीनों देशों की सरकारें, सभी विरोधियों को वामपंथी, एंटी फ़ासिस्ट, नक्सली, माओवादी, अर्बन नक्सल या टुकड़े-टुकड़े गैंग का सदस्य बताकर जनता की नज़रों में अपराधी बना देती हैं और दूसरी तरफ दक्षिणपंथी गिरोहों को हिंसा और उन्माद भड़काने की खुली छूट देती हैं। ऐसी हिंसा में भी, कुछ बेगुनाहों को पकड़कर, उन्हें वामपंथी विचारधारा से जोड़कर हमेशा के लिए जेल में बंद कर दिया जाता है। इसके दो फायदे हैं : विरोधी आवाजें दब जातीं हैं और सरकार समर्थित हिंसा भड़काने वाले गिरोह पहले से अधिक सक्रिय हो जाते हैं और चरम दक्षिणपंथी से शासक वर्ग तानाशाही की तरफ बढ़ जाता है।

अमेरिका में राष्ट्रपति ट्रंप किसी भी तरह से अगला चुनाव जीतने के प्रयास में हैं। उन्होंने कोरे वादों और झूठ के अलावा पिछले चार वर्षों में कुछ किया नहीं है, तब जाहिर है वे सभी समस्यायों को किसी और पर थोपते रहेंगे।कोविड 19 के लिए चीन को जिम्मेदार बता दिया, इससे बिगड़ती अर्थव्यवस्था का भी जनता को जवाब मिल गया। समाज में अराजकता और रंगभेद के विरुद्ध आंदोलनों को वामपंथी विचारधारा वाले संगठनों से जोड़ दिया। वे लगातार कहते रहे हैं कि अमेरिका में हरेक सामाजिक समस्याओं के पीछे एन्टीफा (एंटी फ़ासिस्ट संगठन) और चरम वामपंथियों का हाथ है। यही संगठन सभी हत्याओं और अराजकताओं में शरीक हैं। हाल में ही अटोर्नी जनरल विलियम ब्रार ने भी ऐसा ही कहा, अमेरिका के जस्टिस डिपार्टमेंट के एक टास्क फोर्स की रिपोर्ट में एंटीफा को अमेरिका के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया गया है।

इसके बाद अमेरिका के सेंटर फॉर स्ट्रेटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज ने ब्रिटिश समाचारपत्र द गार्डियन के साथ वर्ष 1994 से अब तक किये गए लगभग 900 हत्या के मामले जो राजनैतिक हत्या या फिर पुलिस की हत्या से जुड़े थे, की तहकीकात शुरू की और इसके परिणाम सरकार के दावों के बिलकुल उलटे हैं। सरकारी दस्तावेजों में बताये गए सबसे बड़ा खतरा, एंटीफा, केवल एक हत्या में संलग्न पाया गया और इसमें भी ह्त्या एंटीफा के ही सदस्य की हुई थी। दूसरी तरफ वर्ष 1994 से अबतक दक्षिणपंथी संगठन कुल 329 हत्याओं में संलग्न रहे हैं, पर उन पर ना तो पुलिस और ना ही सरकार कोई कार्यवाही करती है।

वर्ष 2010 के बाद से वामपंथी संगठन मात्र 21 हत्याओं में संलग्न रहे हैं, जबकि इसी अवधि के दौरान दक्षिणपंथी संगठनों ने 117 हत्याएं कीं। इसी दौरान इस्लामिक स्टेट और जिहादी संगठनों ने 95 हत्याएं कीं। आंकड़ों से स्पष्ट है कि सबसे अधिक हत्याएं चरम दक्षिणपंथी संगठनों ने की, जाहिर है इन संगठनों को सरकार का समर्थन प्राप्त है। तभी इन संगठनों को कभी भी देश या समाज के लिए खतरा नहीं बताया जाता। दूसरी तरफ जिहादी संगठनों ने भी दक्षिणपंथी संगठनों की अपेक्षा कम हत्याएं कीं, पर उन्हें पूरी दुनिया की शांति के लिए खतरा करार दिया जाता है और इन पर प्रतिबंध लगाया जाता है। हत्याओं के संदर्भ में सबसे पीछे रहे वामपंथी संगठन देश के लिए सबसे बड़ा खतरा बन जाते हैं, क्योंकि दक्षिणपंथी सरकारें यही चाहती हैं।

आंकड़ों में और हत्यारों की विचारधारा का निर्धारण करने में कहीं कोई गलती नहीं हो, इस अध्ययन में इसका पूरा ध्यान रखा गया है। इस काम के लिए एंटी-डीफेमेशन लीग, सेंटर फॉर इनवेस्टिगेटिव रिपोर्टिंग और ग्लोबल प्रोजेक्ट अगेंस्ट हेट एंड एक्सट्रीमिस्म की मदद ली गई। अमेरिका में पुलिस प्रतिवर्ष 1000 से अधिक लोगों की हत्या करती है और इसमें से दो-तिहाई अश्वेत होते हैं।

आज के दौर में जिस तरह से प्रजातंत्र का नाम लेकर तानाशाही का खेल चल रहा है, उस खेल की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी राजनैतिक हत्याएं हैं, और जाहिर है ऐसी हत्यायों को और हत्यारों को सरकार का, पुलिस का और न्यायालयों का भरपूर समर्थन मिलता है। पुलिस भी, हत्या के बाद कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं को पकड़ लाती है, सरकारें उसे वामपंथी करार देतीं हैं और न्यायालय भी निर्दोषों को सजा देकर सरकार को खुश कर देते हैं। दुनिया के अधिकतर देशों में यही "न्यू नार्मल" है।

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