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विमर्श

किसान आंदोलन : मोदी सरकार का मोहरा बन निर्लज्जता से अन्नदाता को कठघरे में खड़ा करता दैनिक जागरण

Janjwar Desk
29 Nov 2020 4:18 PM GMT
किसान आंदोलन : मोदी सरकार का मोहरा बन निर्लज्जता से अन्नदाता को कठघरे में खड़ा करता दैनिक जागरण
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खबरों से पता चलता है कि किसान आन्दोलन को तोड़ने और उसे कमजोर करने की कोशिश में दैनिक जागरण किस तरह से डेस्क में खबरें गढ़ रहा है और फिर निर्लज्जता के साथ उन्हें प्रकाशित भी कर रहा है....

किसान आंदोलन के तीसरे दिन पर क्या रहा हिन्दी अखबारों का रवैया जानिये वरिष्ठ पत्रकार जगमोहन रौतेला से

जनज्वार। किसान आंदोलन के तीसरे दिन की खबरें आज 29 को हिन्दी अखबारों अमृत विचार, अमर उजाला, हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण और राष्ट्रीय सहारा ने किस तरह से समाचारों को प्रकाशित किया और उनके पीछे क्या अखबारों की अपनी कोई मंशा भी छिपी है? इसी का विश्लेषण आज तीसरे दिन भी करने की कोशिश है।

इन समाचार पत्रों में समाचारों के प्रस्तुतीकरण और उनके शीर्षक के हिसाब से देखें तो आन्दोलन की तीसरे दिन की खबर को अमृत विचार (बरेली-कुमाऊँ संस्करण), राष्ट्रीय सहारा (देहरादून-कुमाऊँ संस्करण) ने पहली खबर बनाया है और सात कॉलम में खबर प्रकाशित की है। राष्ट्रीय सहारा ने "अड़े किसान, बार्डर छोड़ने को तैयार नहीं" शीर्षक को सात कॉलम में दिया है। अखबार लिखता है कि सिंघू सीमा पर पहले से ही मौजूद किसानों के अलावा हरियाणा, पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान भी वहॉ एकत्र होने लगे हैं, जिससे यहां किसानों की संख्या लगातार बढ़ रही है।

इसी मुख्य खबर के साथ अखबार ने तीन बॉक्स भी लगाए हैं, जिसमें एक में गृहमंत्री अमित शाह का बयान प्रकाशित किया गया है कि किसान सड़क छोड़कर तय जगह पर ही प्रदर्शन करें। दूसरा बॉक्स हरियाणा की भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर का है, जिसमें वे एक तरह से किसान आन्दोलन को बदनाम करने की कोशिश के तहत बयान दे रहे हैं कि कुछ प्रदर्शनकारी किसानों का लिंक खालिस्तान से है। अब खालिस्तान कहां है? यह खट्टर ने नहीं बताया है।

साथ ही खट्टर यह भी कहते हैं कि आंदोलन को विपक्षी दलों का समर्थन प्राप्त है । ऐसा कहते हुए खट्टर भूल जाते हैं कि जब भारतीय जनता पार्टी विपक्ष में थी तो क्या उसने कभी सत्तापक्ष के खिलाफ किसी आंदोलन को समर्थन नहीं दिया? और यह भी कि क्या विपक्ष का आन्दोलन को समर्थन देना गैरकानूनी है? खट्टर यह तो दावा करते हैं कि इस आन्दोलन में कई अवांछित तत्व घुस आए हैं, उनके पास इस बात की रिपोर्ट है, पर इसका खुलासा करना अभी ठीक नहीं है।

सवाल उठता है कि जब खट्टर के पास इस बारे में कहने के लिए कुछ ठोस नहीं है तो उन्होंने इस तरह का बयान दिया क्यों? क्या एक जिम्मेदार पद पर बैठे व्यक्ति को इस तरह की बयानबाजी करनी चाहिए? इससे साफ पता चलता है कि उनकी मंशा किसी भी तरह से किसान आन्दोलन को बदनाम करने की है और कुछ नहीं। तीसरे बॉक्स में कॉग्रेस नेता राहुल गांधी का बयान है, जिसमें उन्होंने केन्द्र पर आरोप लगाया है कि उसने किसानों को दिल्ली आने से रोकने के लिए सैनिकों को उनके खिलाफ खड़ा किया है। जिस देश में "जय जवान-जय किसान" का नारा लगता हो, वहां सैनिकों के किसानों के विरूद्ध कार्यवाही के लिए खड़ा करना बेहद दुखद है।


