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डाॅक्टर दंपती 20 सालों से बेसहारा महिलाओं की कर रहा देखभाल, पत्नी ने सेवा के लिए छोड़ दी नौकरी

Janjwar Desk
24 July 2020 11:38 AM GMT
डाॅक्टर दंपती 20 सालों से बेसहारा महिलाओं की कर रहा देखभाल, पत्नी ने सेवा के लिए छोड़ दी नौकरी

एक विदेशी मेहमान के साथ धामणे दंपती।

महाराष्ट्र के अहमदनगर के डाॅ राजेंद्र धामणे और उनकी पत्नी डाॅ सुचेता धामणे ने पढाई के दिनों में ही लोगों की सेवा का संकल्प लिया था। डाॅ राजेंद्र धामणे के पिता ने सहर्ष अपनी जमीन आश्रय गृह बनाने के लिए दे दी थी। अब इनका एमबीबीएस कर रहा बेटा भी इस काम में हाथ बंटाता है...

जनज्वार। बेसहारों की सेवा को अपने जीवन का लक्ष्य बना लेने वाले लोग कम ही होते हैं। ऐसा ही एक डाॅक्टर दंपती महाराष्ट्र के नासिक के निकट के संगले गांव का है। पति डाॅ राजेंद्र धामणे और पत्नी डाॅ सुचेता धामणे - दोनों डाॅक्टर, साथ पढाई की और काॅलेज के दिनों में दोनों ने यह सोच लिया था कि वे लोगों की भलाई के लिए काम करेंगे।

मेडिकल काॅलेज से निकलने के बाद डाॅ राजेंद्र धामणे ने किसी महानगर के बजाय अपने गांव के पास ही क्लिनिक खोल कर प्राइक्टिस करने का निर्णय लिया तो डाॅ सुचेता एक मेडिकल काॅलेज में पढाने लगीं। यह दंपती शिरडी-अहमदनगर हाइवे पर आते-जाते रोज फुटपाथ पर बेसहारा महिलाओं को देखा था जो भीख मांग रही होती थीं या फिर सो रही होतीं।

उस हाइवे पर बहुत सारे लोग अपने परिवार की ऐसी महिलाओं को छोड़ जाते थे जिनकी मानसिक स्थिति अच्छी नहीं होती। इस दंपती ने कई बार कई महिलाओं से बात करने की कोशिश की लेकिन कोई जानकारी नहीं मिली।

एक दिन दोनों अपने काम पर जा रहे थे तो इन्होंने एक महिला को कूड़े की ढेर पर बैठे देखा, पास जाकर देखा तो पता चला कि वह मल खा रही थी। यह देख उनका मन अंदर से व्यथित हो गया। उन्होंने उस महिला को तुरंत वहां से हटाया और संभाला और अपना खाना खाने को दिया। राजेंद्र के अनुसार, इस घटना ने उन्हें अंदर तक हिला दिया और उसके बाद उन्होंने ठान लिया कि वह इन महिलाओं को अनेदखा नहीं करेंगे।

इसके बाद इस दंपती ने हाइवे पर बेसहारा महिलाओं को खाना बांटने का काम शुरू किया। डाॅ सुचेता खुद खाना बनातीं, पैक करतीं और अपनी ड्यूटी पर जाने के दौरान उसे बेसहारा महिलाओं को बांटती थीं। यह क्रम कई साल तक चला। वे दोनों उन महिलाओं से बात कर घर-परिवार के बारे में मालूम करने की कोशिश करते, लेकिन मानसिक रूप से ज्यादातर के अस्वस्थ होने से उन्हें कोई जानकारी नहीं मिलती।


एक बार इन्हें एक 25 साल की लड़की मिली, जिसे परिवार वालों ने इसलिए छोड़ दिया था क्योंकि उसकी दिमागी हालत अच्छी नहीं थी। वह लड़की लोगों की नजरों से बचने के लिए डिवाइडर के बीच में सोती थी, इस घटना ने उन्हें फिर झकझोर दिया और ठान लिया कि अब कुछ एसा करना है जिनसे उन्हें सुरक्षित जानकारी मिले।

