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विमर्श

भारत में चुनिंदा लोगों के लिए है मानवाधिकार, विरोध की आवाजों को दबाने के लिए अपनाया जाता है गैरकानूनी तरीका- रिपोर्ट

Janjwar Desk
8 April 2021 8:19 AM GMT
भारत में चुनिंदा लोगों के लिए है मानवाधिकार, विरोध की आवाजों को दबाने के लिए अपनाया जाता है गैरकानूनी तरीका- रिपोर्ट
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एमनेस्टी इंटरनेशनल की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, "2019 के दिसम्बर महीने में भारत सरकार नागरिकता संशोधन क़ानून लेकर आई, जिसके अनुसार अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश से आये शरणार्थियों में से मुस्लिमों को छोड़कर बाकी सभी धर्मों के शरणार्थियों को नागरिकता देने का प्रावधान था.....

वरिष्ठ पत्रका महेंद्र पाण्डेय का विश्लेषण

एमनेस्टी इंटरनेशनल की वार्षिक रिपोर्ट 2020-2021 में दुनिया के 149 देशों में मानवाधिकार की 2020 की स्थिति का आकलन किया गया है। वर्ष 2020 का पूरा समय कोविड 19 के प्रकोप में बीता था, जाहिर है इस वार्षिक रिपोर्ट में कोविड काल के दौरान मानवाधिकार की समीक्षा है।

रिपोर्ट के अनुसार, "भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता चुनिन्दा लोगों के लिए है और सरकारी नीतियों के विरोध में उठाती आवाजें दबाने के लिए गैर-कानूनी और असंवैधानिक तरीके अपनाए जाते हैं, भले ही विरोध का माध्यम शांतिपूर्ण प्रदर्शन ही क्यों न हो। मानवाधिकार कार्यकर्ता, जिसमें छात्र, शिक्षा से जुड़े लोग, पत्रकार और कलाकार भी शामिल हैं, को सरकार का विरोध करने के कारण बिना मुक़दमा चलाये और बिना किसी सबूत या तहकीकात के ही लम्बे समय के लिए जेलों में ठूंसा जा रहा है। कोविड 19 के दौर में जेलों में भीड़ न बढाए जाने के सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के बाद भी सरकार की नीतियों का मुखर विरोध करने वाले भारी संख्या में जेलों में ठूंसे जा रहे हैं।

दूसरी तरफ जाति से सम्बंधित और महिलाओं पर हिंसा के मामले बढ़ाते जा रहे हैं, पर प्रशासन और पुलिस ना तो इनकी शिकायतें दर्ज करती हैं, ना ही पर्याप्त तहकीकात करते है और ना ही दोषियों को सजा दिला पाती है। अधिकतर ऐसे मामलों में पुलिस और प्रशासन ऐसी वारदात को अंजाम देने वालों को बचाती है और पीड़ितों को और उनके गवाहों को ही गुनाहगार साबित करती है। अल्पसंख्यकों की ह्त्या या उनके विरुद्ध हिंसा भड़काने वाली भीड़ या पुलिस पर कोई कार्यवाही नहीं की जाती। कोविड 19 वैश्विक महामारी के नाम पर सख्ती से लोगों के आवागमन की स्वतंत्रता को कुचला गया, जिससे हजारों प्रवासी श्रमिक भूख और असुरक्षा का सामना करते रहे। कोविड 19 के नाम पर नागरिकों की निजता के अधिकार को भी कुचला गया।"

एमनेस्टी इंटरनेशनल की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, "2019 के दिसम्बर महीने में भारत सरकार नागरिकता संशोधन क़ानून लेकर आई, जिसके अनुसार अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश से आये शरणार्थियों में से मुस्लिमों को छोड़कर बाकी सभी धर्मों के शरणार्थियों को नागरिकता देने का प्रावधान था। इसके बाद देश भर में शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया जा रहे थे, पर सरकार ने इन शांतिपूर्ण प्रदर्शनों का भी दमन किया, और अनेकों आन्दोलनकारियों को अवैध तरीके से जेल में डाल दिया, या फिर हवालात में बंधक बना दिया।

इन आन्दोलनकारियों के विरुद्ध सरकारी दुष्प्रचार तंत्र ने खूब अफवाह फैलाया और महिला आन्दोलनकारियों का चरित्र हनन किया। इसके बाद बहुत कम समय की सूचना पर सरकार ने कोविड 19 का हवाला देकर सख्त तालाबंदी का ऐलान कर दिया, और इसके बाद कोविड सहायता राशि के वितरण में कोई पारदर्शिता नहीं बरती गयी, एक समुदाय विशेष का चरित्र हनन किया गया और नागरिकों के निजता के मौलिक अधिकार का हनन किया गया।"

रिपोर्ट में बताया गया है कि, "वर्ष 2018 के भीमा-कोरेगांव के तथाकथित मामले में एनआईए ने सात मानवाधिकार कार्यकर्ताओं – फादर स्टेन स्वामी, ज्योति रघोबा जगताप, सागर तत्यारम गोखले, रमेश मुरलीधर गैचोर, हैनी बाबु, गौतम नवलखा और आनंद तलतुम्ब्दे को गिरफ्तार किया। ये सभी मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं, और आदिवासियों और दलितों की समस्याओं को मुखर होकर उठाते रहे हैं, सरकार का आरोप है की ये सभी देशद्रोही हैं, देश के विरुद्ध युद्ध की अगुवाई कर रहे हैं, और इनका सम्बन्ध प्रतिबंधित माओवादी संगठन से है।

