Top
उत्तर प्रदेश

Ground Report : मिडडे मील था जिनके पेट का एकमात्र सहारा, उन हजारों बच्चों के सामने लॉकडाउन में भूखों मरने की नौबत

Prema Negi
26 April 2020 10:10 AM GMT
Ground Report : मिडडे मील था जिनके पेट का एकमात्र सहारा, उन हजारों बच्चों के सामने लॉकडाउन में भूखों मरने की नौबत
x

सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले अधिकतर छात्र गरीबी में जीने वाले परिवारों के होते हैं, जिनको किसी अच्छे प्राइवेट स्कूल में शिक्षा प्राप्त करना तो छोड़िए दो वक्त का अच्छा भोजन भी बमुश्किल मिल पाता है, ऐसे में लॉकडाउन से उनके लिए भरपेट भोजन भी हो गया है सपना...

कानपुर से मनीष दुबे की रिपोर्ट

जनज्वार। कानपुर के नौबस्ता में रहने वाली कक्षा 4 की छात्रा खुशी राजपूत के पिता नहीं हैं। खुशी यहीं के एक प्राथमिक विद्यालय में पढ़ती है। उसकी मां कहीं काम-धाम कर घर व बच्चों का खर्चा गुजारा चलाती है। खुशी को उसके स्कूल में मिलने वाले मिड- डे मील वाले भोजन से बड़ी राहत मिलती थी।

पिता के बारे में पूछने पर खुशी गंभीर हो जाती है, कहती है पापा बचपन मे ही गुजर गए थे। मां किसी तरह मांग-कमाकर हमे पाल रही है। स्कूल में भी बहुद दिन से खाना नहीं मिल रहा है। बड़ी दिक्कतें हो रहीं हैं हम लोगों को। खुशी के साथ ही स्कूल जाने वाली उसकी छोटी बहन काजल भी खाने की दिक्कतों से दो-चार हो रही है।

यह भी पढ़ें : UP के फतेहपुर में लॉकडाउन ड्यूटी पर तैनात दरोगा-सिपाही समेत 3 की यमुना में डूबने से हुई मौत, लाशें बरामद

नौबस्ता के धरई का पुरवा में रहने वाले दिव्यांग शिवकुमार के दो बच्चे हैं, दोनों भारतीय विद्या पीठ यानी प्राथमिक विद्यालय में पढ़ते हैं। शिवकुमार कहते हैं 'मैं विकलांग हूँ, बच्चे स्कूल में जाते थे तो कम से कम जैसा भी हो एक आध टाइम खाना तो मिलता था। पेट तो भरता था। काम-धाम रोजी-रोटी तो है नहीं कुछ अभी। परिवार व बच्चों को खिलाना पालना बड़ी मुश्किल भरा है इस समय। सरकार को हमारे व हमारे बच्चों का भी कुछ ध्यान देना चाहिए था।'

के ही निवासी राजकुमार के दोनों बच्चे प्राथमिक विद्यालय में पढ़ने जाते थे। राजकुमार कहते हैं, इस समय बच्चों को स्कूलों में कोई खाना नहीं मिल रहा है। हम सब बेरोजगार हो चुके हैं। सरकारें तो भेजती हैं, पर यहां हमारे पास तक कुछ नहीं आ पाता। इतने दिनों में कोई एक रोटी तक देने नहीं आया है। बच्चे पेट दाबकर रह जाते हैं, क्या खाएं? कुछ बहुत इधर उधर से मांगकर लाते हैं जिससे गुजारा चल रहा है, जो नाकाफी है।

यह भी पढ़ें : पालघर लिंचिंग पर चिल्लाने वाले भाजपाई एटा में 5 ब्राह्मणों की हत्या पर ‘मौन’ हैं

र्रा नई बस्ती निवासी 3 बच्चों की मां शर्मिला यादव के तीनों बच्चे सरकारी स्कूल में ही पढ़ते हैं। स्कूल में मिलने वाला मिड-डे मील गरीबी में बच्चों को एक टाइम का खाना मिलने से बड़ी राहत मिलती थी। कभी-कभी खाने में कीड़े जरूर निकलते थे, पर गरीबों को तो बस पेट भरना है, जैसे भी भरे। इस समय तो जैसे-तैसे गुजारा चल रहा है। गरीबी में जिंदगी कट रही है। अगर इस काबिल होते तो क्यों यहां पढाते हैं, हालात ठीक होते तो किसी अच्छे प्राइवेट स्कूल में पढाते अपने बच्चों को।

मूलतः बिहार की रहने वाली रेखा देवी के 5 बच्चे हैं। पांचों बच्चे 10 कदम पर बने प्राथमिक विद्यालय में पढ़ते हैं। रेखा कहती हैं कि हम लोग मेहनत मजदूरी करके घर चलाते हैं। किराए पर रहते हैं, काम-धाम है नहीं, जो था चल नहीं रहा। स्कूल से जो खाना मिलता था उसमें बच्चों भर का तो चल ही जाता था। हमें सरकार से यह कहना है कि हमारे जैसों का भी ध्यान दिया जाए। कुछ न कुछ हम लोगों के बारे में भी ध्यान रखना चाहिए था।

