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हाईकोर्ट हर मामले में दरोगा नहीं बन सकता

Janjwar Team
27 Aug 2017 11:03 PM GMT
हाईकोर्ट हर मामले में दरोगा नहीं बन सकता
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राम रहीम के मामले से जुड़ी वह 10 बातें जिसने आम आदमी को झकझोर के रख दिया

सत्ता प्रतिष्ठानों को कानून सम्मत पुलिस व्यवस्था नहीं चाहिए। उन्हें अंग्रेजों के जमाने के ऐसे क़ानून चाहिये जिन्हें तोड़-मरोड़कर किसी को भी बंद किया जा सके और किसी को भी छोड़ा जा सके...

वीएन राय, पूर्व आईपीएस

राम रहीम को अदालत ने अपने डेरे में अपनी ही अनुयायी के साथ बलात्कार के मामले में 15 वर्ष बाद दोषी करार दे दिया है। उसके सिरसा डेरे में और पंचकुला अदालत के बाहर एकत्रित होने दिए गये अनुयायियों की भारी भीड़ ने जमकर हिंसा और आगजनी की।

निष्क्रिय खट्टर शासन को चेतावनी के क्रम में उच्च न्यायालय ने डीजीपी को हटाने से लेकर सरकार की राम रहीम से राजनीतिक मिलीभगत होने जैसी टिप्पणियाँ भी कीं। पुलिस कार्यवाही में 36 लोगों की मृत्यु हो चुकी है।

राम रहीम के प्रेमी (अनुयायी) बेशक उसे अपनी नजरों से न गिराएं, पर उसके विरूद्ध एक आक्रामक राष्ट्रीय माहौल बन गया है। इसमें सुविधानुसार हीरो और विलेन गढ़े जा रहे हैं। जहाँ यह माहौल एक वृहत्तर त्रासदी का बैरोमीटर है, वहीं इसमें निहित गूढ़ आयाम भी समझे जाने चाहिए। आइये देखें, एक सामान्य नागरिक के लिए इस अराजक त्रासदी के दस निहितार्थ क्या हैं?

1— अदालत के पास भरपूर अवसर है कि निर्भया कांड के बाद वर्मा कमीशन के संशोधित बलात्कार कानून के मुताबिक राम रहीम को आजीवन कारावास का कठोरतम दंड दे। न केवल इस मामले में जघन्य सीरियल बलात्कार हुआ है, बल्कि कहीं अधिक गंभीर है कि आरोपी का पीड़ित से गुरु-शिष्य का रिश्ता, एक अधिकारपूर्ण सम्बन्ध था जिसका उसने दुरुपयोग किया।

2— दंड संहिता प्रक्रिया की धारा 144 को लेकर भ्रम में नहीं रहना चाहिए। यह ठीक है कि इसे लगाने में देरी शासन-प्रशासन की आरोपी से मिलीभगत का सूचक है, लेकिन यह धारा अपने आप में कोई रामबाण नहीं हो सकती थी, जब तक पुलिस की नीयत प्रेमी गिरोह के इरादों को कुचलने की नहीं होती।

3— हिंसा की नीयत और तैयारी के साथ आने वाले प्रेमियों को रोकने और गिरफ्तार करने की कानूनन शक्ति वैसे भी पुलिस के पास है, बेशक धारा 144 न भी घोषित हो।

4— रामपाल प्रसंग के अनुभव, प्रेमी गिरोह की तैयारियों और उपलब्ध सूचना के आधार पर पुलिस का सहज निष्कर्ष यही हो सकता था कि गुरु के दोषी करार दिए जाने की सूरत में प्रेमी गिरोहों की ओर से नियोजित हिंसा की जायेगी। यद्यपि फैसला सुरक्षित था, लेकिन मुकदमे पर नजर रखने वाले जानते थे कि संभावना दोष सिद्ध होने की पूरी है।

5— प्रेमी गिरोह ने बजाय पंचकुला के सिरसा में ही मोर्चा खोलने के विकल्प पर भी विचार किया था। उस हालत में राम रहीम सैकड़ों गाड़ियों के काफिले में पंचकुला जाने के बजाय डेरे में ही बना रहता। हजारों प्रेमी वहां डेरे में तैयारी के साथ पुलिस का मुकाबला करने पहुँच चुके थे। यहाँ तक कि प्रेमियों के सैकड़ों स्कूली बच्चों को डेरा स्कूलों के हॉस्टल में मानव कवच के रूप में रखा हुआ था। यदि ऐसा होता तो न जाने कितनी जानें जातीं।

