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चुनावी पड़ताल 2019

कुन्डेश्वरी के बहाने अजय भट्ट के पराजय की पटकथा तो नहीं लिख रहे भाजपा के असंतुष्ट शिक्षा मंत्री!

Prema Negi
28 March 2019 1:37 PM GMT
कुन्डेश्वरी के बहाने अजय भट्ट के पराजय की पटकथा तो नहीं लिख रहे भाजपा के असंतुष्ट शिक्षा मंत्री!
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टायफायड होने की बात कह भाजपा प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट के नामांकन में शामिल न होने वाले शिक्षा मंत्री अरविंद पांडे नामांकन के ठीक अगले दिन खनन कारोबारियों की एक पुकार पर सीधे कुन्डेश्वरी पुलिस चौकी जा धमके....

सलीम मलिक की रिपोर्ट

जनज्वार। उत्तराखण्ड के शिक्षा मंत्री की मौजूदगी में पुलिस के दारोगा की पिटाई का मामला भाजपा के गले की हड्डी बनने लगा है। इसके साथ ही इस हमले को भाजपा की अंदरुनी राजनीति से भी जोड़कर देखा जाने लगा है। राज्य की त्रिवेंद्र सरकार इस पूरे प्रकरण को लेकर खुद ही खिन्न नजर आ रही है, तो विपक्ष ने इस मामले को जंगलराज बताते हुये इसे चुनावी मुद्दा बनाने का ऐलान कर भारतीय जनता पार्टी की मुसीबतों में इजाफा कर दिया है।

गौरतलब है कि दो दिन पूर्व 26 मार्च को काशीपुर कुन्डेश्वरी पुलिस चौकी में खनन कारोबार से जुड़े कारोबारियों ने शिक्षा मंत्री अरविन्द पाण्डे की मौजूदगी में पुलिस के दरोगा अर्जुनगिरी गोस्वामी की पिटाई कर दी थी। थानाध्यक्ष को अपने कार्यालय के पिछले हिस्से में बने कमरे में अपने आप को बंद करके जान बचानी पड़ी थी।

शिक्षा मंत्री की मौजूदगी में इस कारनामे से राज्य सरकार हिल गई थी, जबकि विपक्ष ने इसे जंगलराज की उपाधि दी थी। कहा यह भी जा रहा है कि पुलिस थानाध्यक्ष को पीटने वालों में खनन माफिया थे, जोकि अरविंद पांडे के साथ थाने पहुंचे थे और उन्हीं की शह पर उन्होंने पुलिसकर्मी को मारा था।

वैसे भी पहली नजर में यह मामला खनन कारोबार में अवैध खनन से जुड़ा नजर आ रहा है, लेकिन लोकसभा चुनाव की सरगर्मियों के बीच में इस प्रकरण में राजनीति की सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता। राजनीतिक हल्कों में भी इसे अब ‘कहीं पर निगाहें, कहीं पर निशाना’ वाली कवायद बताया जा रहा है। कुन्डेश्वरी कांड के बाद जिस प्रकार के बयान सामने आने लगे हैं, उससे भी यह मामला और से जुड़ने की चर्चा चल पड़ी है।

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फ्लैशबैक में जाकर देंखे तो लोकसभा चुनाव से पूर्व ही जब मौजूदा सांसद भगत सिंह कोश्यारी ने अपने दुबारा चुनाव न लड़ने की घोषणा की थी तो पार्टी में कई चेहरे ऐसे थे जो 2019 का सांसद चुनाव लड़ना चाह रहे थे। इनमें अनिल बलूनी, गजराज बिष्ट, बंशीधर भगत, पुष्कर सिंह धामी, बलराज पासी जैसे नाम शुमार थे।

बदले दौर में अनिल बलूनी राज्यसभा से सांसद बना दिये गये तो गजराज बिष्ट को भी मण्डी समिति का चेयरमैन जैसा भारी-भरकम प्रोफाइल दे दी गई। बंशीधर भगत व पुष्कर धामी पहले से ही विधायक थे। रहे पांचवे दावेदार बलराज पासी, तो राज्य सरकार ने उन्हें भी दायित्व का लॉलीपाप देकर खुश करने की कोशिश की, लेकिन पूर्व सांसद का प्रोफाईल रखने वाले बलराज इस दायित्व से खुश नहीं थे, जिसके चलते उन्होंने अभी तक इस दायित्व का कार्यभार तक ग्रहण नहीं किया है।