LOCKDOWN: हरियाणा से उत्तर प्रदेश लाए गए 2224 मजदूर, घर जाने से पहले 14 दिन तक रहेंगे क्वारंटीन में

हीं बर्रा नई बस्ती निवासी शैलेश त्रिपाठी कहते हैं, लॉकडाउन की वजह से स्कूल बंद हो गए तो बच्चों को मिलने वाला मिड-डे मील भी बन्द कर दिया गया, जो बन्द नहीं होना चाहिए था। इन स्कूलों में उन्हीं वर्ग के बच्चे पढ़ने आते हैं जो आमतौर पर गरीब होते हैं। सरकार को चाहिए था कि कोई पर्यवेक्षक नियुक्त करके स्कूल के हाजिरी रजिस्टर में जो भी बच्चे दर्ज थे, उन्हें घर-घर चिन्हित करते हुए हफ्ते, महीने या दिन का जो भी नियमानुसार था भोजन भिजवाना चाहिए था, जिससे लॉकडाउन न टूटता और सोशल डिस्टेंस भी बरकरार रहती।

कानपुर नगर की पंचायत व पालिकाओं में आने वाले प्राथमिक विद्यालयों और उच्चतर प्राथमिक विद्यालयों में छात्रों की संख्या 2018-19 के अनुसार हजारों में है।

यह भी पढ़ें- भुखमरी और बेकारी की मार, भिवंडी से 1300 किलोमीटर दूर इलाहाबाद के लिए पैदल निकल पड़े मजदूर

प्राथमिक विद्यालय व छात्रों की संख्या

कानपुर के प्रेमनगर में 70 विद्यालयों में 6433 छात्र, शास्त्री नगर के 46 विद्यालयों में 3507 छात्र, नबाबगंज के 45 विद्यालयों में 4231 छात्र, सदर बाजार के 57 विद्यालयों में 4689 छात्र, हरजेंदर नगर के 36 विद्यालयों में 3922 छात्र, गोविंदनगर के 46 विद्यालयों में 5708 छात्र, नौबस्ता के 35 में 4574 छात्र, नगर पालिका घाटमपुर के 5 विद्यालयों में 828 छात्र, नगर पालिका बिल्हौर के 5 स्कूलों में 820, नगर पंचायत शिवराजपुर के 3 विद्यालयों में 345 छात्र, कल्याणपुर की नगर पालिका बिठूर के 5 विद्यालयों में 817 विद्यार्थी हैं। इसके अलावा भीतरगांव, पतारा, सरसौल, विधनू व ककवन में एक भी प्राथमिक विद्यालय नहीं है।

उच्चतर प्राथमिक विद्यालय व छात्रों की संख्या

प्रेमनगर के 38 उप्रवि मे 5926 छात्र, शास्त्री नगर के 21 में 2189 छात्र, नबाबगंज के 26 विद्यालयों में 2887 छात्र, सदर बाजार के 31 विद्यालयों में 4730, हरजेंदर नगर के 17 विद्यालयों में 2313 छात्र, गोविंदनगर के 30 में 3959, नौबस्ता के 13 में 874 छात्र, नगर पालिका घाटमपुर के 11 में 1653 छात्र, बिल्हौर के 8 में 2140, नगर पंचायत शिवराजपुर के 4 में 510, बिठूर के 3 में 717, भीतरगांव के 5 विद्यालयों में 395 छात्र, पतारा के 1 विद्यालय में 217, सरसौल के 2 में 209 छात्र, विधनू के 1 विद्यालय में 391 छात्र और ककवन के 1 विद्यालय में 337 छात्र पढ़ते हैं।

यह भी पढ़ें- मोदी के बाद योगी ने कर्मचारियों और पेंशनरों की जेब पर की चोट, महंगाई सहित 6 भत्तों पर लगा दी रोक

न सभी नगर पालिका और नगर पंचायत में आने वाले 353 प्राथमिक विद्यालय और 212 उच्चतर प्राथमिक विद्यालयों सहित 556 विद्यालयों में पढ़ने वाले छात्रों की संख्या क्रमशः 35874 व 29447 है, जिनकी कुल संख्या 65321 है।

तनी संख्या में भेजे जाने वाले छात्रों को मिड डे मील के नाम पर एक टाइम का भोजन किसी औषधि से कतई कम नहीं होता है। जो कैसा भी हो, पेट तो भरता है। इन स्कूलों में पढ़ने आने वाले छात्र गरीबी में जीने वाले परिवारों के होते हैं, जिनको किसी अच्छे प्राइवेट स्कूल में शिक्षा प्राप्त करना तो छोड़िए दो वक्त का अच्छा भोजन भी बमुश्किल मिल पाता है।

Next Story

विविध

Share it