मध्यप्रदेश के खरगोन में 197 आदिवासी मजदूर किसानों ने दी गिरफ्तारी, 16 दिसंबर से धरने पर बैठे थे आदिवासी किसान मजदूर, कलेक्ट्रेट में जबरन घुसने के आरोप में मुकदमा दर्ज….

 रोहित शिवहरे की रिपोर्ट

जनज्वार। मध्य प्रदेश के दक्षिण पश्चिम में स्थित शहर खरगोन में 18 दिसंबर को कड़कड़ाती ठंड में 197 आदिवासी किसान मजदूरों ने ‘हक नहीं तो जेल सही’ के नारे के साथ गिरफ्तारी दी है। इस लड़ाई का नेतृत्व जागृत आदिवासी दलित संगठन कर रहा है। इन 197 लोगों में नेत्री माधुरी बेन को भी गिरफ्तार कर लिया गया। खरगोन प्रशासन ने धारा 151 के तहत इन सभी पर कलेक्ट्रेट में जबरन घुसने के आरोप में मुकदमा दर्ज किया है।

बुरहानपुर जिले के आदिवासी किसान मजदूर खरगोन में 16 दिसंबर से धरने पर बैठे हुए हैं। ये लोग खरगोन बड़वानी के खारक डूब प्रभावित परिवारों के समर्थन में बुरहानपुर के जिला मुख्यालय में एकत्रित हुए हैं। खारक बांध के डूब प्रभावित परिवार विरोध प्रदर्शन के लिए 40 किलोमीटर धूलकोट से खरगोन तक पैदल चलकर जिला मुख्यालय में अपने पुनर्वास के अधिकार के लिए धरने पर बैठे हैं। 2014 में बांध निर्माण के चलते इन 300 से ज्यादा आदिवासी परिवारों लगभग साढे 4 साल पहले अपनी जमीनों को  को दिया था। कड़े संघर्ष के बाद भी किसी भी पर परिवार को आज तक नियम एवं कानून अनुसार पुनर्वास एवं मुआवजा नहीं मिला है।

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शरथ वास्कले कहते हैं, ‘6 महीने पहले इस मामले में हम खरगोन के डूब प्रभावितों के साथ भगवानपुरा के विधायक केदार डावर के साथ मिलकर अपील भी कर चुके हैं लेकिन इन परिवारों को न्याय दिलाने में राज्य सरकार विफल साबित हो रही है। मुख्य सचिव मोहंती व अतिरिक्त सचिव जल संसाधन विभाग गोपाल रेड्डी से भी कई बार अपील कर चुके हैं लेकिन उनके द्वारा आश्वासन दिए जाने के बाद भी खारक के डूब प्रभावितों का पुनर्वास नहीं हुआ है। ऐसी स्थिति में प्रशासनिक तंत्र की ओर से लोगो की परेशानियों का निवारण करने की मंशा नजर नहीं आती। पहले शिवराज सरकार और अब कांग्रेस सरकार आदिवासियों की जिंदगी के साथ मजाक करते दिख रही है तो हम जानना चाहते हैं कि आदिवासियों की सरकार कहां है?

जागृत आदिवासी दलित संगठन के युवा नितिन वर्गिस बताते हैं, ‘लगभग दो साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि डूब प्रभावितों का पुनर्वास किया जाए और इसी आदेश के अनुसार 3 सेवानिवृत्त जिला जजों द्वारा एक-एक परिवार हेतु पुनर्वास निर्धारित करना था। 129 परिवारों के दावों की जांच कर सभी के लिए पुनर्वास राशि निर्धारित की गई थी लेकिन तब शिवराज सरकार ने वह राशि भी उपलब्ध करने के लिए पहले इनकार किया और फिर डूब प्रभावितों के द्वारा आंदोलन करने पर तीन जजों के आदेश के खिलाफ उन्हीं के समकक्ष अपने पसंद के एक और सेवानिवृत्त जज के सामने अपील पेश कर दी। इस गैरकानूनी व्यवस्था में दो प्रभावितों के पुनर्वास के हक को उलझा दिया। नई सरकार बनने के बाद आदिवासियों को उम्मीद थी कि उन्हीं के वोट से बनने वाली सरकार डूब प्रभावितों को न्याय देगी और कोर्ट के आदेश का पालन करेगी। परंतु खारक बांध के प्रभावितों को आज तक इस गैर कानूनी व्यवस्था से छुटकारा नहीं मिल पाया है और न ही पुनर्वास की राशि गई है।

नितिन वर्गिस आगे कहते हैं, ‘128 छोटे परिवारों के दावों की जांच के लिए खरगोन में एक नया जीआरए गठित किया गया है जिसका हम स्वागत करते हैं, लेकिन राज्य सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि गठित जी आगे की कार्यवाही अनुसार जल्द से जल्द प्रभावितों को पुनर्वास एवं उचित मुआवजा दिया जाएगा। साथ ही सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर 97 परिवारों के दावों की जीआरए द्वारा करी गई जाँच जिसमें कई परिवारों को अलग-अलग राशि अवार्ड किया गया है। इन परिवारों ने अपने बैंक खातों का विवरण प्रशासन को दे दिया है। इनका भुगतान अतिशीघ्र किया जाए।

2012 से हो रहा है विरोध प्रदर्शन

सितंबर 2018 में जब शिवराज सरकार ने सरकार के पास फंड ना होने की बात कही थी जिसके विरोध में बाढ़ प्रभावितो ने गरीब सरकार को आदिवासी मालिकों की ओर से भीख अभियान चलाया ₹440 और एक खिलौने का हेलीकॉप्टर अधिकारियों के मना करने के बाद कलेक्ट्रेट के सामने रख कर चले गए।

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जागृत आदिवासी दलित संगठन के कार्यकर्ता अंतराम आड़से बताते हैं हमारे बारेला आदिवासी संगठन के बैनर तले 2012 से पुनर्वास की मांग कर रहे हैं जब खड़क बांध के लिए जमीन पहली बार अधिग्रहित की गई थी। हमारे विरोध को मुख्यमंत्री और प्रशासन तभी से नजरअंदाज कर रहे हैं। बांध के निर्माण के कारण हमारे खेतों में पानी भर गए घर बर्बाद हो गए परिवार विस्थापित हो गए लेकिन अभी तक इन परिवारों को मुआवजा मुहैया नहीं कराया गया है। मुआवजे की अनुमानित राशि 20 करोड़ है इतना तो प्रदेश सरकार अपने नेताओं मंत्रियों के नाश्ते पर खर्च कर देती है।


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