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पक्षियों की 101 प्रजातियां भारत में खत्म होने के कगार पर

Vikash Rana
28 Feb 2020 9:23 AM GMT
पक्षियों की 101 प्रजातियां भारत में खत्म होने के कगार पर
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द स्टेट ऑफ़ द वर्ल्डस बर्ड्स नामक रिपोर्ट के अनुसार पूरे विश्व में पक्षियों की संख्या कम हो रही है, और हरेक आठ प्रजातियों में से एक प्रजाति पर विलुप्त होने का संकट है...

जनज्वार। द स्टेट ऑफ़ इन्डियाज बर्ड्स 2020 के अनुसार देश में पक्षियों की 101 प्रजातियां विलुप्तीकरण की तरफ बढ़ रहीं हैं, और इनकी सुरक्षा के उपाय तत्काल खोजने होंगें। इस अध्ययन के लिए लगभग पक्षियों को खोजने वाले 15000 व्यक्तियों के लगभग एक करोड़ अध्ययनों का सहारा लिया गया जो पिछले 25 वर्षों से यह काम कर रहे हैं।

पिछले 25 वर्षों के दौरान पक्षियों की 261 प्रजातियों में से लगभग 52 प्रतिशत प्रजातियां संकटग्रस्त हैं, जबकि पिछले 5 वर्षों के दौरान पक्षियों की देखी गई 146 प्रजातियों में से लगभग 80 प्रतिशत प्रजातियां विलुप्तीकरण की तरफ बढ़ रहीं हैं। संकटग्रस्त प्रजातियों में से अधिकतर प्रजातियाँ शिकार योग्य, सम्द्रों के तट पर मिलने वाली और प्रवासी प्रजातियाँ हैं। सलीम अली सेन्टर फॉर ओर्निथोलोजी एंड नेचुरल हिस्ट्री के डॉ आर जैपाल के अनुसार अब तो अनेक सामान्य प्रजातियाँ भी विलुप्तीकरण की कगार पर पहुँच चुकीं हैं.

रिपोर्ट के अनुसार प्रजातियों पर संकट के इस दौर में भी मोर, कबूतर, रोजी स्टर्लिंग, ग्लॉसी इबिस, प्लेन प्रिनिया और ऐशी प्रिनिया जैसे पक्षियों की प्रजातियों के सदस्यों की संख्या लगातार बढ़ रही है। दूसरी तरफ सबसे संकट में बंगाल का गिद्ध (वाइट वल्चर), भारतीय गिद्ध, रिचर्ड्स पिपीट, लीफ वेब्लेर, पसिफ़िक गोल्डन प्लोवर और सैंड पाइपर जैसी प्रजातियाँ हैं।

दिल्ली और उत्तर प्रदेश की सीमा पर नोएडा में स्थित ओखला पक्षी विहार में हाल में ही पक्षियों की संख्या का आकलन किया गया। इस आकलन में 115 प्रजातियों के कुल 21061 पक्षी पाए गए, जबकि पिछले गणना के दौरान 73 प्रजातियों के कुल 24347 पक्षी पाए गए थे।

स्टेट ऑफ़ द वर्ल्डस बर्ड्स नामक रिपोर्ट के अनुसार पूरे विश्व में पक्षियों की संख्या कम हो रही है, और हरेक आठ प्रजातियों में से एक प्रजाति पर विलुप्त होने का संकट है। विलुप्त होने की तरफ बढ़ती प्रजातियों में बहुत सारी सामान्य प्रजातियाँ हैं। पूरी दुनिया में कृषि का अभूतपूर्व विस्तार वर्त्तमान में पक्षियों के लिए सबसे बड़ा खतरा है। यह रिपोर्ट पिछले वर्ष इंग्लैंड की एक संस्था, बर्ड लाइफ इंस्टिट्यूट, ने प्रकाशित की थी। यह संस्था हरेक पांच वर्ष में पक्षियों की संख्या पर एक रिपोर्ट प्रकाशित करती है।

रिपोर्ट के अनुसार कृषि में विस्तार के बाद पक्षियों को वनों के कटने, हमलावर पक्षियों और जानवरों से, शिकार से, जलवायु परिवर्तन से और विकास से मुख्य खतरे हैं। हरेक पांच वर्षों बाद जब यह रिपोर्ट प्रकाशित की जाती है, पहले से अधिक प्रजातियाँ विलुप्त होने के कगार पर पहुँच जाती हैं। अब इसकी दर पहले से अधिक तेज हो गयी है। लगभग एक दशक पहले तक पर्वतों पर ऊचाई पर या किसी सुदूर टापू पर रहले वाले पक्षी ही विलुप्त होते थे, पर अब तो बहुत सारे प्रजातियाँ जो हमारे आसपास रहती हैं, भी विलुप्त होती जा रही हैं या फिर उनकी संख्या में तेजी से कमी आ रही है।

