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तिब्बतियों को जबरन मजदूर बना रहा चीन, ट्रेनिंग सेंटर में वफादारी का भी दिया जा रहा प्रशिक्षण

Janjwar Desk
22 Sep 2020 4:05 PM GMT
तिब्बतियों को जबरन मजदूर बना रहा चीन, ट्रेनिंग सेंटर में वफादारी का भी दिया जा रहा प्रशिक्षण
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File photo

चीन सरकार तिब्बती लोगों को मजदूर बनाने के अभियान में जुटी हुई है, स्थानीय तिब्बतियों को उनकी जमीन से भी दूर किया जा रहा है, चीन ने इसके लिए पश्चिमी शिनजियांग के इलाके में मिलिट्री स्टाइल के ट्रेनिंग सेंटर्स स्थापित कर दिये हैं....

जनज्वारचीन का पड़ोसी देशों के साथ टकराव कोई नई बात नहीं। खासकर उसके कब्जे वाले इलाकों में उसके कथित अत्याचार की खबरें भी सामने आती रहतीं हैं। तिब्बत पर चीनी कब्जे के सात दशक गुजर चुके हैं, पर तिब्बत के स्थानीय निवासियों पर चीनी अत्याचार अब भी चल रहा है।

हाल के मीडिया रिपोर्ट्स में खुलासा हुआ है कि चीन सरकार तिब्बती लोगों को मजदूर बनाने के अभियान में जुटी हुई है। स्थानीय तिब्बतियों को उनकी जमीन से भी दूर किया जा रहा है। चीन ने इसके लिए पश्चिमी शिनजियांग के इलाके में मिलिट्री स्टाइल के ट्रेनिंग सेंटर्स स्थापित कर दिये हैं।

इन ट्रेनिंग सेंटर्स में तिब्बत से वहां के निवासियों को जबरन ले जाया जा रहा है और उन सेंटर्स में तिब्बतियों से मजदूरी करवाई जा रही है। यही नहीं, बल्कि इन सेंटरों में ले जाए जाने के बाद तिब्बती मजदूरों को सरकार और देश के साथ वफादारी का प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है।

मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया है कि चीन सरकार द्वारा मजदूरों के बड़े पैमाने पर ट्रांसफर का कोटा निर्धारित कर दिया गया है। यह खुलासा चीन की सरकारी मीडिया की 100 से अधिक रिपोर्ट्स के आधार पर हुआ है। इन सेंटरों के जरिए चीन अपने उद्योगों के लिए सस्ते और वफादार श्रमिकों को पैदा कर रहा है। वैसे चीन के लिए यह कोई नई बात नहीं है और चीन पर पहले भी अंतरराष्ट्रीय श्रमिक नियमों के उल्लंघन के कई गंभीर आरोप लग चुके हैं।

तिब्बत की क्षेत्रीय सरकार के वेबसाइट पर इसका आंकड़ा डाला गया है। इन आंकड़ों को लेकर मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया है कि जुलाई 2020 तक परियोजना के हिस्से के रूप में लगभग 50 लाख लोगों को प्रशिक्षित किया गया है। इनमें से लगभग 50000 लोगों को तिब्बत के अंदर ही अलग-अलग कंपनियों में काम करने के लिए भेजा गया है। जबकि, बाकी बचे लोगों को चीन के अन्य हिस्सों में भेजा गया है। इनमें से अधिकतर को कम मजदूरी भी दी जाती है और इन्हें टेक्सटाइल मैन्युफैक्चरिंग, कंस्ट्रक्शन और एग्रीकल्चर के फील्ड में काम पर रखा गया है।

स्वतंत्र तिब्बत और शिनजियांग के एक रिसर्चर एड्रियन झेनज के हवाले से मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया है कि 1966 से 1976 की चीन की सांस्कृतिक क्रांति के बाद से यह पारंपरिक तिब्बती आजीविका पर अबतक का सबसे मजबूत, सबसे स्पष्ट और लक्षित हमला है। इससे न केवल तिब्बती संस्कृति खत्म होगी, बल्कि लोगों के सामने आजीविका का संकट भी खड़ा हो जाएगा।

हालांकि, चीन के विदेश मंत्रालय ने इन आरोपों को खारिज किया है कि तिब्बत के लोगों को जबरदस्ती मजदूर बनाया जा रहा है। मंत्रालय ने अपने बयान में कहा है कि चीन कानून के शासन वाला देश है और श्रमिक स्वैच्छिक हैं और उचित रूप से मुआवजा दिया जाता है।

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