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विमर्श

मोदी सरकार का किसान बिल : किसान को कॉरपोरेट का गुलाम बनाकर मजदूर बनाने की सम्पूर्ण तैयारी

Janjwar Desk
26 Sep 2020 7:13 AM GMT
मोदी सरकार का किसान बिल : किसान को कॉरपोरेट का गुलाम बनाकर मजदूर बनाने की सम्पूर्ण तैयारी
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देश भर में किसान मोदी सरकार के तीन नए बिलों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। मोदी सरकार सफाई दे रही है कि मुक्त बाजार के लिए कृषि नियंत्रित क्षेत्र को मजबूती से खोला जाएगा...

दिनकर कुमार का विश्लेषण

जन्जवार । संसद की सीढ़ियों पर मस्तक झुकाकर प्रवेश करने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने छह सालों के अपने कार्यकाल में संसद की प्रासंगिकता को ही समाप्त कर दिया है। जिस समय कोविड-19 महामारी के आतंक को सुनियोजित रूप से देश पर थोप कर आम जनता को गृहबंदी की तरह जीने के लिए विवश कर दिया गया है, उसी समय आम जनता का दमन करने के लिए मोदी सरकार एक के बाद एक जनविरोधी विधेयकों को संसद में बहस या चर्चा के बगैर पारित कर रही है और इसके लिए संविधान के प्रावधानों को भी कुचलते हुए अपने पूंजीपति आकाओं के सपनों को साकार कर रही है। दमनकारी विधेयकों की शृंखला में तीन किसान विधेयक भी शामिल हैं, जिनकी वजह से किसानों के सामने कारपोरेट का गुलाम बनने का खतरा उत्पन्न हो गया है।

देश भर में किसान मोदी सरकार के तीन नए बिलों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। मोदी सरकार सफाई दे रही है कि मुक्त बाजार के लिए कृषि नियंत्रित क्षेत्र को मजबूती से खोला जाएगा। सरकार की राय में संसद द्वारा पारित किसान बिल किसानों को अपनी उपज सीधे निजी खरीदारों को बेचना और निजी कंपनियों के साथ अनुबंध करना आसान बनाता है। सरकार को उम्मीद है कि निजी क्षेत्र के निवेश आर्थिक वृद्धि को प्रोत्साहित करेंगे।

प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की कृषि सुधार नीति के रूप में यह कानून व्यापारियों को खाद्य पदार्थों को स्टॉक करने की भी अनुमति देगा। अब तक लाभ कमाने के उद्देश्य से खाद्य पदार्थों की जमाखोरी भारत में एक आपराधिक अपराध था।

मुख्य विपक्षी कांग्रेस पार्टी ने बिलों को "काला कानून" और "कॉर्पोरेट समर्थक" कहा है। इसके शीर्ष नेता राहुल गांधी ने मोदी पर "किसानों को पूँजीपतियों का गुलाम बनाने" का आरोप लगाया है।

लेकिन मोदी अपने इस कदम का बचाव कर रहे हैं। "दशकों से भारतीय किसान विभिन्न बाधाओं से घिरा था और बिचौलियों द्वारा तंग किया गया था। संसद द्वारा पारित बिल किसानों को ऐसी विपत्तियों से मुक्त करते हैं, "उन्होंने एक ट्विटर पोस्ट में कहा।

1964 में पारित कृषि उत्पाद विपणन समिति (एपीएमसी) अधिनियम के तहत किसानों के लिए सरकारी-विनियमित बाजारों या मंडियों में अपनी उपज बेचना अनिवार्य था, जहां बिचौलिए उत्पादकों को राज्य-संचालित कंपनी या निजी कंपनियों को फसल बेचने में मदद कर सकते थे।

सरकार का कहना है कि एपीएमसी मंडियों का एकाधिकार समाप्त हो जाएगा, लेकिन वे बंद नहीं होंगे और न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) - जिस कीमत पर सरकार कृषि उपज खरीदती है - वह खत्म नहीं होगा।

नए कानून किसानों को देश में कहीं भी अपनी उपज बेचने के लिए अतिरिक्त विकल्प देते हैं, पहले की स्थिति के विपरीत जहां अंतर-राज्य व्यापार की अनुमति नहीं थी। राज्य सरकारें, जो मंडियों में लेन-देन के माध्यम से आय अर्जित करती रही हैं, कर राजस्व से वंचित होगी क्योंकि व्यापार राज्य के बाहर या निजी सौदों के क्षेत्र में चला जाएगा।

