विमर्श

बिचौलियों के खात्मे की बात करने वाली मोदी सरकार असल में भला चाहती है सिर्फ बिचौलियों का

Janjwar Desk
27 Dec 2020 6:41 AM GMT
बिचौलियों के खात्मे की बात करने वाली मोदी सरकार असल में भला   चाहती है सिर्फ बिचौलियों का
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मोदी सरकार के बड़े चेहरों के कृषि कानून व आंदोलन पर अलग-अलग बयानों से यह स्पष्ट हो गया है कि सरकार इस मामले को लेकर भ्रमित है...

महेंद्र पाण्डेय का विश्लेषण

पिछले एक महीने से प्रधानमंत्री समेत सभी मंत्री और संतरी बता रहे हैं कि आंदोलनकारी किसान भ्रम में हैं और उन्हें बरगलाया जा रहा है। इसके बाद भी किसान एकजुट हैं और अपने लक्ष्य पर पूरी तरह अडिग हैं, जबकि सरकार जितना इस मसले पर बोलती है उतना ही उसका इस मुद्दे पर भ्रम जगजाहिर होता जा रहा है। दो दिन पहले किसान सम्मान निधि का जिस हिसाब से भव्य जश्न मनाया गया वह भी सरकार के भ्रम को पुख्ता करता है कि किसी किसान को 2000 रुपये देने के लिए आयोजन पर कई गुना अधिक धन उड़ा डालने से किसानों की समस्याएं ख़त्म हो जायेंगीं। सबको न्यूनतन समर्थन मूल्य से अधिक दाम मिलने लगेगा और सरकारी मंडियां सुरक्षित रहेंगीं।

इसी दिन प्रधानमंत्री के साथ दूसरे मंत्रियों ने भी लगभग पूरे देश के किसानों को संबोधित किया। सरकार के भ्रम का आलम तो तब देखने को मिला जब प्रधानमंत्री जी अपने संबोधन में आंदोलनकारी किसानों को भड़काने के लिए कांग्रेस को जिम्मेदार ठहरा रहे थे और उसके तुरंत बाद गृह मंत्री अमित शाह दिल्ली के किसानों के बीच आंदोलनकारी किसानों की मांगों को वामपंथियों का एजेंडा बता रहे थे, कम से कम प्रधानमंत्री और गृहमंत्री को संबोधनों से पहले किसे जिम्मेदार ठहराना है, इस पर एक मत तो कायम कर ही लेना चाहिए था। इन सबसे अलग रक्षा मंत्री अपना अलग राग अलाप रहे थे।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह जो किसान आंदोलन नहीं कर रहे हैं उन किसानों को बता रहे थे कि एक-दो साल के लिए प्रायोगिक तौर पर तो नए कृषि कानूनों को लागू करने दीजिए। फिर अगर समस्याएं आयेंगीं तो संशोधन भी कर देंगे। इस वक्तव्य से इतना तो स्पष्ट है कि मोदी सरकार हरेक नए कानून को बिना किसी ठोस आधार और अध्ययन के ही प्रायोगिक स्तर पर बना डालती है और फिर इन्हें लागू कर उसे परखती है। स्पष्ट तो यह पहले भी हो चुका था, पर अब तक इस प्रयोग का खुलासा प्रधानमंत्री या फिर बड़े मंत्री ने अब तक नहीं किया था, किसान कानूनों के बाद सरकार की मंशा का खुलासा भी हो गया। बिना किसी अध्ययन के ही एक प्रयोग के तौर पर नोटबंदी भी लागू की गई थी जिसका नतीजा देश की अर्थव्यवस्था आज तक भुगत रही है।

प्रधानमंत्री जी और दूसरे मंत्री बिलकुल आश्वस्त हैं कि नए कृषि कानून किसानों के भले के लिए हैं तो फिर रक्षा मंत्री को पता नहीं क्यों लगता है कि एक-दो वर्षों के भीतर ही इसकी खामियां नजर आने लगेंगी। कानूनों में संशोधन का प्रस्ताव भी एक चुटकुले जैसा है। सवाल यह है कि जब सरकार लगातार प्रचारित कर रही है कि नए कृषि कानून से किसानों का केवल भला होगा, तो फिर किसानों के भले में संशोधन करना ही क्यों चाहती है?

