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राजनीति

54 हजार छात्रों की उत्तराखंड में दबा ली गयी छात्रवृत्ति

Janjwar Team
1 Oct 2017 8:52 PM GMT
54 हजार छात्रों की उत्तराखंड में दबा ली गयी छात्रवृत्ति

एक साल से अधिक हो जाने के बावजूद सरकार ने इस अपराध में अधिकारियों को दंडित करने की बजाय पुरस्कृत किया है। इस पूरे खेल के मास्टरमाइंड अधिकारी को नियम विरूद्ध नौकरी पर एक्सटेंशन दिया है...

चंद्रशेखर करगेती

उत्तराखण्ड सरकार को प्रेषित भारत के महालेखाकार विभाग 'कैग' की रिपोर्ट के अनुसार समाज कल्याण विभाग के अधिकारियों ने एससी और पिछड़ी जाति के छात्रों की छात्रवृत्ति का पैसा नहीं दिया है। छात्रवृत्ति के अधिकार से वंचित रखे गए इन छात्रों की संख्या दो—चार में नहीं, बल्कि 54 हजार के करीब है।

सरकारी योजनाओं और उनमें खर्च हुए पैसों का लेखा—जोखा रखने वाली सरकारी संस्था कैग ने जुलाई 2016 में उत्तराखंड सरकार को प्रेषित रिपोर्ट में बताया कि 2013 से 2016 के बीच देहरादून, हरिद्वार तथा उधमसिंहनगर जिलों में तैनात समाज कल्याण अधिकारियों ने छात्रों की छात्रवृत्ति का पैसा ही नहीं वितरित किया।

रिपोर्ट के अनुसार 2013 से 2016 के बीच उक्त जिलों में तैनात समाज कल्याण विभाग के अधिकारियों ने दसवीं कक्षा तक कि छात्रवृति को पर्याप्त फण्ड होने के बावजूद एससी और पिछड़ी जाति के छात्रों को छात्रवृत्ति नहीं दिया।

अधिकारियों ने छात्रवृत्ति की धनराशि को कोषागार से निकाल कर बैंकों में रख लिया था, जिससे 53,585 अनुसूचित जाति एंव पिछड़ी जाति के छात्र ड्यू हो चुकी छात्रवृति पाने से वंचित रह गये।

कैग ने सरकार को प्रेषित अपनी रिपोर्ट में लिखा है :

"The Department was not able to ensure compliance with provisions of the guide lines laid down for providing scholarship to schedule cast and other backward class students leading to instance of inadmissible payments, excess payments, parking of funds, and payment to ineligible students. The online system developed by the department was not robust enough in detecting discrepancies in enrolment / disbursement of scholarship.
As per Para 162 of financial handbook Vol. V, no money should be withdrawn from treasury unless it is required for immediate disbursement.

It was also observed that 53,385 students remains deprived of the due scholarship despite such availability and parking of funds."

The matter was reported to Government (July, 2016)

कैग ने उक्त के अतिरिक्त अपनी रिपोर्ट में बहुत कुछ और भी लिखा है, पढ़ने वाले जान लें कि सरकार के लिए ऐसी रिपोर्ट सिर्फ फाईलों में दफन होने को होती है कार्यवाही करने को नहीं।

गौरतलब है कि उक्त वित्तीय अनियमिताओं के लिए दोषी किसी भी एक अधिकारी के विरूद्ध कोई कठोर कार्यवाही सरकार ने 1 साल से अधिक बीत जाने के बावजूद नहीं की है।

इसके उलट विभाग के जिस निदेशक के कार्यकाल में कैग रिपोर्ट में उल्लेखित वित्तीय अनियमिततायें हुईं उसे सरकार ने दंड के बजाय ईनाम दिया है, पद से सेवानिवृत्त होने के बाद भी पिछले लगभग 18 माह से उसे नियम विरूद्ध सारे वित्तीय अधिकार देकर उसे उसके पद पर भी बनाये रखा हुआ है।

निदेशालय के जिस छात्रवृति योजना प्रभारी के कार्यकाल में ये सब हुआ उसे हल्द्वानी में उसके मूल पद पर बैठाने के बजाय उसे विशेष रूप से देहरादुन में ही सम्बद्ध कर शासन और विभाग के सारे महत्वपूर्ण कार्य दिए हुए हैं, जबकि निदेशालय हल्द्वानी में है।

जिस एक जिला समाज कल्याण अधिकारी के कार्यकाल में राज्य के दो जिलों में रिपोर्ट में उल्लेखित वित्तीय अनियमिततायें हुईं उसे विभागीय मंत्री की कृपा से न केवल राज्य के एक महत्वपूर्ण जिले का प्रभार देकर राज्य स्तर के उस कार्य को संचालित करने का प्रभार भी दे दिया गया, जिसका उसे ज्ञान न होने के साथ-साथ वह खुद सिस्टम का डिफाल्टर रहा है।

अब कोई दावा करे तो करे कि सरकार भ्रष्टाचार पर जीरो टोलरेंस रखती है, हम सरकार की कथनी और करनी का फर्क देख ही रहे हैं।

(चंद्रशेखर करगेती हल्द्वानी में वकील हैं और वह जनहित से जुड़े मुद्दों को लेकर सक्रिय रहते हैं।)

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