कृषि आय दोगुनी करने के वादे पर चुनाव जीतने वाले मोदी पर कृषि क्षेत्र में निजी निवेश लाने का दबाव है, जो बुरी तरह से ठप हो गया है। दशकों तक किसान फसल की असफलताओं और अपनी उपज के लिए प्रतिस्पर्धी कीमतों को सुरक्षित रखने में असमर्थता के चलते खुद को कर्ज में डूबा पाया है। हालात का सामना करने में खुद को असमर्थ पाते हुए कई किसान ख़ुदकुशी करते रहे हैं।

कृषि क्षेत्र भारत की 2.9 ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था का लगभग 15 प्रतिशत योगदान देता है, लेकिन देश के 1.3 बिलियन लोगों में से लगभग आधे को रोजगार देता है।

किसान बिल लाकर सरकार ने अब किसानों को बड़े निगमों की दया पर छोड़ दिया है। यह मानना जरूरी है कि जिन किसानों के पास छोटी भूमि जोत है, उनके पास निजी कंपनियों के मुकाबले सौदेबाजी की कोई शक्ति नहीं होगी।

सरकारी अधिकारियों ने कहा है कि किसान अपनी उपज को अपनी इच्छानुसार बेच सकते हैं। एक छोटा किसान अपनी उपज को आखिर महीनों तक कैसे स्टोर कर सकता है? उसके पास भंडारण की सुविधा नहीं होगी। नतीजतन संभावना है कि उपज को उस दर पर बेचा जाएगा जो किसान के लिए घाटे का सौदा होगा।

बिल में आगे कहा गया है कि किसान निजी कंपनियों के साथ समझौते कर सकते हैं। इस तरह के सौदे आर्थिक रूप से आकर्षक हैं, लेकिन इसमें बहुत सारे नियम और शर्तें जुड़ी हुई हैं, एक किसान के लिए इनका सामना करना मुश्किल है। इस चक्कर में किसान कंपनी के गुलाम बन सकते हैं।

एमएसपी के संबंध में सरकार द्वारा किसानों को लिखित में कोई आश्वासन नहीं दिया गया हैं। सिर्फ मौखिक आश्वासन से पलट जाना मोदी सरकार की फितरत रही है।

अगर किसी किसान का किसी निजी कंपनी के साथ उसके अनुबंध को लेकर विवाद हो जाता है, तो किसान को अपने पक्ष में विवाद का निपटारा करना बहुत मुश्किल होगा। उदाहरण के लिए, एक छोटा किसान रिलायंस जैसे शक्तिशाली कारपोरेट का सामना कैसे कर सकता है? एक किसान वैसे भी कठिन स्थिति में है क्योंकि कृषि अस्थिर है। इसका मतलब है कि किसान अंततः आत्महत्या की ओर प्रेरित होंगे।

खाद्य और व्यापार नीति विश्लेषक देविंदर शर्मा का कहना है,"यह बिलकुल स्पष्ट है कि बिल से किसान को कोई लाभ नहीं होने वाला है और इसीलिए वे विरोध कर रहे हैं। एपीएमसी मंडी प्रणाली में बहुत सारी समस्याएं हैं, जिनमें सुधार की आवश्यकता है। कोई भी इससे इनकार नहीं कर रहा है। लेकिन एपीएमसी मंडी में सुधार का मतलब यह नहीं है कि आप किसानों को बिचौलियों के एक सेट से दूसरे बिचौलियों के एक समूह में धकेल दें। यह कृषि समस्या का हल नहीं है।"

शर्मा ने कहा,"मुद्दा यह है कि जिस देश में 86 प्रतिशत किसानों के पास दो हेक्टेयर से कम के आकार की भूमि है, आप उम्मीद नहीं कर सकते कि किसान अपनी उपज को बेचने के लिए दूर के स्थानों तक ले जाए। कृषि दशकों से एक दोषपूर्ण मूल्य निर्धारण व्यवस्था से पीड़ित है। दशकों से किसानों को सही आय से वंचित रखा गया है।"

किसान मूर्ख नहीं हैं। यदि उन्हें अपनी फसलों के लिए अधिक कीमत मिलेगी, तो क्या वे कोरोनोवायरस महामारी के बीच सड़कों पर विरोध करेंगे? असल में मोदी सरकार कार्पोरेट्स को कृषि में लाकर अमेरिकी मॉडल का अनुसरण कर रही है।

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