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विमर्श

ट्रंप के पूर्व रक्षा सलाहकार की चर्चित किताब से खुलेगी उनके झूठों और मक्कारियों की पोल

Janjwar Desk
22 Jun 2020 3:24 AM GMT
ट्रंप के पूर्व रक्षा सलाहकार की चर्चित किताब से खुलेगी उनके झूठों और मक्कारियों की पोल
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file photo

ट्रम्प राष्ट्रपति बनने के बाद अबतक लगभग 2,0000 बार सार्वजनिक तौर पर झूठ बोल चुके हैं, झूठ केवल बोलने तक ही सीमित नहीं रहता, वे लगातार सोशल मीडिया पर फेक न्यूज़ का प्रचार भी करते हैं....

महेंद्र पाण्डेय की टिप्पणी

जनज्वार। ट्रम्प प्रशासन के पूर्व रक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन ने हाल में ही एबीसी न्यूज़ को दिए गए साक्षात्कार में सीधे-सीधे कहा है कि ट्रम्प राष्ट्रपति बनने लायक नहीं हैं और उनमें ऐसी बौद्धिक क्षमता नहीं है कि वे इतने बड़े पद को संभाल सकें।

जॉन बोल्टन ने हाल में ही एक पुस्तक प्रकाशित की है, "द रूम व्हेयर आईटी हैप्पेंड" यह एक संस्मरण है, जिसमें वाइट हाउस के समय के अनुभवों की चर्चा है। जॉन बोल्टन अप्रैल 2018 से सितम्बर 2019 तक ट्रम्प के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार थे। इस पुस्तक में जाहिर है, ट्रम्प के बारे में भी अनेक जानकारियाँ हैं इसीलिए पूरा ट्रम्प प्रशासन इसके प्रकाशन को रोकने के जुगाड़ में था।

इसे रोकने के लिए दायर याचिका में कहा गया था कि इसमें अनेक गोपनीय जानकारियाँ हो सकती हैं, पर वाशिंगटन डिस्ट्रिक्ट कोर्ट के न्यायाधीश रोयस लम्बेर्थ ने इस पर रोक से इनकार कर दिया। इस पुस्तक को 23 जून को रिलीज़ किया जाना है और प्रकाशन से पहले ही पुस्तक सबसे अधिक चर्चित पुस्तक बन गई थी।

इसके हिस्से अमेरिका के लगभग सभी समाचार पत्रों में प्रकाशित किये जा चुके हैं। ट्रम्प इसे रद्दी और झूठ का पुलिंदा करार चुके हैं और साथ ही बोल्टन के लिए अपने ट्वीट में अनेक अपशब्दों का उपयोग कर चुके हैं। ट्रम्प के अनुसार बोल्टन को सलाहकार के पद से हटाया गया था, जबकि तथ्य यह है कि बोल्टन ने स्वयं इस्तीफ़ा दिया था।

इस पुस्तक के अनुसार ट्रम्प के चीन के राष्ट्रपति से गहरे सम्बन्ध हैं और इस बार चुनाव जीतने के लिए चीन के राष्ट्रपति से मदद करने का आग्रह किया है। उन्होंने चीन के राष्ट्रपति से यह भी कहा था कि अमेरिकी किसानों के उत्पाद चीन अधिक से अधिक खरीदे, जिससे ट्रम्प के दुबारा राष्ट्रपति बनने का रास्ता साफ़ हो सके। लेकिन सबसे अधिक चर्चा इस खुलासे की हो रही है कि ट्रम्प ने चीन में मुस्लिमों के उत्पीड़न और यातना शिविरों में रखने का जोरदार समर्थन किया।

वैसे ट्रम्प की नीतियों को लगातार परखने वाले विशेषज्ञ या रिपोर्टर को इस खुलासे पर आश्चर्य नहीं है। उनके अनुसार ट्रम्प अमेरिका-मेक्सिको बॉर्डर पर आप्रवासियों को स्वयं ऐसी यातनाएं दे चुके हैं, जब इन शिविरों में लोगों को परिवार से अलग कर दिया गया था और बच्चों को अपने माता-पिता से अलग कर दिया गया था।

इस पुस्तक के अनुसार ट्रम्प की अज्ञानता का आलम यह है कि फ़िनलैंड उन्हें स्वतंत्र देश नहीं, बल्कि रूस का हिस्सा लगता है और यूनाइटेड किंगडम एक परमाणु शक्ति है, यह उन्हें पता ही नहीं था। दुनियाभर को लोकतंत्र, मानवाधिकार और स्वतंत्र मीडिया का पाठ पढ़ाने वाले देश, अमेरिका के राष्ट्रपति दुनिया के हरेक तानाशाह और सत्तालोभी शासक का समर्थन करते हैं और मानवाधिकार हनन में उनका साथ देते हैं।

वैसे इस पुस्तक में जो कुछ है, वह पूरी दुनिया जानती है। फिर भी इतना तो स्पष्ट है कि अमेरिका में ट्रम्प के चार साल राष्ट्रपति रहने के बाद भी वहां का मीडिया, मीडिया पर नजर रखने वाले संस्थान और न्यायालय अभी तक निष्पक्ष हैं।