इसमें से अनेक मानवाधिकार कार्यकर्ता बहुत बुजुर्ग और गंभीर बीमारियों से ग्रस्त हैं, फिर भी इन्हें ऐसे जेल में डाला गया जहां पहले से ही बहुत सारे कैदियों को कोविड 19 था। इसी मामले में 2018 से जेल में बंद जनकवि 80 वर्षीय वरवरा राव कैद में ही कोविड 19 से ग्रस्त हो गए। न्यायालयों में इनके रिहाई और जमानत की अर्जियां बार-बार अस्वीकृत की जा रही हैं।"

रिपोर्ट में नागरिकता संशोधन क़ानून का विरोध और दिल्ली दंगों और इसके बाद कैद किये गए छात्र मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के बारे में भी बताया गया है, "दिल्ली दंगों के बाद कम से कम 9 छात्र नेताओं को आतंकवाद और राष्ट्रद्रोह का आरोप लगाकर जेल में बंद कर दिया गया। अनेक दूसरे छात्रों को पुलिस की यातनाओं और हिंसक गतिविधियों का सामना करना पड़ा। दूसरी तरफ इन्ही मामलों पर बीजेपी के मंत्रियों और नेताओं के उसकावे वाले और हिंसक और खुले आम दिए गए "हेट स्पीच" पर पुलिस और प्रशासन ने केवल अपनी आँखें नहीं बंद की, बल्कि खुलेआम उनका समर्थन और बचाव करते रहे। सफूरा जरगर को जब कैद किया गया तब वे तीन-माह की गर्भवती थीं। उनकी जमानत की अर्जी भी बार-बार अस्वीकृत की जाती रही, पर अब वे जमानत पर बाहर हैं।

पूर्व छात्र नेता उमर खालिद अभी तक जेल में बंद हैं। 26 जून 2020 को संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार उच्चायोग ने भारत सरकार को पत्र लिखकर सभी मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को जेल से रिहा करने को कहा पर भारत सरकार ने एक भी कार्यकर्ता को रिहा नहीं किया। दिसम्बर 2020 ने अति-उत्साही उत्तर प्रदेश सरकार ने लव जिहाद के विरुद्ध एक क़ानून लागु कर दिया, जिसे ना तो भारतीय संसद और ना ही राज्य के विधान सभा की मंजूरी है। फिर भी इस क़ानून के तहत केवल दिसम्बर 2020 के महीने में कम से कम 10 मुस्लिमों को पकड़ा, यातनाएं दीं और जेल में डाल दिया"।

रिपोर्ट के अनुसार, "कोविड 19 के नाम पर लगाए गए तालाबंदी के बाद से देश में अभिव्यक्ति और आवागमन के मौलिक अधिकार को प्रतिबंधित कर दिया गया। सामान्य जनता से इसे तोड़ने का आरोप लगाकर खूब जुर्माना लगाया गया, यातनाएं दी गईं, जबकि राजनेता तालाबंदी की खुले आम अवहेलना करते रहे। महामारी के पहले भी आन्दोलनों पर बहुत पाबंदियां थीं, पुलिस शांत आन्दोलनकारियों को हिंसा के लिए उकसाती है, और हिंसा होने पर संपत्ति के नुकसान की भरपाई चुनिन्दा आन्दोलनकारियों से वसूली जाती है। यह देश में एक नया ट्रेंड बन गया है"।

एमनेस्टी इन्टरनॅशनल की रिपोर्ट के अनुसार, "जम्मू कश्मीर को दो हिस्सों में बाँट दिया गया और सभी स्थानीय राजनेताओं को लम्बे समय तक नजरबन्द कर दिया गया। आज भी देश का यह हिस्सा कड़े सुरक्षा घेरे में है और विरोध की हर आवाज को कुचला जा रहा है। मीडिया पर तमाम पाबंदियां हैं। जम्मू-कश्मीर में लगभग सभी समाचार पत्रों को बंद कर दिया गया और उनके दफ्तरों पर छापे मारे गए। कम से कम 18 पत्रकारों को या तो जेल में बंद किया गया या फिर उन्हें यातनाएं दी गईं।"

एमनेस्टी इन्टरनेशनल की रिपोर्ट में विस्तार से भारत में मानवाधिकार की स्थिति पर बताया गया है, इसमें पत्रकारों की स्थिति पर भी चर्चा है। हालां की यदि आप अंध-भक्त नहीं हैं, तो तह सभी विषय आपको मालूम होंगें, पर इस रिपोर्ट में सबकुछ समग्र तौर पर प्रस्तुत किया गया है।

रिपोर्ट में कुछ विषय अछूते रह गए हैं, मसलन किसान आन्दोलन और मीडिया ट्रायल। पिछले वर्ष के कई महीने मीडिया ने जोरशोर से ट्रायल अभियान चलाया था, जिसमें प्रिंट मीडिया, सोशल मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया सभी भागीदार थे, पर इसका जिक्र नहीं है। किसान आन्दोलन के आरम्भ से जिस तरह से सरकार में मानवाधिकार हनन किया था, उसका कहीं जिक्र नहीं होना, भी आश्चर्य का विषय है।

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