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विमर्श

गांधी द्वारा स्थापित हरिजन सेवक संघ बना कुछ लोगों की जागीर, पूर्व विधायक ने उठाए सवाल

Janjwar Desk
3 Sep 2020 9:47 AM GMT
गांधी द्वारा स्थापित हरिजन सेवक संघ बना कुछ लोगों की जागीर, पूर्व विधायक ने उठाए सवाल
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(उत्तरी दिल्ली के हरिजन सेवक संघ के भीतर कस्तुरबा कुटीर, पूर्व विधायक ने अनियमितताओं को लेकर उठाए सवाल)

गांधी और कस्तुरबा की इस संस्था को स्थापित करने के पीछे सोच यह थी कि सवर्ण समाज के लोग छुआछूत और जातिगत भेदभाव का प्रायश्चित करेंगे...

दिल्ली के पूर्व विधायक पंकज पुष्कर ने पूछे कुछ इस तरह से सवाल

मैं जानता हूं इस समय हास्टल की छात्राएं बहुत दिक्कत में होंगी। उन्हें अपने हॉस्टल के रूम में प्रवेश करने तक नहीं दिया जा रहा। मैं नहीं जानता कि इस मुश्किल स्थिति में वे क्या प्रयास कर सकती हैं। ऐसी स्थिति में मेरा अनुरोध है कि समाज के सभी जिम्मेदार लोग, मीडिया और प्रशासन के लोग इस महत्वपूर्ण मामले में अपनी भूमिका का निर्वाह करें। संभव हो तो मेरी तरफ से निम्न अनुरोध हैं।

1) हरिजन सेवक संघ के छात्रावास की एक बिल्डिंग पिछले वर्ष छात्राओं से खाली करवा ली गई। ऐसा जबरदस्ती हुआ। यह उनकी मर्जी के बिना हुआ। यह एक बिल्डिंग महिंद्रा टेक नामक एक निजी संस्थान को दे दी गई है। क्या यह सच है? इस बारे में आपको क्या जानकारी है? यह लिखिएगा, खोजिएगा।

2) हरिजन सेवक संघ परिसर बहुत विशाल है। इस जमीन को तिमारपुर क्षेत्र के ढका गांव के लोगों ने कौड़ियों के दाम पर दिया था। स्थानीय समाज का मानना था कि इसमें समाज के वंचित वर्गों की बेहतरी के लिए, समर्पित तरीके से काम होगा। क्या ऐसा हो रहा है? अगर हां तो कैसे और नहीं तो क्यों नहीं?

3) वहां क्या-क्या गतिविधियां ऐसी हो रही हैं जो केवल कुछ लोगों के निजी स्वार्थों के लिए हैं?

4) क्या क्या काम ऐसे चल रहे हैं जिसके पीछे व्यवसायिक लेन देन है?

5) क्या-क्या काम ऐसे हैं जोकि समाज के सभी वर्गों के हित के लिए हैं और क्या-क्या काम ऐसे हैं जो केवल दलित वर्ग के हित के लिए हैं?

मेरे 5 वर्ष के दिल्ली में विधायक के कार्यकाल में हरिजन सेवक संघ के अंदर अनियमितताओं और भ्रष्टाचार की शिकायतें मेरी जानकारी में आईं थीं। मैंने हरिजन सेवक संघ मैनेजमेंट के डॉ शंकर सान्याल और रजनीश कुमार जी से बात की। मैंने हर संभव कोशिश की कि इस संस्था में सुधार, पारदर्शिता और जनहित को सुनिश्चित और सर्वोच्च किया जाए। लेकिन मैनेजमेंट की कोशिश रहती थी कि हरिजन सेवक संघ का संचालन अपारदर्शी तरीके से हो, इसमें समाज के प्रति उत्तरदायित्व कम से कम हो और इसको एक निजी संस्था के तरीके से चलाया जाए।

इस मामले में सभी को यह ध्यान रखना जरूरी है कि यह संस्था गैर-सरकारी जरूर है लेकिन गैर-सामाजिक नहीं है। यह संस्था जिस जमीन पर खड़ी है क्या वह स्थानीय समाज की लगभग मुफ्त में दी गई जमीन नहीं है? क्या इस संस्था के विकास में हजारों लोगों का श्रम और आर्थिक सहयोग नहीं लगा है?