राष्ट्रीय सहारा ने सम्पादकीय पेज पर दो लेख किसान आन्दोलन को लेकर प्रकाशित किए हैं। पहला लेख अखबार के एडिटर इन चीफ (यह शब्द हिन्दी अखबारों की भाषाई दुर्दशा को रेखांकित करता है। शायद हिन्दी के मुख्य सम्पादक शब्द में वह "वजन" नजर नहीं आता, जो अंग्रेजी के "एडिटर इन चीफ " में है) उपेन्द्र राय का "सड़क पर किसान, सियासत घमासान" शीर्षक से है।

लेख के शीर्षक से ही पता चल जाता है लेख में सरकार का बचाव करते हुए किसानों की बात कही गई है। राय अपने लेख में लिखते हैं, "विपक्ष कह रहा है कि नए कानून आने के बाद किसानों के पास दिल्ली कूच करने के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचा था, जबकि सरकार कहती है कि यह किसानों की आय दोगुनी करने के उसके महत्वाकांक्षी लक्ष्य की ओर बढ़ाया गया कदम है। इस पर किसानों को ढाल बनाकर विपक्ष केवल सियासी रोटी सेक रहा है। इससे इंकार नहीं किया जा सकता है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कृषि सेक्टर में आमूल चूल बदलाव की जरूरत को 2014 में अपने पहले कार्यकाल में भांप लिया था।" इस लेख से पता चलता है कि एडिटर इन चीफ कितनी साफगोई से केन्द्र सरकार का बचाव करते हैं और उसने कृषि कानूनों सही ठहराते हैं।

सम्पादकीय पेज में ही दूसरा लेख सुपरिचित आलोचक सुधीश पचौरी का" अन्नदाता और मीडिया का छल " प्रकाशित है, जिसमें वह पिछले कुछ दिन से किसान आन्दोलन को लेकर मुख्यधारा की मीडिया के रवैये पर सवाल उठाते हैं। पचौरी अपने लेख में कहते हैं कि किसान आन्दोलन का मुद्दा सिर्फ यह है कि किसान चाहते हैं कि सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की लिखित गारंटी दे, जबकि सरकार कहती है कि एमएसपी खत्म नहीं होगा, लेकिन वह यह बात लिखकर नहीं देना चाहती है!

चैनल इस पर चर्चा नहीं करते हैं, बल्कि उनका आन्दोलन को "विपक्ष का षडयंत्र "की तरह दिखाने की कोशिश करते हैं। प्रकटत: लगता है कि मीडिया किसान आन्दोलन को ईमानदारी से कवर कर रहा है, लेकिन जैसे ही वह इस आन्दोलन को राजनीतिक या उकसाया हुआ कहता है तो "अपनी राजनीति" को खोल देता है।" और यही मीडिया का अधिकांश हिस्सा कर रहा है। वह केन्द्र सरकार की राजनीति का मोहरा बनकर किसानों को कठघरे में खड़ा कर रहा है, जो मीडिया की नंगई को उघाड़ कर सामने रख रहा है।

अमृत विचार (बरेली) ने "बुराड़ी मैदान पर डटे किसान, बोले चाहे गोली मार दो -वापस नहीं जाएँगे" शीर्षक मुख्य समाचार का लगाया है। अखबार ने लगातार तीसरे दिन भी आन्दोलन की खबर से प्रमुखता से प्रकाशित किया है और एक तरह से पत्रकारिता का निर्वाह भी अखबार कर रहा है। अन्दर पेज नम्बर 5 में उसने उत्तराखण्ड में चल रहे किसान आन्दोलन को सात कॉलम में "किसानों का सब्र आया काम, पुलिस का घेरा हटा" शीर्षक से प्रमुखता के साथ प्रकाशित किया है। इसके अलावा पेज नम्बर 11 में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान आन्दोलन को "कृषि कानून के विरोध में भड़के किसान, हाईवे जाम" शीर्षक से सात कॉलम में महत्वपूर्ण कवरेज दी है।