इसके बाद धामणे दंपती ने बेसहारा महिलाओं के लिए शेल्टर होम बनवाने की ठानी और उनके रिटायर्ड शिक्षक माता-पिता ने इस काम में मदद की। पिता ने सहर्ष शेल्टर होम बनवाने के लिए जमीन दे दी और 2007 में निर्माण कार्य पूरा हो गया। उन्होंने उसका नाम माऊली सेवा प्रतिष्ठान रखा, क्योंकि मराठी में माऊली का मतलब मां होता है।

इसके बाद वे सबसे पहले एक ऐसी महिला को शेल्टर होम लाने पहुंची जिन्हें वे अक्सर खाना देते थे, लेकिन उस महिला ने यह कह कर मना कर दिया कि वह वहां चली जाएगी तो अपनी भाई को कैसे ढूंढेगी, दरअसल उस महिला के भाई ने उसे उस जगह पर सालों पहले यह कह कर छोड़ दिया था कि वह थोड़ी देर में आता है। तब से वह वहीं अपने भाई का इंतजार कर रही थी। वह महिला तुरंत तो नहीं आयी लेकिन बाद में वे शेल्टर होम लायी गईं। इसके बाद उनके शेल्टर होम में और महिलाएं आने लगीं।

शेल्टर होम शुरू होने पर इस दंपती के लिए महिलाओं के मानसिक रूप से अस्वस्थ होने से देखभाल करना भी मुश्किल हुआ। खाना खिलाने से दवाइयां देने तक में बहुत मेहनत करनी होती। डाॅ सुचेता खुद खाना बनातीं। लेकिन, बाद में स्थिति बदली, कई महिलाएं ठीक हो गईं और वे कामकाज में हाथ बंटाने लगीं।

शेल्टर होम में रह रही कई महिलाएं यौन उत्पीड़न की शिकार हुईं और इस वजह से गर्भवती हो गईं तो कई को परिवार ने ही छोड़ दिया, कुछ ससुराल वालों के अत्याचार से परेशान होकर सड़क पर आ गईं। उन सभी की ये बेहतर देखभाल करते हैं। जो बुजुर्ग महिलाएं मृत हो जाती हैं, उनका अंतिम संस्कार भी पूरे सम्मान के साथ किया जाता है। जिन महिलाओं के बच्चे हैं उनकी शिक्षा का पूरा खर्च माऊली सेवा प्रतिष्ठान उठाता है। उन्हें घर जैसा वातावरण दिया जाता है ताकि वे खुद को बेसहारा नहीं समझें।

इन लोगों ने अहमदनगर के बाद मनगांव में भी एक शेल्टर होम बनवाया है, क्योंकि यहां जगह छोटी पड़ने लगी थी। डाॅ सुचेता को अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिला था जिसमें एक लाख डाॅलर का पुरस्कार भी शामिल था, उस पैसे को भी उन्होंने शेल्टर होम में लगा दिया। हालांकि सरकार की ओर से अबतक कोई मदद नहीं मिली है। डाॅक्टर दंपती इसकी एक वजह यह बताते हैं कि सड़क पर की महिलाओं के पास कोई पहचान पत्र नहीं होता, शायद इस वजह से उन्हें सरकारी सहायता नहीं मिली है। ऐसे में सबको पहचान देने के लिए आधार कार्ड बनाने की शुरुआत की गई।

महिलाओं को विभिन्न प्रकार के कामकाज का भी प्रशिक्षण दिया जाने लगा है, जैसे अगरबत्ती बनाना, गौपालन, खेती, रसोई आदि। डाॅ राजेंद्र अपनी क्लिनिक चलाते हैं और उससे होने वाली कमाई को भी शेल्टर होम में खर्च करते हैं। उनका एक बेटा भी शेल्टर होम के काम में सहयोग करता है और वह अभी एमबीबीएस कर रहा है। इन्हें इस अच्छे काम में कई लोगों ने आर्थिक सहयोग भी किया है। उन्होंने मिलाप के जरिए फंड रेज का भी काम शुरू किया है।

https://hindi.thebetterindia.com/ से साभार, मूल स्टोरी पढने के लिए लिंक को क्लिक करें।

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