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बिहार में बालू के टीले पर यूपी के किसानों ने उगाया सोना ,लॉक डाउन ने रोने को कर दिया मजबूर

Nirmal kant
21 May 2020 8:46 AM GMT
बिहार में बालू के टीले पर यूपी के किसानों ने उगाया सोना ,लॉक डाउन ने रोने को कर दिया मजबूर
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बिहार के कोसी क्षेत्र में बालू के टीले पर लगाए गये हजारों एकड़ में तरबूज की फसल आज बर्बाद हो रही है। किसान मजबूरी में ऐसे ही तरबूज को खेत में ही सड़ने छोड़ रहा है चूँकि उनके खरीददार आज उन तक नही पहुँच पा रहे है...

सहरसा के तरबूज किसानों के बीच से प्रशांत कुमार की रिपोर्ट

जनज्वार ब्यूरो। कोरोना संकट के बाद लागू किये गये लॉकडाउन में देश के व्यापारी और किसान परेशान हो गये है। बिहार में बालू के टीले पर जहाँ पिछले 60 वर्षों में कोई खेती संभव नहीं हो पायी वहां यूपी के किसानों ने तरबूज रूपी सोना उगाया है लेकिन वो आज रोने को मजबूर हैं। तरबूज की खेती करने वाले किसान और व्यापारी बुरी तरह से फंस चुके हैं। औने पौने दाम में भी बेचने के लिए उन्हें न बाजार मिल रहा है, न खरीदने वाला लोग। बिहार के कोसी क्षेत्र में बालू के टीले पर लगाए गये हजारों एकड़ में तरबूज की फसल आज बर्बाद हो रही है। किसान मजबूरी में ऐसे ही तरबूज को खेत में ही सड़ने छोड़ रहा है चूँकि उनके खरीददार आज उन तक नही पहुँच पा रहे है।

कोसी प्रमंडल के सहरसा जिले के नवहट्टा प्रखण्ड में हजारों एकड़ में तरबूज की खेती पिछले चार पञ्च वर्षों में बड़े पैमाने पर होती है। किसानों के द्वारा तरबूज की खेती ऐसे बंजर जमीन पर किया जा रहा है जहाँ किसी भी तरह का फसल उत्पादन नही हो सकता है। सहरसा में कोसी तटबंध के भीतर करीब दो किलोमीटर चौराई वाले बालू के टीले पर तरबूज रूपी सोना उगाया जा रहा है।

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क्षेत्र के अनुभवी बुजुर्ग बताते हैं कि पिछले साठ वर्षों में इस बालू के टीले पर किसी भी अनाज के रूप में एक दाना का उत्पादन भी संभव नही हो पाया है लेकिन यूपी के किसानों के द्वारा जब इस बलुआई जमीन पर तरबूज का सफल प्रयोग किया तो लोगों में आशा जगी लेकिन अभी लागत कीमत का आधा भी उपर नही हो पा रहा है।

यूपी से आये ये किसान कोसी बाँध पर खेती कर रहे है। ये जमीन बालू का टीला है चूँकि यहाँ हर वर्ष बाढ़ आती है और बालू छोड़ जाती है जिसे सरकार कुछ नही कर पाती है। 2008 में आये कुसहा त्रासदी के बाद इस क्षेत्र के लोगों के लिए सरकार कुछ बेहतर नही कर पाई। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भले ही दावा किया था कि बाढ़ के बाद बेहतर कोसी का निर्माण किया जायेगा लेकिन अब तक स्थिति नही बदली।

सरकार कोसी नदी के गाद को साफ नही करा पाई जिससे हर वर्ष किसानों के खेत में बालू का टीला बन जाता है। लेकिन उसी बालू के टीले पर जब किसानों द्वारा सोना उगाया गया तो उसे भी आज रोना पर रहा है।सरकार द्वारा इन्हें किसी भी तरीके का सहयोग नही मिल पाया।लॉकडाउन में खेत तक गाड़ी नही पहुँच पाई जिससे इनके तरबूज बाहर नही जा सके।कुछ गाड़ी वाले आना भी चाहे तो पुलिस उन्हें परेशान करती रही।

यूपी से आये किसान राघवेन्द्र बताते है कि एक एकड़ में तरबूज से एक लाख तक का मुनाफ़ा हो जाता था।इससे पूर्व खेत पर ही बड़े बड़े व्यापारी पन्द्रह से सत्रह रूपये किलोग्राम के हिसाब से टन का टन तरबूज ले जाते थे लेकिन आज चार से पांच रूपये किलो भी नही बिक रहा है।किसान बताते है कि एक ट्रक में करीब दस टन तरबूज लोड हो पाता है अभी तो बाहर से गाड़ी भी नही आ पाती है ।कुछ गाडी आना भी चाहे तो पुलिस उसे परेशान करती है।