जब आंदोलनकारी किसानों ने एक सुर में कहा कि कानून बनाने के पहले किसानों के संगठनों से सलाह.मशविरा करना चाहिए था, तब प्रधानमंत्री समेत सभी बड़बोले मंत्रियों ने बार-बार समाचार चैनलों पर बताया कि कानून बनाने से पहले बड़े किसान संगठनों से बातचीत की गई थी, मशविरा किया गया था, सबने सोचा कि चलो जनता को क्या पता चलेगा कि किसी से मशविरा नहीं लिया गया था, पर हाल में ही खबर आयी है कि मुंबई के किसी आरटीआई एक्टिविस्ट ने जब सवाल पूछा कि कानून बनाने के दौरान किन किसान संगठनों से मशविरा किया गया था, तब उन्हें इसका जवाब तीन महीने बाद भी नहीं दिया गया। जाहिर है, यह भी एक जुमला था जिसकी लत से सरकार मजबूर है।

जिस बीजेपी ने मनमोहन सिंह सरकार के समय सत्ता के दो केंद्रों का मुद्दा बड़े जोर-शोर से उठाया था, उसे तो यह भी नहीं पता है कि किसानों के आंदोलन और नए कृषि कानूनों का मुद्दा सरकार का है या फिर बीजेपी का। लगभग दस दिनों पहले सभी समाचार चैनलों पर एक खबर लगातार चल रही थी कि बीजेपी मुख्यालय पर गृह मंत्री अनेक मंत्रियों और जेपी नड्डा समेत बीजेपी के बड़े नेताओं से किसान आंदोलन और नए कृषि कानूनों के विरोध से निपटने का रास्ता तलाशेंगे? इसके सीधा-सा मतलब है कि सरकार जिन कानूनों को किसानों के हित में बता रही है, वह दरअसल सरकार का नहीं, बल्कि बीजेपी का एजेंडा है जिसे किसानों पर थोपा जा रहा है।

प्रधानमंत्री समेत सरकार के सभी मंत्री अब तक आंदोलनकारी किसानों को किसान छोड़कर बाकी सभी नामों से संबोधित कर चुके हैं, मसलन - भ्रमित, बहकाए हुए, आतंकवादी, खालिस्तानी, पाकिस्तान और चीन के सरपरस्त, माओवादी, बिचौलिए और ट्रेडर। पर, जब सरकार उन्हें यही सब समझती है तो फिर ऐसे लोगों को बार-बार बातचीत के लिए न्योता क्यों भेज रही है? क्या आतंकवादियों से कभी उन पर थोपे गए कानूनों पर बातचीत भी की जाती है? सभी मंत्री बार-बार बिचौलिए ख़त्म करने की बात कर रहे हैं तो फिर बिचौलियों को बारबार बातचीत के लिए पत्र किसलिए भेजे जा रहे हैं? इससे तो यही साबित होता है कि भले ही सरकार बिचौलियों के खात्मे की बातें करे, पर भला तो वह बिचौलियों का ही चाहती है।

दरअसल, इस बार प्रधानमंत्री जी के सामने उन्ही के ठीक टक्कर के लोग खड़े हैं। प्रधानमंत्री कहते हैं हम तुम्हारा भला चाहते हैं, किसान कहते हैं कि हमारा भला वापस करो। इस बार भ्रम में सरकार है, कम से कम किसानों को अभी तक कोई भ्रम नहीं है। यदि कोई भ्रम रहा भी होगा तो अब तक टूट चुका होगा और सरकार की समस्या यह है कि यदि किसानों के साथ जनता का भी भ्रम टूट गया तो फिर क्या होगा?

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