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कुर्सी बचाने में सफल रहे केपी शर्मा ओली लेकिन अब वो पहले की तरह शक्तिशाली नहीं रहे?

Janjwar Desk
28 July 2020 2:42 PM GMT
कुर्सी बचाने में सफल रहे केपी शर्मा ओली लेकिन अब वो पहले की तरह शक्तिशाली नहीं रहे?

ओली खुद को हटाए जाने के सभी प्रयासों को फेल करने में सफल हो गए लेकिन अब वो पहले की तरह शक्तिशाली नहीं रहे और उन्हें पार्टी के सह-अध्यक्ष प्रचंड और माधव कुमार नेपाल के नेतृत्व वाले धड़े के आगे झुकने को मजबूर होना पड़ा....

काठमांडू से सैन्द्र राय की रिपोर्ट

सत्ता में बैठी नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर हफ़्तों चले घमासान के बाद अब पार्टी के तीनों धड़ों के बीच युद्धविराम हो चुका है और अब काठमांडू में अनमनी सी शांति छाई है। एक हफ्ते पहले प्रधानमंत्री के.पी. ओली ने जो राजनीतिक जवाबी-तख्तापलट किया उसने हाल-फिलहाल के लिए भले ही उनका पद सुरक्षित कर दिया हो लेकिन इसके बदले उन्हें कुछ समझौते करने पड़े हैं। पते की बात ये है कि पिछले ढाई साल से नेपाल की राजनीति की विशेषता बन चुका शक्तिशाली प्रधानमंत्री कार्यालय का स्थान अब तीव्र त्रिकोणीय गतिरोध ने ले लिया है।

हालाँकि ओली खुद को हटाए जाने के सभी प्रयासों को फेल करने में सफल हो गए लेकिन अब वो पहले की तरह शक्तिशाली नहीं रहे और उन्हें पार्टी के सह-अध्यक्ष प्रचंड और माधव कुमार नेपाल के नेतृत्व वाले धड़े के आगे झुकने को मजबूर होना पड़ा।

यह कहना मुश्किल है कि दहाल द्वारा पैदा किये गए खतरों को दूर करने के लिए ओली ने कौन सी तरकीबें अपनाईं, लेकिन राजनीतिक विश्लेषक इस बात पर सहमत हैं कि एक बड़ा कारण बीजिंग से भेजा गया और चीनी राजदूत द्वारा पहुँचाया गया वो तल्ख़ सन्देश था जिसमें नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी को विभाजित नहीं करने की बात कही गयी थी। पार्टी के आम सदस्यों को ये संदेश समझ में आ गया और उन्होंने दहाल तथा ओली पर दबाव बनाया कि वे अहम की परस्पर टकराहट को ख़त्म करें और पार्टी व देश को बंधक न बनाएं।

परस्पर हुए समझौते में यह तय हुआ है कि ओली प्रधानमंत्री का अपना कार्यकाल पूरा करेंगे और 2022 के चुनाव के दौरान पद पर बने रहेंगे। इसके बदले प्रधानमंत्री इस बात के लिए तैयार हो गए हैं कि वे नवम्बर में होने वाले पार्टी विशेष सम्मलेन के दौरान नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के एकमात्र कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में प्रचंड का समर्थन करेंगे।

ओली ने दहाल को यहां तक विश्वास में ले लिया कि एक विचारधारा के रूप में माओवाद पुराना पड़ चुका है, और इसकी जगह अब उन्हें यूएमएल के दिवंगत नेता मदन भंडारी की 'पीपुल्स डेमोक्रेसी' की अवधारणा को समर्थन देना चाहिए। लेकिन दहाल ने यह भी महसूस किया होगा कि पार्टी में उनका अगला प्रतिद्वंदी माधव नेपाल है ना कि ओली और इसीलिये उन्होंने पाला बदलने का निर्णय लिया होगा।

खबर है कि ओली कैबिनेट में फेरबदल कर कुछ और दहाल के वफादारों को मंत्रीमंडल में शामिल करने को तैयार हो गए हैं। माधव नेपाल के समर्थकों के लिए भी अतिरिक्त पद गढ़ने होंगे। अभी कैबिनेट में माधव नेपाल के दो वफादार हैं : कृषि मंत्री घनश्याम भुसाल और पर्यटन मंत्री योगेश भट्टराई।

ओली को बचाने के राजनीतिक जोड़-तोड़ में गृहमंत्री राम बहादुर थापा और यूएमएल नेता बाम देव गौतम का पाला बदलना अहम था। बदले में इन दोनों को क्या-क्या मिला इसका हम कयास ही लगा सकते हैं। लेकिन ऐसा लगता है कि मध्यस्थता में शामिल तीसरी पायदान के नेताओं अगली सरकार में नवाजा जा सकता है। इनमें पूर्व माओवादी गुरिल्ला कमांडर जनार्दन शर्मा, देवेंद्र पौडेल और हरिबोल गजुरेल शामिल हैं।

गौरतलब है कि वित्तमंत्री युबराज ख़ातिवाड़ा ने अमेरिका में राजदूत बनने की अपनी ख्वाहिश किसी से छुपाई नहीं है। कैबिनेट में फेर-बदल में उनके स्थान पर सुरेंद्र पांडे या बिष्णु पौदेल को लिया जा सकता है। मुख्यमंत्रियों की अदला-बदली भी की जा सकती है और इस प्रक्रिया में ओली को अपने कुछ चहेते मुख्यमंत्रियों की छुट्टी भी करनी पड़ सकती है। इनमें गण्डकी सूबे के पृथ्वी सुब्बा गुरंग और सूबे नंबर ५ के शंकर पोखरेल के नाम चर्चा में हैं।

खरीद-फरोख्त की गहमा-गहमी के बाद अब खुमलटार, बालुवाटार और कोटेस्वर में सब कुछ शांत है। ये तीनों स्थान क्रमशः दहाल, ओली और माधव नेपाल के निवास स्थान हैं। बताया जा रहा है कि दहाल अपने परिवार के बीच समय बिता रहे हैं और कबूतरों को दाना डाल रहे हैं। माधव नेपाल अपने भविष्य को ले कर चिंतित हैं। और ओली तो ठहरे ओली, ज़रूर अपनी अगली चाल की योजना बना रहे होंगे।

अब जबकि सरकार गिरने का कोई फौरी खतरा नहीं है, प्रधानमंत्री ओली के लिए बेहतर होगा कि वो अब बरसात से हो रही तबाही में राहत पहुँचाने और कोविड-19 संकट से प्रभावी ढंग से निपटने में अपना ध्यान और ऊर्जा लगाएं। लेकिन पूरी संभावना है कि वो विभिन्न धड़ों को संतुष्ट करने के लिए मंत्री पदों का बंटवारा कर रहे होंगे।

नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के तीनों धड़ों में आपस में इतनी अधिक कटुता आ चुकी है कि जब कभी भी मंत्रिमंडल में फेर-बदल होता है तो मंत्रिमंडल के एक मिलीजुली सरकार की तरह काम करने की पूरी संभावना है।

(सैन्द्र राय की यह रिपोर्ट काठमांडू से प्रकाशित 'नेपाली टाइम्स' से साभार ली गई है।)

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