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विमर्श

1 करोड़ प्रवासियों के पलायन का जिम्मेदार फेक न्यूज को बताने वाली मोदी सरकार झूठी खबरें फैलाने में सबसे आगे

Janjwar Desk
19 Sep 2020 2:28 PM GMT
1 करोड़ प्रवासियों के पलायन का जिम्मेदार फेक न्यूज को बताने वाली मोदी सरकार झूठी खबरें फैलाने में सबसे आगे
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मोदी सरकार को फेक न्यूज़ से गहरा लगाव है, ऐसे समाचार तो प्रधानमंत्री मोदी भी स्वयं ईजाद करते हैं, दूसरों के ऐसे न्यूज़ को फॉरवर्ड करते हैं और इसे न्यूज़ के रचियताओं को सम्मानित भी करते हैं...

महेंद्र पाण्डेय की टिप्पणी

जनज्वार। प्रधानमंत्री मोदी के जन्मदिन को युवाओं ने जुमला और बेरोजगारी दिवस के तौर पर मनाया। जुमला तो इस सरकार के हरेक वक्तव्य में दिखता है, और इसी जुमले से सरकार आत्मप्रशंसा में विभोर रहती है।

सरकार संसद को बताती है कि फेक न्यूज़ के कारण एक करोड़ से अधिक प्रवासी मजदूर परिवार अपने घरों के लिए निकल पड़े। इस वक्तव्य को जुमला नहीं कहेंगे तो और क्या कहेंगे, क्योंकि खांटी भक्तों को छोड़कर यह सभी जानते हैं कि ऐसा अभूतपूर्व पलायन का जिम्मेदार सिर्फ और सिर्फ सरकारी निकम्मापन था।

यह पलायन देशव्यापी भी था, तो क्या सरकार यह बता रही है कि पूरे देश में यह पलायन फेक न्यूज़ के कारण था, और यदि ऐसा था तो फिर किन शहरों में कितने और किस प्रकार के फेक न्यूज़ का प्रसार किया गया। यदि सरकार फेक न्यूज़ को ही जिम्मेदार बता रही है, तो फिर इसके बारे में पूरी जानकारी सार्वजनिक करे। किस फेक न्यूज़ को किसने भेजा और उसका सम्बन्ध किस गिरोह, संगठन, संघ या फिर पार्टी से था, यह भी उजागर करे।

यही नहीं सरकार को यह भी सार्वजनिक करना चाहिए कि इस तथाकथित जानलेवा फेक न्यूज़ के प्रसार पर कितने लोगों के विरुद्ध कार्यवाही की गई, और इसमें से कितने अब तक जेल भेजे जा चुके हैं। जाहिर है, सरकार यदि फेक न्यूज़ के कारण एक करोड़ प्रवासी मजदूरों के का पलायन बताती है, तो फिर इतने आंकड़े तो अब तक जुटाएं ही होंगें, या फिर मौत के आंकड़ों की तरह यह आंकड़ा भी नहीं है का नाटक सरकार करेगी। मौत के आंकड़े नहीं बताने का तो मतलब समझ में आता है, कुछ दिनों बाद सरकार स्पष्ट तौर पर कहेगी कि कोई भी मौत पलायन से नहीं हुई, जैसे सरकार ताल ठोक कर आज तक कहती रही है कि नोटबंदी के कारण कोई मौत नहीं हुई।

इस सरकार का वैसे भी फेक न्यूज़ से गहरा लगाव है, ऐसे समाचार तो प्रधानमंत्री मोदी भी स्वयं ईजाद करते हैं, दूसरों के ऐसे न्यूज़ को फॉरवर्ड करते हैं और इसे न्यूज़ के रचियताओं को सम्मानित भी करते हैं। याद कीजिये, नोटबंदी के दौर के उस भाषण को जिसमें प्रधानमंत्री जी किसी मैसेज के उस भिखारी की बात करते हैं जो पेटीएम मशीन रखता है। उनके भाषण से पहले ही दुनिया जान चुकी थी कि यह फेक न्यूज़ हैं, पर प्रधानमंत्री जी का फेक न्यूज़ से लगाव उनके भाषण तक पहुँच ही गया। नाले के गैस से चाय बनाने के वक्तव्य भी सबको याद होगा।

आप बीजेपी के आईटी सेल को, जो फेक न्यूज़ और मोर्फेड फोटो का बड़ा उद्योग है, छोड़ भी दें तो भी प्रधानमंत्री और मंत्री भी बस यही करते हैं। अनेक बार हंगामा होने पर फेक न्यूज़ वाली पोस्ट को हटा दिया जाता है, अनेक बार प्रधानमंत्री जी ऐसे पोस्ट या भाषण पर दो तीन दिनों बाद कोई मंत्री आकर बयान दे जाता है कि प्रधानमंत्री जी का यह मतलब नहीं था।

इतने के बाद भी फेक न्यूज़ की पुरोधा सरकार यदि मजदूरों के पलायन के लिए फेक न्यूज़ को जिम्मेदार मानती है तो आश्चर्य ही है। राजस्थान चुनाव के दौर में अमित शाह लगातार तीन दिनों तक तीन शहरों में रैलियाँ कर रहे थे। तीनों रैलियों में उन्होंने रोजगार देने पर बात की थी, पर तीनों रैलियों में कितने लोगों को रोजगार मिला, यह संख्या अलग-अलग थी। इसमें से एक रैली ऐसी भी थी, जिसमें रोजगार पाने वालों की संख्या देश की जनसंख्या से अधिक थी, जैसे 5 ट्रिलियन टन की अर्थव्यवस्था थी।

सोशल मीडिया और स्मार्टफोन ने पूरे समाज को ही फेक न्यूज़ में परिवर्तित कर दिया है। अनेक अध्ययन बताते हैं कि फेक न्यूज़ का प्रसार सच की तुलना में कई गुना अधिक तेजी से और अधिक लोगों तक होता है। मनोविज्ञान के नजरिये से देखें तो सच को सीधी तरीके से कहा जाता है, जबकि झूठ को सजा कर पेश किया जाता है।

उदाहरण के तौर पर यदि सरकार ने सभी गरीबों तक यदि सही में गैस सिलेंडर पहुंचाया है, तो वह इसे सीधे तौर पर बिना किसी भूमिका के बता देगी। पर, यदि यह जुमला है तो फिर माँ को धुएं से परेशानी, खांसी, बीमारी सबकुछ आँखों में आंसू के साथ बताना पड़ता है। दूसरे अध्ययन बताते हैं कि यदि आप किसी विचारधारा को एक-चौथाई लोगों में मान्य बना देते है तो आप की विचारधारा को स्पष्ट बहुमत मिल जाएगा। यही सारा कुछ हमारे देश में किया जा रहा है।

फेक न्यूज़ तेजी से और अधिक लोगों तक पहुँच रही है, जुमले को सजा—धजा कर पेश किया जा रहा है और फिर इसे फेक न्यूज़ का दुनिया का सबसे बड़ा उद्योग, आईटी सेल, इसे बड़ी आबादी तक पहुंचा देता है और प्रश्न करने वालों को खुलेआम धमकी भी दे डालता है। फेक न्यूज़ को हरेक घर तक पहुंचाने का जिम्मा तो टीवी न्यूज़ चैनलों ने उठाया हुआ है। यही फेक न्यूज़ तथाकथित न्यू इंडिया का आधार है, और इंडिया को इसके प्रभाव से बचाने की चुनौती भी है।

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