पुस्तक के प्रकाशन को नहीं रोकने का आग्रह करते हुए पेन अमेरिका और रिपोर्टर्स कमेटी फॉर फ्रीडम ऑफ़ द प्रेस ने भी याचिका दायर की थी। अमेरिका के संविधान का पहला संशोधन ही प्रेस और अभिव्यक्ति की आजादी से सम्बंधित है। पेन अमेरिका ने अपने याचिका में पहले संशोधन का हवाला देते हुए कहा था कि इसके अनुसार सरकार में रहा हुआ कोई व्यक्ति भी सरकार की आलोचना के लिए स्वतंत्र है।

इस याचिका में वर्ष 1971 में सर्वोच्च न्यायालय में दायर न्यू यॉर्क टाइम्स बनाम यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ़ अमेरिका का हवाला भी दिया गया था, जिसमें निक्सन प्रशासन पेंटागन फाइल्स नामक पुस्तक का प्रकाशन गोपनीय जानकारियों का हवाला देकर रोकना चाहता था, पर सर्वोच्च न्यायालय ने इसे प्रकाशित करने का आदेश पारित किया था। यह पुस्तक वियतनाम युद्ध से सम्बंधित थी।

जॉन बोल्टन की पुस्तक "द रूम व्हेयर आईटी हैप्पेंड" के अनुसार ट्रम्प अक्सर कहते थे की कुछ पत्रकारों को जेल में डाल देना चाहिए या फिर उनकी ह्त्या करा देनी चाहिए। जाहिर है, ये सभी ऐसे पत्रकार थे जो ट्रम्प से तीखे सवाल पूछते थे, या फिर उनकी नीतियों के विरुद्ध लिखते थे।

वर्ष 2018 के दौरान पेन अमेरिका ने भी पत्रकारों पर हमले, परेशान किये जाने या फिर ट्रम्प द्वारा अपशब्दों के उपयोग पर एक मुक़दमा दायर किया था और तब न्यायालय ने ट्रम्प की भर्त्सना की थी। किताब के अनुसार ट्रम्प अपने कार्यकाल के आरम्भ से ही केवल वही काम करते रहे, जिससे वे 2020 का चुनाव जीत कर दुबारा राष्ट्रपति बन सकें।

ट्रम्प जनता के लिए जुछ करते नहीं, इसीलिए उन्हें लगातार झूठ बोलना पड़ता है। न्यू यॉर्क टाइम्स का आकलन है कि ट्रम्प राष्ट्रपति बनने के बाद अबतक लगभग 2,0000 बार सार्वजनिक तौर पर झूठ बोल चुके हैं। ट्रम्प का झूठ केवल बोलने तक ही सीमित नहीं रहता, वे लगातार सोशल मीडिया पर फेक न्यूज़ का प्रचार भी करते हैं।

हाल ही में ट्विटर पर उनके एक के बाद एक अनेक मेसेज पर फेक न्यूज़ या फिर मैनीपुलेटेड मीडिया का लेबल लगाना पड़ा या फिर हटाना पड़ा। हाल में ही फेसबुक पर अपने चुनाव प्रचार में ट्रम्प ने नाजियों के स्वस्तिक का उपयोग किया था, इस प्रचार को फेसबुक ने हटा दिया।

इससे पहले फेसबुक पर एक मैसेज में रंगभेद आन्दोलन के बाते में लिखा था, जब लूट शुरू होती है, तब शूटिंग भी शुरू होती है। बहुत विरोध के बाद भी फेसबुक ने इसे नहीं हटाया था जिससे नाराज होकर फेसबुक के अनेक कर्मचारी एक दिन की छुट्टी पर चले गए थे।

"द रूम व्हेयर आईटी हैप्पेंड" का प्रकाशन साइमन एंड स्चुस्टर नामक प्रकाशक कर रहे हैं। यदि यह सबकुछ भारत में किया जाता तो अबतक प्रकाशक राष्ट्रद्रोही बता कर जेल में डाल दिया जाता और उसपर सीबीआई और इनकम टैक्स की रेड भी पड़ चुकी होती और उसके चीन से सम्बन्ध भी बता दिए जाते, पर अमेरिका में ऐसा कुछ नहीं हुआ।

प्रकाशन साइमन एंड स्चुस्टर जुलाई में ट्रम्प की भतीजी द्वारा लिखी पुस्तक भी प्रकाशित करने वाले हैं। मैरी आई ट्रम्प जो पेशे से क्लिनिकल साइकोलोजिस्ट हैं, की पुस्तक का शीर्षक है, "टू मच एंड नेवर एनफ: हाउ माय फॅमिली क्रिएटेड थे वर्ल्डस मोस्ट डेंजरस मैन"। जाहिर है, इस पुस्तक में डोनाल्ड ट्रम्प से जुडी ऐसी अनेक जानकारियाँ होंगी, जिन्हें दुनिया अबतक नहीं जानती है।

