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मोदी राज में गाय के नाम पर मुस्लिम समुदाय के 36 लोगों की हत्या

Prema Negi
22 Feb 2019 7:32 AM GMT
मोदी राज में गाय के नाम पर मुस्लिम समुदाय के 36 लोगों की हत्या
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4 सालों में गाय के नाम पर मारे गए 44 लोगों में 36 मुस्लिम और 8 अल्पसंख्यक शामिल, लिंचिंग करने वाले लोगों को बचाने में शासन-प्रशासन रहा हमेशा आगे

महेंद्र पाण्डेय, वरिष्ठ लेखक

जनज्वार। ह्यूमेन राइट्स वाच नामक संस्था द्वारा प्रकाशित एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार भारत में गाय के नाम पर या इसी तरह के अन्य बहानों के नाम पर पिछले चार वर्षों में हिंसा की खुली छूट है। भीड़ द्वारा मारे गए लोगों में अधिकतर मुस्लिम या फिर अल्पसंख्यक लोग हैं और जो लोग ऐसी हिंसा करते हैं उन्हें बचाने में स्थानीय प्रशासन, स्थानीय राजनेता और पुलिस सभी संलग्न रहते हैं।

रिपोर्ट में सरकार से अपील की गयी है कि इस तरह की हिंसा में संलग्न लोगों को कड़ी से कड़ी सजा सुनिश्चित करे। इसका आदेश सर्वोच्च न्यायालय ने भी दिया था, पर इस आदेश का पालन करता कोई राज्य नहीं दिखाई देता है। गाय बचाने के नाम पर भीड़ का रवैया अभी वही चल रहा है।

रिपोर्ट के अनुसार मई 2015 से दिसम्बर 2018 के बीच कम से कम 44 व्यक्ति गौ मांस के शक में या फिर गाय के व्यापार के शक में मारे जा चुके हैं। इन 44 व्यक्तियों में से 36 मुस्लिम थे। गाय के आरम्भ से ही पवित्र माना जाता रहा है, पर गाय का नाम लेकर भीड़ का ऐसा तांडव नया चलन है। केरल, गोवा और तमिलनाडु के बहुत से हिन्दू गौ-मांस खाते हैं, अल्पसंख्यक समुदाय के लिए यह प्रोटीन का सबसे सस्ता स्त्रोत है और अल्पसंख्यक समुदाय ही गाय के मरने के बाद का काम करता है।

वर्ष 2014 से पहले के पांच वर्षों की तुलना में इसके बाद के चार वर्षों के दौरान जनता के चुने गए प्रतिनिधियों द्वारा साम्प्रदायिक भाषणों में 500 प्रतिशत का इजाफा हो गया है, और ऐसा करने वाले अधिकतर प्रतिनिधि बीजेपी के हैं। गाय के नाम पर भीड़ द्वारा हिंसा की 90 प्रतिशत से अधिक घटनाएँ बीजेपी के सत्ता में आने के बाद हुई हैं और 66 प्रतिशत घटनाएँ ऐसे राज्यों में हुई हैं, जहाँ बीजेपी का शासन था।

ह्यूमन राइट्स वाच की साउथ एशिया डायरेक्टर मीनाक्षी गांगुली के अनुसार इस तरह की घटनाओं की शुरुआत भले ही हिन्दू वोट बटोरने के लिए की गयी हो, पर अब यह सब नियंत्रण के बाहर हो गया है, और निशाना अल्पसंख्यक बन रहे हैं।

रिपोर्ट में इस तरह की 11 घटनाओं का विश्लेषण कर यह बताया गया है कि किन कारणों से ऐसे लोगों पर कार्यवाही नहीं की जाती। एक घटना में ह्त्या करने वाले ने यह बताया कि उसने हत्या की है, पर स्थानीय पुलिस ने उस स्टेटमेंट को कोर्ट में पेश ही नहीं किया। दूसरी घटना में भीड़ को स्थानीय नेताओं का संरक्षण प्राप्त था इसलिए पुलिस ने मामला उठने ही नहीं दिया।

जून 2018 में जब भीड़ ने गौ-मांस के नाम पर जब एक मुस्लिम को मार दिया, तब पुलिस में इसे मोटरसाइकिल दुर्घटना का केस बना दिया। रिपोर्ट के अनुसार लगभग हरेक घटना में पुलिस का रवैया एक जैसा ही रहता है, शिकायत दर्ज नहीं करना, घटना की छानबीन नहीं करना, सबूतों को नष्ट करना और यहाँ तक कि हत्या में खुद शामिल हो जाना। घटना की तत्परता से तहकीकात कर मुजरिम को पकड़ने के बजाय पुलिस पीड़ित को, गवाहों को या फिर पीड़ित के सगे-सम्बन्धियों को ही मुजरिम ठहराने के लिए पूरा जोर लगा देती है।

अनेक जन-अधिकार कार्यकर्ताओं के अनुसार, इस रिपोर्ट से सरकार को शर्म आनी चाहिए कि उसने कैसे भीड़ द्वारा हिंसा को वैध कर दिया है। पर, इस सरकार से शर्म की आशा करना बेमानी है, कम से कम पिछले साढे चार वर्षों का अनुभव तो यही साबित करता है।

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