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राष्ट्रीय

Farm Laws Repeal Bill: कृषि कानूनों की वापसी से हुआ साफ, देश अब संसद से नहीं मोदी के टीवी बयानों से होगा संचालित

Janjwar Desk
29 Nov 2021 5:10 PM IST
Farm Laws Repeal Bill: कृषि कानूनों की वापसी से हुआ साफ, देश अब संसद से नहीं मोदी के टीवी बयानों से होगा संचालित
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( प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी )

Farm Laws Repeal Bill: देश के प्रधानमंत्री जिस दिन कैमरे के सामने ऐलान करते हैं कि संसद में हरेक विषय पर चर्चा करने को तैयार हैं, ठीक उसी दिन लोकसभा और राज्यसभा में विपक्ष की चर्चा की मांग के बीच तीनों कृषि कानूनों के वापसी का विधेयक (The Farm Laws Repeal Bill 2021) स्वीकृत हो जाता है|

महेंद्र पाण्डेय की टिप्पणी

Farm Laws Repeal Bill: देश के प्रधानमंत्री जिस दिन कैमरे के सामने ऐलान करते हैं कि संसद में हरेक विषय पर चर्चा करने को तैयार हैं, ठीक उसी दिन लोकसभा और राज्यसभा में विपक्ष की चर्चा की मांग के बीच तीनों कृषि कानूनों के वापसी का विधेयक (The Farm Laws Repeal Bill 2021) स्वीकृत हो जाता है| अभी हाल में ही देश के सर्वोच्च न्यायाधीश और कुछ मुख्य न्यायाधीश ने कहा था कि बिना पर्याप्त चर्चा के ही तमाम कानून पास किये जा रहे हैं, जिससे उनकी गुणवत्ता घटती जा रही है| आज जिसने भी लोकसभा और राज्यसभा का मंजर देखा होगा, उसके मन में यह प्रश्न जरूर उठ रहा होगा कि क्या वाकई देश को संसद की जरूरत है| इसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि जिस मुखिया के दौर में संसद की गरिमा सबसे अधिक गिरी है, उसी मुखिया को नए संसद भवन में बैठने की हडबडी भी है| इस मुखिया ने लोकतंत्र को पूरी तरह से लूट लिया है, और इसके कंकाल को नए चमचमाते आवरण में रखकर दुनिया के सामने पेश करता है|

कांग्रेस सांसद जयराम रमेश (Jairam Ramesh) ने ट्वीट किया है, "जितना कृषि क़ानून को पास कराना अलोकतांत्रिक था, उससे ज्यादा अलोकतांत्रिक इसके वापसी का तरीका है"| जिस अलोकतांत्रिक तरीके और संसाद की मर्यादा को तार-तार कर "द फार्म लॉज़ रिपील बिल 2021" को सरकार ने संसद में पास कराया है, उससे किसानों और किसान आन्दोलन के लिए कुछ प्रश्न तो जरूर उठते हैं| सबसे बड़ा प्रश्न तो यह है कि सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य (Minimum Support Price) और दूसरी मांगों पर आँख मूंदे बैठी रहेगी| यदि संसद में चर्चा होती, तो जाहिर है इन विषयों पर हरेक विपक्षी सांसद जोर देता और सरकार से इनपर कानून बनाने की मांग करता|

वैसे भी कृषि मंत्री ने ऐलान किया है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य और दूसरी मांगों पर विचार के लिए कमेटी बनाई जायेगी, जिसमें किसान प्रतिनिधि भी सदस्य होंगें| इस वक्तव्य से पहले कृषि मंत्री को यह जरूर बताना चाहिए था कि तीनों कृषि कानूनों के सन्दर्भ में पहले कितनी कमेटी बनाई गयी थी और उसमें कितने किसान नेता सदस्य थे? किसान आन्दोलन शुरू होने के ठीक पहले प्रधानमंत्री ने स्वयं कहा था कि तीनों कृषि कानूनों से न्यूनतम समर्थन मूल्य में कोई अंतर नहीं आएगा और यह जैसा है वैसा ही रहेगा| फिर आन्दोलन शुरू हुआ और कृषि मंत्री से किसान नेताओं की वार्ता का दौर शुरू हुआ, तब भी कृषि मंत्री शुरुआती वार्ता में कहते रहे कि, प्रधानमंत्री ने स्वयं न्यूनतम समर्थन मूल्य का आश्वासन दिया है, किसानों को और क्या गारंटी चाहिए| पर, किसान नेताओं ने इसे जुमला ही बताया था, और यह वास्तव में जुमला ही था क्योंकि आज तक न्यूनतम समर्थन मूल्य के गारंटी की बात सरकार ने कभी नहीं की|