6— राम रहीम का ‘धन धन सतगुरु’ एक सोशल क्लब के रूप में काम कर रहा था। पुराने वृहत्तर ग्रामीण पंजाब (आज के पंजाब, हरियाणा, हिमाचल) में धर्म स्थल और राजनीतिक वर्चस्व का एकाधिकार प्रभावी जातियों के पास रहा है। लिहाजा पिछड़ों का झुकाव ऐसे डेरों के प्रति हो जाता है। इनमें युवाओं के प्रेम संबंधों को लेकर अधिक उदारता है और शराब, अफीम जैसे नशे के विरुद्ध पूरी कट्टरता। डेरा मुख्यालय ही नहीं, प्रेमियों के जगह-जगह मिलन ठिकानों का भी समूचे परिवारों के लिए एक आकर्षण साप्ताहिक पिकनिक केंद्र होने का भी है।

7— ग्रामीण परिवेश के एक प्रेमी को यदि थाना-तहसील से काम पड़ जाए, सरकारी सामाजिक योजनाओं का फायदा चाहिए तो उसे किसी रसूखदार से फोन करवाना जरूरी हो जाता है। विधायक और उच्च वर्ग उसकी पहुँच से बाहर हो गया है। राम रहीम की राजनीतिक पहुँच उसके काम आ जाती है। आरक्षण हिंसा के बाद मैंने एक नागरिक कमीशन के रूप में प्रभावित क्षेत्रों का दौरा करने पर पाया कि प्रेमियों को सरकारी हर्जाना राम रहीम के फोन पर अपेक्षाकृत जल्दी मिल गया था।

8— राजनीतिकों के लिए राम रहीम एक चतुर वोट बैंक बना हुआ था। पहले कांग्रेस और इनेलो के लिए और अब भाजपा के लिए। उसका फैसला भाजपा के लिए बड़ी आपदा से कम नहीं। जहाँ तक हो सका पार्टी और सरकार ने इसके ‘बुरे’ प्रभाव से आँख मूंदने की कोशिश की। उच्च न्यायालय के सीधे दखल से वे अंततः बेनकाब हो गए। राजनीतिकों का काला धन भी ऐसे धार्मिक संस्थानों में ‘पार्क’ होना आम है।

9— कोई भी आपराधिक मुक़दमा, विशेषकर जिसमें बेहद पहुँच और पैसे वाले लोग आरोपी हों, मुख्यतः सही विवेचना, अभियोजन और मजबूत पैरोकारों के दम पर ही कामयाब होता है। राम रहीम की सजा भी इसी समीकरण से संभव हुयी। कुछ माह पूर्व मुझे इस मोर्चे पर डटे चंद पैरोकारों से मिलने का अवसर मिला था और वे विवेचना और अभियोजन पक्ष के प्रति आश्वस्त ही नहीं कृतज्ञ भी थे।

10— अंत में हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि उच्च न्यायालय हर मामले में दरोगा की भूमिका नहीं निभा सकता। मैं अपने अनुभव से यह भी कह सकता हूँ कि यदि पुलिस को ही अपने ढंग से स्थिति से निपटने दिया जाता तो आगजनी ज्यादा होती लेकिन मौतें कम। राम रहीम को अदालत से हेलिकॉप्टर में ले जाने से सैकड़ों मौतों को टाला जा सका।

क्या हम साक्षात् नहीं देख पा रहे कि देश के सत्ता प्रतिष्ठानों को कानून सम्मत पुलिस व्यवस्था नहीं चाहिए। उन्हें अंग्रेजों के जमाने के ऐसे क़ानून चाहिये जिन्हें तोड़-मरोड़कर किसी को भी बंद किया जा सके और किसी को भी छोड़ा जा सके।

इसके लिए उन्हें स्वामिभक्त पुलिस चाहिए। दुनिया का अनुभव बताता है कि एक नागरिक संवेदी पुलिस ही जवाबदेही के लोकतान्त्रिक मानदंडों पर खरी उतर सकती है। तब तक अन्य सारी बातें दिखावा ही रहेंगी।

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