क्षियों की सारी प्रजातियों में से 40 प्रतिशत में कमी आ रही है, 44 प्रतिशत प्रजातियों की संख्या स्थिर है, 7 प्रतिशत की संख्या बढ़ रही है और 8 प्रतिशत प्रजातियों की सूचना उपलब्ध नहीं है। रिपोर्ट के अनुसार कुल 1469 प्रजातियाँ ऐसी हैं जिनपर विलुप्त होने का संकट है – इनमे से 74 प्रतिशत कृषि के विस्तार के कारण, 50 प्रतिशत वनों के कटने के कारण, 39 प्रतिशत दूसरे जंतुओं या पक्षियों के कारण, 35 प्रतिशत शिकार के कारण, 33 प्रतिशत जलवायु परिवर्तन के कारण और 28 प्रतिशत मानव की गतिविधियों के कारण संकट में हैं। पक्षियों की कुल ज्ञात 10996 प्रजातियों में से 13 प्रतिशत, यानि 1469 प्रजातियों, पर संकट अधिक है, और ये प्रजातियाँ विलुप्त होने की दिशा में तेजी से बढ़ रहीं हैं।

क्षियों का शिकार भी बड़े पैमाने पर किया जा रहा है। पक्षियों की सबसे अधिक विविधता भूमध्य सागर के क्षेत्र में है और इस क्षेत्र में हरेक वर्ष लगभग 120 लाख से 380 लाख के बीच पक्षी मारे जाते हैं। अमेरिका में पहले पैसेंजर पिजन बहुत सामान्य थे, हरेक जगह मिलते थे, पर 1914 में ये विलुप्त हो गए। येलो ब्रेस्टेड बंटिंग पहले यूरोप और एशिया में हरेक जगह पाए जाते थे, अब इनका दायरा 5000 किलोमीटर से भी कम रह गया है और वर्ष 1980 के बाद से इनकी संख्या में 90 प्रतिशत से अधिक गिरावट आयी है।

नका मांस विशेष चीनी व्यंजनों में इस्तेमाल किया जाता है इसी लिए बड़े पैमाने पर इनका शिकार किया जाता है। स्नो आउल, पफ्फिंस और गिद्धों की अनेक प्रजातियाँ, जो पहले बहुत सामान्य थीं और हरेक जगह मिलती थीं अब विलुप्त हो रही हैं। अनेक प्रजातियों की संख्या में पिछले एक दशक के दौरान ही 90 प्रतिशत से अधिक की कमी आ गयी है।

लवायु परिवर्तन और अत्यधिक मछलियों के शिकार के कारण महासागरों के आसपास रहने वाले पक्षियों की प्रजातियाँ संकट में हैं। रिपोर्ट के अनुसार वैज्ञानिक अब पक्षियों को बचाने में सक्रिय हैं और कम से कम 25 ऐसी प्रजातियाँ हैं, जिन्हें वैज्ञानिकों ने विलुप्त होने से पहले ही बचा लिया।

यूनिवर्सिटी ऑफ़ एक्सटर और ब्रिटिश ट्रस्ट फॉर ओर्निथोलोजी द्वारा संयुक्त तौर पर किये गए एक अध्ययन के अनुसार शहरी क्षेत्रों में, विशेष तौर पर गरीब इलाकों में, मधुर आवाज वाले पक्षी कम होते हैं और परेशान करने वाले पक्षी अधिक. यह अध्ययन जर्नल ऑफ़ एप्लाइड इकोलॉजी के नए अंक में प्रकाशित किया गया है।

ध्ययन के अनुसार, शहरों में प्रतिव्यक्ति पक्षियों की संख्या ग्रामीण क्षेत्रों की अपेक्षा कम होती है, इनमे भी जो पक्षी अच्छे लगते हैं वे बहुत कम होते हैं। हरेभरे स्थानों पर पक्षियों की संख्या शहरों की अपेक्षा 3.5 गुना अधिक होती है। वैज्ञानिकों के अनुसार जब आपके सामने तरह तरह की चिड़िया होती हैं या आप उनका कलरव सुनते है, तब आपका तनाव, उदासी और अवसाद ख़त्म हो जाता है।

डॉ डेनियल कॉक्स, जो यूनिवर्सिटी ऑफ़ एक्सटर में वैज्ञानिक हैं, के अनुसार यदि मीठा बोलने वाली चिड़ियों की संख्या प्रतिव्यक्ति 1.1 से अधिक होती है तब लोग तनाव कम महसूस करते हैं. वैसे भी प्राकृतिक आवास में वन्य जीव तो हम देख नहीं पाते, पर पक्षियों के देखकर यह अहसास जरूर होता है.

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