सरकार बार-बार कहती है कि विपक्ष संसद चलने नहीं देता, पर यदि आप संसद के सत्र को बारीकी से देखें तो स्पष्ट होगा कि संसद सत्र नहीं चलने का कारण सरकार स्वयं है| हरेक सत्र के पहले दिन ही सरकार और सरकार की जी हुजूरी बजाते सदनों के सभापति कुछ ऐसा करते हैं जिससे पूरा विपक्ष लगातार हंगामा करने को बाध्य रहता है| पिछले सत्र में बेरोजगारी, किसान आन्दोलन के साथ ही पेगासस जासूसी काण्ड का मुद्दा था, जिसे विपक्ष उठाता रहा और किसी सदन में इस विषयों पर चर्चा नहीं की गयी| इस बार फिर से पहले ही दिन कृषि कानूनों की वापसी का मुद्दा आ गया| हंगामों से सरकार को इतना फायदा होता है कि जनता को लूटने वाले बिल सरकार आनन्-फानन में संसद से पास करा लेती है|

वैसे भी कृषि कानूनों को केवल किसानों की नजर से नहीं देखा जाना चाहिए| सरकार ने इसे सिख और हिन्दू का अंतर्राष्ट्रीय मुद्दा बना दिया था, और सरकारी भक्तों और सांसदों की नजर में हरेक सिख खालिस्तानी और उग्रवादी बना दिया गया था| इस सम्बन्ध में कनाडा आर ऑस्ट्रेलिया में भी हिन्दू-सिख दंगे भड़काने लगे थे| इससे पर्यावरण कार्यकर्ता का नाम भी जुड़ा और जेल में भी डाला गया| पॉप गाइका रिहाना का खूब चरित्र हनन किया गा और भक्तों ने उनके टॉपलेस फोटो पर खूब बारीक नजरें डालीं| पर्यावरण कार्यकर्ता ग्रेटा थनबर्ग को भक्तों ने खूब कोसा| इन सबके साथ ही किसान आन्दोलन में पाकिस्तान और चीन का हाथ बताने वाले सांसदों, विधायकों, आईटी सेल से प्रभावितों की बाढ़ आ गयी थी|

इन सबके बीच एक सरकारी रिपोर्ट से यह खुलासा हुआ है कि किसानों की खेती से दैनिक आय मनरेगा के मजदूरों से भी कई गुना कम है| यहाँ इस तथ्य को ध्यान में रखना होगा कि ग्रामीण परिवेश में अबतक मनरेगा के मजदूरों को आर्थिक तौर पर सबसे निचले दर्जे का माना जाता था| पर हमारे बडबोले प्रधानमंत्री के राज में किसानों की दुगुनी आय का भरोसा दिलाते-दिलाते ग्रामीण अर्थव्यवस्था के सबसे निचले पायदान पर खेती करने वाले किसान पहुँच गए हैं| पिछले महीने भारत सरकार के नेशनल स्टैटिस्टिकल आर्गेनाईजेशन द्वारा जुलाई 2018 से जून 2019 तक किसानों का विस्तृत अध्ययन कर सिचुएशन असेसमेंट रिपोर्ट को प्रकाशित किया गया है, इसके अनुसार खेती से जुड़े किसानों की कृषि उत्पादन के सन्दर्भ में आय महज 27 रुपये प्रतिदिन है, जबकि मनरेगा में काम करने वाले मजदूरों को 180 रुपये रोज मिलते हैं|

जिस देश की जनता को सरकार और मीडिया की हिंसक जुगलबंदी को लगभग खामोश कर दिया है, वहां किसान एक वर्ष से भी अधिक समय तक आन्दोलन की विजय पताका लहराते रहे| सरकार ने कहा, हम कागज़ नहीं दिखाएंगें और किसान बिना कागज़ देखे वापसी को तैयार नहीं हैं| अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या देश को ऐसे संसद की जरूरत है, जहां जनता के मुद्दों पर बहस की इजाजत नहीं दी जाती और सरकार अपनी मर्जी से कुछ भी कर लेती है|

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