क्या इस संस्था के बनने के पीछे भारत की अनुसूचित जातियों के प्रति होने वाला ऐतिहासिक अन्याय का मुद्दा नहीं है? क्या इस संस्था का कारण गांधीजी और डॉक्टर अंबेडकर के बीच का ऐतिहासिक संवाद नहीं है? इस संवाद के बाद 1932 में पूना पैक्ट हुआ। उससे इस संस्था का जन्म हुआ।

इस संस्था के पीछे सोच यह थी कि सवर्ण समाज के लोग छुआछूत और जातिगत भेदभाव का प्रायश्चित करेंगे। गांधीजी और कस्तूरबा ने गांव के लोगों के साथ मिलकर सवर्ण लोगों के आमूलचूल परिवर्तन करने के लिए अपने हाथ से नालियां साफ की हैं, मानव मल को उठाया है।

क्या यह संस्था इसलिए बनी थी कि इस संस्था को कुछ लोग अपनी निजी जागीर बना लें? क्या गांधी जी के नाम से बनी संस्था को अपारदर्शी और भ्रष्ट तरीके से चलाने की अनुमति हो सकती है? यह संस्था इसलिए बनी थी कि सवर्ण समाज के लोग अपना जातिगत अहंकार और स्वार्थ पूरी तरह से छोड़कर अधिकतम संभव सच्चाई के साथ इस देश के वंचित वर्गों के लिए समर्पण का हर संभव प्रयास करें। क्या इस संस्था में निस्वार्थ और समर्पित भाव से काम हो रहा है या ...?

(हरिजन सेवक संघ के भीतर कस्तुरबा कुटीर)

इस संस्था को चलाने और सुधारने का सबसे पहला अधिकार स्थानीय समाज और खास तौर से दलित और वंचित वर्ग का है। इस वर्ग के वरिष्ठ और युवा लोगों का है। इस संस्था में समर्पित सहयोग करने का काम सवर्ण समाज के उन लोगों को करना होगा जिन्होंने स्वयं को जातिगत अहंकार और स्वार्थ से पूरी तरह मुक्त कर लिया है। लेकिन ध्यान रखें कि सहयोग और सेवा के नाम पर इस संस्था और इस संस्था की जमीन पर नियंत्रण करने की कोशिश गांधी जी की विरासत के प्रति सबसे बड़ा विश्वासघात होगा। यह भारत के संविधान की भावना का भी उल्लंघन होगा।

देश में गांधी जी और डॉक्टर अंबेडकर के विचारों को वर्तमान संदर्भ में समझने वाले सभी नागरिकों और कार्यकर्ताओं को इस संस्था को आगे बढ़ाने का मार्गदर्शन करना होगा। वे अपनी जिम्मेदारी से बचेंगे तो वे गांधी जी और बाबासाहेब अंबेडकर की परंपरा के साथ अन्याय करेंगे।

इस संस्था को शत-प्रतिशत पारदर्शी तरीके से, बिल्कुल न्यायसम्मत सामाजिक भागीदारी के साथ, वंचित समाज के सर्वाधिक विकास के लिए चलाया जाना चाहिएं। इस अत्यधिक महत्वपूर्ण संस्था को किन्हीं दो-तीन लोगों की मर्जी पर नहीं छोड़ा जा सकता।

गांधी जी और डॉक्टर अंबेडकर जी की परंपरा से जुड़े सभी लोगों से और समाज के सभी लोकतांत्रिक लोगों से मेरी अपील है कि इस ऐतिहासिक संस्था को कुछ लोगों की निजी जागीर बनने से रोका जाए। हर गांधीवादी और अंबेडकरवादी से मेरा अनुरोध है कि बिना किसी राग-द्वेष के, बिना व्यक्तिगत लाभ-हानि के गांधी-अंबेडकर संवाद के सर्वोच्च उद्देश्यों और भारत के संविधान की मूल भावना को ध्यान में रखकर हरिजन सेवक संघ नामक इस संस्था का रूपांतरण और संचालन करें।

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