अमर उजाला (नैनीताल) ने तीसरे दिन के किसान आन्दोलन को पहले पेज पर मुख्य समाचार बनाया है। 5 कॉलम की खबर को उसने "दिल्ली सीमा पर डटे किसान, वार्ता को तैयार सरकार ने मांगा प्रस्ताव" शीर्षक दिया है । खबर में कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर का यह बयान भी प्रकाशित किया गया है कि आगामी तीन दिसम्बर को देश के 32 किसान संगठनों के बातचीत होनी है। अगर किसान चाहेंगे तो सरकार उससे पहले भी बातचीत को तैयार है। वे अपना प्रस्ताव भेंजे। हम विचार करेंगे। साथ ही पंजाब के मुख्यमन्त्री कैप्टन अमरिन्दर सिंह का बयान भी प्रकाशित किया है, जिसमें वह किसानों से गृहमन्त्री अमित शाह के वार्ता के निमंत्रण को स्वीकार कर लेने की अपील कर रहे हैं।


अमर उजाला ने लगातार दूसरे दिन तीसरे दिन के किसान आन्दोलन को पूरा पेज नम्बर 6 "अन्नदाता आक्रोश में" शीर्षक से बनाया है। इस पेज में दो महत्वपूर्ण खबरें हैं, जो किसानों के अपने आन्दोलन के प्रति समर्पित जज्बे को दिखाती हैं। एक खबर जुलाना (जींद) से कर्मवीर की है, जिसमें उन्होंने लिखा है कि शुक्रवार (27 नवम्बर) की शाम को जैसे ही पोली गांव के लोगों को पता चला कि पंजाब के किसानों का जत्था उनके गांव के पास ठहरने वाला है तो गांव में उनके खाने की व्यवस्था करने की मुनादी की गई और देखते ही देखते गांव के लोगों ने कुछ ही देर में 5 लाख रुपए एकत्र कर लिए और लगभग 30,000 किसानों के खाने की व्यवस्था आनन -फानन में कर ली गई। पीली गांव के बस स्टैंड के पास गांव के युवाओं ने पंजाब के किसानों के लिए भण्डारा लगा दिया।

सोनीपत से रवीन्द्र कौशिक की एक रिपोर्ट "महिला किसान बोलीं," हमारी जान गई तो बहू-बेटियां आकर सँभालेंगी मोर्चा" प्रकाशित की गई है। रिपोर्ट में कहा गया कि पंजाब से बड़ी संख्या में बुजुर्ग महिला किसान भी दिल्ली कूच में शामिल हैं, जो रास्ते में भोजन बनाने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सँभाल रही हैं। वे कहती हैं कि दिल्ली से अपना हक लेकर ही वे वापस लौटेंगी और अगर इस बीच उनकी मौत भी हो गई तो घरों से बहू-बेटियॉ आकर मोर्चा सँभालेंगे। यह रिपोर्ट बताती है कि जो लोग किसान आन्दोलन को हल्के में ले रहे हैं, वे उसकी गम्भीरता को समझें। किसान पूरी तरह मानसिक तौर पर मजबूत व पूरी तरह होकर ही घरों से इस कड़कड़ाती ठंड में निकले हैं।

हिन्दुस्तान (हल्द्वानी) ने दिल्ली के किसान आन्दोलन के तीसरे दिन की खबर को पहले पेज पर स्थान नहीं दिया है। उसने इसकी जगह पर पहले पेज पर आन्दोलन में भाग लेने दिल्ली जा रहे हरिद्वार जिले के किसानों को नारसन में ही रोक दिए जाने की खबर को जगह दी है, जिसे तीन कॉलम में "दिल्ली जाते किसानों को नारसन में रोका" शीर्षक से प्रकाशित किया है।