वैसे तो राजनीति की बिसात पर बलराज पासी एक मामूली मोहरे से अधिक कुछ नहीं थे, लेकिन 1991 की राम लहर पर सवार होकर पहली बार लोकसभा के चुनाव में उतरे पासी ने राजनीति के माहिर दिग्गज खिलाड़ी कांग्रेस के वरिष्ठ नेता नारायणदत्त तिवारी को पराजित कर अपने कद में ‘सूक्ष्म से विराट’ की बढ़ोतरी कर ली थी।

इसी कद के कारण पासी इस लोकसभा चुनाव में भी अन्तिम समय तक भाजपा से लोकसभा टिकट के दावेदार बने हुये थे, लेकिन पार्टी ने उन पर भरोसा न करते हुये अपने प्रदेश अध्यक्ष व पिछला विधानसभा चुनाव रानीखेत से हारे हुये अजय भट्ट को अपना लोकसभा प्रत्याशी बनाकर चुनावी समर में उतार दिया था।

भट्ट को प्रत्याशी बनाये जाने से आहत पासी व अपने को नजरअंदाज किये जाने के कारण प्रदेश के शिक्षा मंत्री अरविन्द पांडे पार्टी के इस फैसले से नाखुश बताये जाते हैं। तराई के इन नेताओं का मानना था कि रानीखेत मूल के अजय भट्ट का इस इलाके से कोई सीधा लेना-देना न होने के बाद भी उन्हें यहां से पार्टी का टिकट देना तराई की अनदेखी करना है।

हालांकि दोनों नेताओं ने सार्वजनिक मंच से कोई विरोध नहीं किया, लेकिन पासी व अरविन्द का प्रत्याशी घोषित होने के बाद पार्टी के किसी भी कार्यक्रम में शामिल न होने के कारण आसानी से उनके भी ‘मन की बात’ सुनी जा सकती है।

इतना ही नहीं शिक्षा मंत्री अरविन्द पांडे तो पार्टी प्रत्याशी अजय भट्ट के नामांकन तक में नहीं गये और इसकी वजह उन्होंने खुद को ‘टायफायड’ होना बताया था। वैसे यह बात दीगर है कि ‘टायफायड’ होने के कारण नामांकन में शामिल न होने वाले शिक्षा मंत्री इसके ठीक अगले दिन खनन कारोबारियों की एक पुकार पर सीधे कुन्डेश्वरी पुलिस चौकी जा धमके।

टिकट वितरण के बाद से ही पासी खेमे की एक-एक हरकत पर गहरी नजरें गड़ाये पार्टी आलाकमान को इन प्रकरणों के आलोक में मामला समझते देर नहीं लगी, जिसके चलते राज्य सरकार ने कुन्डेश्वरी कांड में दोषियों के खिलाफ सख्त कार्यवाही के निर्देश देने में देर नहीं लगाई। बहरहाल मुकदमा दर्ज होने के बाद शिक्षा मंत्री ने जिस प्रकार से अपनी सफाई दी है उससे पार्टी नेतृत्व संतुष्ट नहीं दिख रहा है।

दूसरा टिकट वितरण के बाद से ही कोपभवन में चल रहे पासी ने भी कुन्डेश्वरी कांड के तत्काल बाद जिस प्रकार से प्रेस के सामने नमूदार होकर पार्टी प्रत्याशी अजय भट्ट को विजयी बनाने का इरादा जाहिर किया है, उसको राजनीतिक हलकों में अनुशासन के कोप से बचने से अलग नहीं समझा जा रहा है।

हालांकि आज 28 मार्च को पासी खेमे ने रुद्रपुर में आयोजित प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की रैली में शामिल होकर एकजुटता का संदेश देने की कोशिश की है, लेकिन यह कोशिश कितनी परवान चढ़ेगी यह आसानी से समझा जा सकता है, खासतौर पर तब जबकि विपक्ष कुन्डेश्वरी कांड को ‘जंगलराज’ कहकर इसका राजनीतिक लाभ लेने का प्रयास कर रहा हो।

कुल मिलाकर कुन्डेश्वरी कांड की गूंज भले ही दरोगा के हमलावरों पर मुकदमा दर्ज करने से भले ही कुछ शांत दिख रही हो, लेकिन लोकसभा चुनाव के बाद इस प्याले से तूफान निकलना तय है।

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