वर्ष 2017 में अमेरिका में एक पुस्तक प्रकाशित की गयी थी, "फीयर : ट्रंप इन द व्हाइट हाउस"। इस पुस्तक के लेखक थे, बॉब वुडवॉर्ड। बॉब वुडवॉर्ड दुनिया में सबसे प्रमुख खोजी पत्रकारों में एक हैं और पिछले 4 दशकों से अधिक समय से पत्रकारिता से जुड़े रहे है। वे अब तक कुल 9 अमेरिकी राष्ट्रपतियों का ज़माना देख चुके हैं, और रिचर्ड निक्सन के समय के मशहूर वाटरगेट स्कैंडल को उजागर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा चुके हैं।

ध्यान रहे कि इस स्कैंडल के उजागर होने के बाद, सर्वशक्तिमान माने जाने वाले निक्सन को भी अपनी कुर्सी गंवानी पड़ी थी। बॉब वुडवॉर्ड ने अनेक चर्चित किताबें लिखी हैं – आल द प्रेसिडेंट्स मेन, बुश एट वार, द लास्ट ऑफ़ द प्रेसिडेंट्स मेन, द प्राइस ऑफ़ पॉलिटिक्स, स्टेट ऑफ़ डिनायल इनमें प्रमुख हैं। कुछ पुस्तकों पर तो फ़िल्में भी बनायी गयीं।

"फीयर: ट्रंप इन द व्हाइट हाउस" नामक पुस्तक में उन्होंने बताया है कि ट्रम्प के समय व्हाइट हाउस जैसा है, वैसा पहले कभी नहीं रहा। वुडवॉर्ड ने लिखा है कि अपने चुनाव प्रचार से अबतक ट्रंप में जनता विश्वास नहीं करती। ट्रंप तथ्यों पर भरोसा नहीं करते, या तभी भरोसा करते हैं जब तथ्य उनके या उनकी पार्टी के पक्ष में हों। ट्रम्प का मानना है कि आंकड़ें कुछ नहीं होते, और इन्हें अपनी सुविधानुसार कभी भी गढ़ा जा सकता है।

वुडवॉर्ड आगे लिखते हैं कि उन्होंने इसके पहले कभी किसी राष्ट्रपति को देश या दुनिया की वास्तविकता से इतना उदासीन नहीं देखा है। दूसरी तरफ वर्तमान अमेरिकी राष्ट्रपति अपनी हरेक योजना के गुण खुद ही गाते हैं और हरेक योजना को पूरी दुनिया में सबसे अच्छा और सबसे बड़ा बताते हैं।

ट्रम्प को लगता है कि दुनियाभर का सारा ज्ञान उनके पास ही है, चुटकियों में हरेक समस्या हल कर सकते हैं। वुडवॉर्ड के अनुसार ट्रम्प अपने भाषणों में हमेशा अपनी जिन्दगी का उदाहरण देते हैं, भले ही उसका कोई सबूत हो या नहीं हो।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प अपने कुछ चहेते पत्रकारों को छोड़कर बाकी मीडिया को अपना दुश्मन मानते हैं। हाल में ही उन्होंने प्रेस को जनता का दुश्मन करार दिया था। इस ट्वीट में उन्होंने बाकायदा सीएनएन, एमएसडीएनसी, न्यूयॉर्क टाइम्स और वाशिंगटन पोस्ट का नाम भी इन दुश्मनों में शामिल किया था।

जाहिर है, जब राष्ट्रपति को प्रेस अपना दुश्मन लगता है, तब पुलिस और सुरक्षा बलों को प्रेस पर ज्यादती की पूरी आजादी होगी। अमेरिका में रंगभेद के विरुद्ध इस आन्दोलन के दौर में 5 जून तक प्रेस की स्वतंत्रता पर 300 से अधिक हमले किये जा चुके हैं। इन हमलों में से 80 प्रतिशत से अधिक पुलिस ने किये हैं। इस अवधि में 49 पत्रकारों को रिपोर्टिंग करते हुए अरेस्ट किया गया, कुल 192 हमले किये गए और 42 मामलों में कैमरा या फिर रिपोर्टिंग के दूसरे उपकरण नष्ट किये गए।

रिपोर्टिंग करने के दौरान कुल 192 हमलों में से 160 से अधिक हमले पुलिस ने किये। पत्रकारों पर हमलों में कुल 69 शारीरिक हमलों में से 43 में पुलिस शामिल थी, 43 पत्रकारों पर आंसू गैस के गोले दागे गए, 24 पर मिर्च का पाउडर फेंका गया और 77 पर रबर बुलेट दागे गए।

यह सब उस देश का किस्सा है, जो दुनियाभर में मानवाधिकार का पाठ पढाता है और प्रेस की आजादी की वकालत करता है। इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स द्वारा प्रकाशित प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में अमेरिका 48वें स्थान पर है। ट्रम्प के शासन में आने के बाद से इस इंडेक्स में हरेक वर्ष अमेरिका कुछ स्थान और लुढ़क जाता है।

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