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सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज ने 'आरोग्य सेतु' पर उठाए सवाल, पूछा अगर डेटा लीक हुआ तो जिम्मेदार कौन होगा?

Nirmal kant
12 May 2020 9:35 AM GMT
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज ने आरोग्य सेतु पर उठाए सवाल, पूछा अगर डेटा लीक हुआ तो जिम्मेदार कौन होगा?
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न्यायमूर्ति बीएस श्रीकृष्ण ने कहा कि जो कदम उठाने का दावा हो रहा है, वह डेटा की सुरक्षा के लिए पर्याप्त नहीं है। इसमें कई सारी खामियां है। यह देखने में तो अच्छा लग रहा है, लेकिन यदि डेटा लीक होता है तो जिम्मेदार कौन होगा?

जनज्वार ब्यूरो। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश बीएस श्रीकृष्ण ने कहा कि अरोग्य सेतु के इस्तेमाल को अनिवार्य करना गैर-कानूनी है। किसी पर भी इसके लिए दबाव नहीं बनाया जा सकता कि वह इसका इस्तेमाल करें। न्यायूमर्ति श्रीकृष्ण व्यक्तिगत डेटा संरक्षण विधेयक मसौदे की समिति के अध्यक्ष भी रह चुके हैं।

'इंडियन एक्सप्रेस' से बातचीत करते हुए उन्होंने कहा, 'आप किस कानून के तहत लोगों को इस तरह का आदेश देते हैं। क्योंकि ऐसा कोई नियम या कानून है ही नहीं जो आरोग्य सेतु के इस्तेमाल को अनिर्वाय करता हो।' उन्होंने जोर देकर कहा कि इस तरह का आदेश देना पूरी तरह से अवैध है।

1 मई को देश में लागू लॉकडाउन के बीच ही गृह मंत्रालय ने निर्देश दिए थे कि सभी निजी और सार्वजनिक क्षेत्र के कर्मचारियों को आरोग्य सेतु ऐप डाउनलोड करना अनिवार्य है। राष्ट्रीय आपदा प्रबधंन अधिनियम 2005 के तहत गठित नेशनल एग्जिक्यूटिव कमेटी ने यह दिशा-निर्देश जारी किए थे। इसमें स्थानीय अधिकारियों को यह भी निर्देश दिये गये थे कि कंटेंट जोन में ऐप शत प्रतिशत काम करना चाहिए।

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न्होंने कहा कि नोएडा पुलिस ने इस बारे में जो आदेश दिया है, वह कानूनन सही नहीं है क्योंकि हम लोकतांत्रिक देश में रह रहे हैं, इस तरह के आदेश को अदालत में चुनौती दी जा सकती है।

न्यायमूर्ति श्रीकृष्ण ने कहा कि ऐसा कोई कानून ही नहीं है जो 'आरोग्य सेतु' का इस्तेमाल करना अनिवार्य बनाता हो। जिस राष्ट्रीय कार्यकारी समिति ने इस तरह के निर्देश जारी किए हैं, उसे वैधानिक अधिकार प्राप्त नहीं है। यूं भी राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन अधिनियम और महामारी रोग अधिनियम किसी कारण विशेष के लिए होते हैं। निजता का अधिकार एक मौलिक अधिकार है।

ने डेटा की सुरक्षा के लिए कमेटी गठन के अध्यक्ष न्यायामूर्ति श्रीकृष्ण को नियुक्त किया था। विशेषज्ञों और अधिकारियों की समिति ने देशभर में सुनवाई करने के बाद जुलाई 2018 में अपनी रिपोर्ट दी। रिपोर्ट में प्रस्तावित किया गया कि डेटा संरक्षण कानून का ड्राफ्ट तैयार किया गया। यह बिल अब संसद में रखा जाना है।

रिपोर्ट में सिफारिश की गई है कि किसी का व्यक्तिगत डेटा यदि लिया जाता है तो उसके पीछे वाजिब ठोस कारण होना चाहिए। डेटा कानूनी उद्देश्यों के लिए लिया जाना चाहिए। समिति ने हर डेटा धारक के कई अधिकारों की सिफारिश भी की है। यह भी कहा गया था कि यदि अधिकारियों ने यदि किसी गलत मंशा के कोई डेटा लिया है तो इसे तुरंत ही डिलिट किया जाना चाहिए।

र्वोच्च न्यायालय ने 2017 के ऐतिहासिक फैसले में निजता के मौलिक अधिकार को मान्यता दी है। सिर्फ तीन परिस्थितियों में ही किसी का व्यक्तिगत डाटा लिया जा सकत है। इसमें पहली शर्त यह है कि कार्रवाई संसद द्वारा पारित कानून के तहत होनी चाहिए। सरकार को यह बताना होगा कि डेटा लेना राज्य के हित में हैं। यह भी साबित करना होगा कि डेटा लेना जरूरी है, क्योंकि इसके सिवाय अब कोई विकल्प नहीं बचा है।

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सोमवार को आरोग्य सेतु प्रयोग के दौरान डाटा सुरक्षा के लिए कई कदम उठाने का दावा किया गया। बताया गया कि इसके प्रयोग से व्यक्तिगत जानकारी पूरी तरह से सुरक्षित रहेगी। आपदा प्रबंधन अधिनियम की राष्ट्रीय कार्यकारी की ओर से दावा किया गया कि यदि ऐप के प्रयोग के दौरान किसी का निजी डेटा लीक होता है तो कड़ी र्कावाही होगी। इसके लिए एक गाइडलाइन तैयार की गयी है, यह भी दावा किया गया कि इसका हर हालत में पालन किया जाएगा।

श्रीकृष्ण ने कहा कि जो कदम उठाने का दावा हो रहा है, वह डेटा की सुरक्षा के लिए पर्याप्त नहीं है। इसमें कई सारी खामियां है। यह देखने में तो अच्छा लग रहा है, लेकिन यदि डेटा लीक होता है तो जिम्मेदार कौन होगा?

सोमवार को वकीलों के वेबिनार में आरोग्य सेतु के प्रयोग में व्यक्तिगत डेटा सुरक्षा के उपायों को बस एक 'पैचवर्क' करार दिया गया। बताया गया कि इससे लाभ की बजाए इससे नुकसान हो सकता है। इसमें कहा गया कि यह

'बेहद आपत्तिजनक' है कि ऐसा आदेश कार्यकारी स्तर पर जारी किया जाता है। इसके लिए होना यह चाहिए कि संसद में सरकार इस बारे में कानून पास करे जिससे सरकार को ऐसा आदेश जारी करने का अधिकार प्राप्त होगा।

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