यूपी से सुदूर बिहार के कोसी में तरबूज के खेती को आने के सवाल पर किसान कहते है कि इससे पूर्व वो यहाँ साइकिल पर कपड़े लादकर घूम घूम कर कपड़ा बेचा करते थे लेकिन इसी दौरान उसे इस बालू के टीले को देख यूपी में बलुआही जमीन पर तरबूज की खेती की याद आई ।फिर फेरीवालों ने प्रयोग के तौर पर यहाँ कुछ जगहों पर तरबूज लगाया जिसका बहुत अच्छा परिणाम देखने को मिला फिर ये लोग अपने गाँव से और भी लोगों को यहाँ बुलाकार ले आये और बड़े पैमाने पर इसकी खेती करने लगे ।

खेती शुरू होने के बाद इन लोगों को यहाँ से अच्छा मुनाफ़ा भी होने लगा लेकिन इस वर्ष कोरोना संकट के कारण लगे लॉक डाउन के कारण इनके तरबूज को न बाजार मिल रहा है न बाहर वाले व्यापारी न खरीदार।अब इन किसानों को बड़ा समस्या है कि वो कैसे इतने तरबूज को निपटाए ।किसान बताते है कि इस बार लागत भी उपर नही हो पा रहा है। खेत में तरबूज यूँ ही सड़ रहा है बाकी तो बर्बाद हो चुका।

त्तरप्रदेश के बागपत से आये किसान मुनव्वर बताते है कि वो दस रूपये सैकड़ा ब्याज पर रुपया लेकर आया था और खेती किया है लेकिन इस बार उसे घर बेचकर सेठ को रुपया देना परेगा ।उन्होंने कहा बेटी है सोचा था इस बार के आमदनी से सेठ का रुपया लौटा उसकी शादी करा दूंगा ।कहा अभी अब इस बार तो तरबूज का फसल बर्बाद हो गया।घर से घाटा लगा है।जमीन मालिक को भी पैसा देना है।

किसान इस बलुआही जमीन पर न केवल तरबूज बल्कि कद्दू ,खीरा ,करेला आदि भी उगाये है जो आज बिक्री के आभाव में खेत में ही सड़ रहा है। किसान बताते है कि चूँकि ये क्षेत्र लोगों के बस्ती से अलग है तो यहाँ लोगों का अनाआना जाना भी नही है इस कारण हमलोग फ्री में भी किसी को नही दे पा रहे है।जो कुछ लोग खेत तक पहुँच रहे है उसे तो ऐसे ही दे दे रहा हूँ लेकिन फिर भी बहुत तरबूज ,खीर आदि खेत में ही बर्बाद हो रहा है।

सी तरह कोसी प्रमंडल के मधेपुरा जिलान्तर्गत पुरैनी में करीब पचास एकड़ में तरबूज की खेती हो रही है ।यहाँ भी किसान लॉक डाउन के कारण रो रहे है।इन्हें भी न तो बाजार मिल रहा है न खरीददार ।आसपास के छोटे व्यापारी कम मात्रा में तरबूज ले जा रहे है लेकिन उसका कीमत उसे औने पौने में मिल पाता है जिससे उनकी जिन्दगी बदहाल हो चुकी है।यहाँ के किसान भी बताते है कि कुछ् लोग ब्याज और कुछ लोग कर्ज लेकर तरबूज की खेती किये थे।

के किसान पिछले वर्ष 2300 रूपये एकड़ लेकिन इस बार किसानों ने 6900 रूपये एकड़ खेत लिया है।अब किसानों के सामने बड़ी समस्या है कि वो कहाँ से जमीन मालिक को पैसे दे।जमीन मालिक बीएन सहनी बताते है कि सोमवार को ही किसान सब अपना बिस्तर आदि यहाँ पहुंचा दिया है।उनलोगों को लाखों का घाटा हुआ है तो सरकार तो कुछ नही की है लेकिन हमलोग उनको जमीन में उनको रियायत देंगे।उनलोगों के लाभ के हिसाब से ही पैसे लेंगे किसी से भी तय हुए कीमत नही लेंगे।

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मीन मालिक बी एन सहनी बताते है कि केवल सहरसा के नवहट्टा की अगर बात करे तो सभी किसानों को करीब पचास लाख का घाटा हुआ है।सभी यूपी के बागपत ,सहारनपुर आदि से ब्याज पर पैसे लेकर यहाँ खेती करने आये थे।हलांकि बीएन सहनी कहते है उनलोगों के साथ कोई जोड़ जबरदस्ती नही है वो लोग जब तक चाहे यहाँ रह सकते है हमलोग उसकों सहयोग करेंगे।जमीन का किराया पर भी अधिकतम छुट की बात को लेकर वो सबके साथ बैठक की बात करते है।

दूसरे राज्य से किसान आकर बिहार के बंजर भूमि पर इतनी अच्छी खेती कर ले रहे है तो निश्चित ही सरकार को इस ओर ध्यान देना चाहिए ।सरकार और स्थानीय जिला प्रशासन अगर इस लॉक डाउन में इन किसानों पर थोड़ी भी ध्यान दिए होते तो किसानों को आज इस हाल में नही आना पड़ता ।यूपी के किसानों द्वरा जो तरबूज रूपी सोना बंजर भूमि पर उगाया गया निश्चित ही ऐसे कार्यों के लिए सरकार को इसे प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है।

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