दिल्ली के किसान आन्दोलन को हिन्दुस्तान ने पेज नम्बर-11 में पूरे आठ कॉलम में जगह दी है। इस पेज में केन्द्रीय मंत्री पीयूष गोयल का किसानों को "कुछ तत्वों" द्वारा गुमराह कर दिए जाने का बयान प्रकाशित किया गया है। उत्तरखण्ड किसानों से सम्बंधित एक बड़ी खबर पेज नम्बर 9 में "किसानों से वायदा 48 घंटे का और हफ्तों से भुगतान नहीं" शीर्षक से प्रकाशित किया है, जिसमें बताया गया कि सरकार ने किसानों से जो धान खरीदा उसका भुगतान एक महीने बाद भी नहीं हो पा रहा है। जबकि प्रदेश सरकार ने दावा किया था कि धान खरीद के 48 घंटे के भीतर ही किसान को उसकी फसल का भुगतान कर दिया जाएगा। सरकार की ओर से इस तरह की लापरवाही बताती है कि उसकी कथनी और करनी में कितना अन्तर होता है।

दैनिक जागरण (हल्द्वानी) का किसान विरोधी रवैया तीसरे दिन के किसान आन्दोलन को लेकर फिर सामने आया, दो दिन तक किसान आन्दोलन को महत्व न देने वाले और उससे सम्बंधित खबर को अन्दर के किसी पेज में तीन कॉलम में समेट देने वाले दैनिक जागरण ने गृहमंत्री अमित शाह के किसानों से वार्ता की पेशकश वाले बयान को न केवल पहले पेज पर जगह दी है, बल्कि उसे "किसान बुराड़ी आएँ, अगले ही दिन वार्ता" शीर्षक से पॉच कॉलम में मुख्य खबर बनाया है।

इससे साफ पता चलता है कि अखबार का प्रबंधन किस तरह से सत्ता की चाकरी के पत्रकारिता के सारे सिद्धान्तों को तिलांजलि दे चुका है। सवाल उठता है कि जिस किसान को वह पहले पेज में एक कॉलम की जगह देने लायक नहीं समझता है, उस आन्दोलन के किसानों से गृहमंत्री का बातचीत करने का प्रस्ताव इतना महत्वपूर्ण कैसे हो गया? उसने बातचीत के प्रस्ताव की खबर को पहले पेज पर मुख्य खबर बनाकर जगह कैसे दी? इससे पता चलता है कि वह यह दिखाना चाहता है कि सरकार तो किसानों से हमेशा बातचीत को तैयार है पर वे ही नहीं मान रहे हैं।


दिल्ली और दूसरी जगहों के किसान आन्दोलन को दैनिक जागरण ने पेज नम्बर -9 में जगह दी है। यहां भी दिल्ली में बॉर्डर पर बैठे किसानों से सम्बंधित खबर को महत्वहीन बनाकर प्रकाशित किया है। इस खबर में आज एक बार फिर अखबार ने अपनी खबर में अपना किसान विरोधी चेहरा फिर से दिखाया है।

दैनिक जागरण लिखता है ,"सिंघू बॉर्डर पर जमा किसानों में अधिकतर पंजाब के ही हैं। हरियाणा के किसान आन्दोलन में बहुत ही कम हैं।" इसी खबर में आगे बिना किसी किसान नेता का नाम लिखे ही अखबार दावा करते हुए लिखता है कि हरियाणा के किसान संगठनों के कुछ पदाधिकारियों का कहना था कि 20 से ज्यादा गांवों में किसानों को सुबह से फोन किया जा रहा है, पर कोई भी आन्दोलन में आने को राजी नहीं है।

इस तरह की खबरों से पता चलता है कि किसान आन्दोलन को तोड़ने और उसे कमजोर करने की कोशिश में दैनिक जागरण किस तरह से डेस्क में खबरें गढ़ रहा है और फिर निर्लज्जता के साथ उन्हें प्रकाशित भी कर रहा है।

(जगमोहन रौतेला जनसरोकारों और "युगवाणी" समाचार पत्रिका से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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