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यूनाइटेड किंगडम में कैंसर इलाज में अश्वेतों और एशियाई मूल की आबादी की उपेक्षा, हरेक नया अध्ययन रंगभेद को नए सिरे से करता है उजागर

Janjwar Desk
29 Aug 2022 6:56 AM GMT
यूनाइटेड किंगडम में कैंसर इलाज में अश्वेतों और एशियाई मूल की आबादी की उपेक्षा, हरेक नया अध्ययन रंगभेद को नए सिरे से करता है उजागर
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यूनाइटेड किंगडम में कैंसर इलाज में अश्वेतों और एशियाई मूल की आबादी की उपेक्षा, हरेक नया अध्ययन रंगभेद को नए सिरे से करता है उजागर (photo : twitter) 

National Health Services in United Kingdom ignores Black and Asian populations : कोविड 19 के दौरान अस्पताल में भर्ती के दौरान श्वेतों को कोविड 19 के लक्षण उभरते ही अस्पतालों में भर्ती कर लिया जाता था, जबकि अश्वेतों और एशियाई मूल की आबादी को लम्बे समय तक इंतज़ार करना पड़ता था, इसी कारण यूनाइटेड किंगडम और अमेरिका में श्वेतों की अपेक्षा अश्वेतों और एशियाई मूल के लोगों की मृत्यु कई गुना अधिक हुई थी....

महेंद्र पाण्डेय की टिप्पणी

National Health Services in United Kingdom ignores Black and Asian populations : पश्चिमी देशों और अमेरिका ने मानवाधिकार के सन्दर्भ में अपने आप को दुनिया में शीर्ष पर रखा है, पर वहां सारी सुविधाएं और मानवाधिकार श्वेतों तक ही सीमित हैं। शायद अपने देशों में मानवाधिकार के मुद्दे से दुनिया का ध्यान भटकाने के लिए ही उन्हें दुनिया की नज़रों में चीन में मानवाधिकार हनन के मुद्दे को जीवंत रखने की जरूरत पड़ती है।

अमेरिका और यूनाइटेड किंगडम जैसे देशों में अश्वेतों और एशियाई मूल के नागरिकों की हालत दूसरे दर्जे के नागरिक वाली ही है। यह हालत तब है जबकि बोरिस जॉनसन के प्रधानमंत्री काल में लगभग हरेक प्रमुख विभाग के मंत्री एशियाई मूल के ही थे, और इस समय प्रधानमंत्री पद के सबसे प्रबल दावेदार भारतीय मूल के ऋषि सुनक माने जा रहे हैं। हमारे देश में सोशल मीडिया पर यूनाइटेड किंगडम के बारे में कुछ इस तरह चर्चा की जाती है मानों यूनाइटेड किंगडम अपने देश का ही कोई प्रांत हो और वहां की राजनीति हमारे हाथों में आ गयी हो। कुछ ऐसा ही हाल अमेरिका में कमला हैरिस के उप-राष्ट्रपति बनने पर था।

हाल में ही यूनिवर्सिटी ऑफ़ एक्सटर के वैज्ञानिकों ने एक विस्तृत अध्ययन कर बताया है कि यूनाइटेड किंगडम में कैंसर के लक्षण पहचाने जाने से लेकर इसकी चिकित्सा के बीच के समय में रंगभेद पूरी तरह स्पष्ट होता है। यह समय श्वेतों के लिए सबसे कम है, जबकि एशियाई और अश्वेतों के लिए यह समय बहुत अधिक है। यूनाइटेड किंगडम के नेशनल हेल्थ सर्विसेज के प्रतिनिधियों ने बार बार कहा है कि वहां की सरकारी स्वास्थ्य सेवायें किसी भी नागरिक से भेदभाव नहीं करतीं पर हरेक नया अध्ययन रंगभेद को नए सिरे से उजागर करता है।

कोविड 19 के दौरान अस्पताल में भर्ती के दौरान किये गए अध्ययन से भी स्पष्ट था कि श्वेतों को कोविड 19 के लक्षण उभरते ही अस्पतालों में भर्ती कर लिया जाता था, जबकि अश्वेतों और एशियाई मूल की आबादी को लम्बे समय तक इंतज़ार करना पड़ता था। इसी कारण यूनाइटेड किंगडम और अमेरिका में श्वेतों की अपेक्षा अश्वेतों और एशियाई मूल के लोगों की मृत्यु कई गुना अधिक हुई थी।

यूनाइटेड किंगडम में प्राथमिक स्वास्थ्य से सम्बंधित लगभग पूरी आबादी के आंकड़े आसानी से उपलब्ध रहते हैं। यूनिवर्सिटी ऑफ़ एक्सटर के वैज्ञानिकों ने इन्हीं आंकड़ों से वर्ष 2006 से 2016 के बीच अस्पतालों में भर्ती होने वाले 126000 कैंसर मरीजों के आंकड़ों का विस्तृत विश्लेषण किया है। इस अध्ययन के अनुसार श्वेत आबादी में कैंसर का पता चलने के बाद औसतन 55 दिनों के भीतर उपचार शुरू कर दिया जाता है, जबकि एशियाई मूल के लिए यह समय 60 दिन और अश्वेतों के लिए 61 दिन है। समय में यह अंतर विभिन्न प्रकार के कैंसर के लिए अलग-अलग है। पेट के कैंसर के सन्दर्भ में कैंसर का पता चलने से लेकर उपचार शुरू करने में श्वेतों के लिए औसत समय 53 दिन है, जबकि एशियाई मूल के लिए यही समय औसतन 100 दिनों का है। रक्त कैंसर के एक प्रकार, मायलोमा, के लिए श्वेतों के लिए यही समय 93 दिनों का है, जबकि अश्वेतों के लिए यह समय 127 दिनों का है।

इस अध्ययन के लिए फेफड़े, स्तन, प्रोस्टेट और आँतों के कैंसर के साथ ही रक्त और ओवरी के कैंसर के मरीजों का चयन किया गया था। अश्वेतों और एशियाई मूल के नागरिकों में रक्त और ओवरी कैंसर के मामले अधिक होते हैं। स्तन कैंसर के मामले में कैंसर का पता चलने के बाद उपचार की अवधि श्वेतों और एशियाई मूल के लोगों में 13 दिन है, जबकि अश्वेतों के लिए यह अवधि 14 दिन है। स्तन कैंसर के मामले में सबसे अधिक इंतज़ार की अवधि के मामले में यह असमानता बहुत अधिक है। सबसे अधिक इंतज़ार के मामले में श्वेतों के लिए यह समय 41 दिनों का है, जबकि एशियाई मूल के नागरिकों को 56 दिनों का इंतज़ार करना होता है और अश्वेतों के लिए यह समय 73 दिनों का है।

यूनिवर्सिटी ऑफ़ एक्सटर के विशेषज्ञों के साथ ही यूनाइटेड किंगडम में कैंसर से जुड़े संगठनों और मानवाधिकार संगठनों ने यह मांग की है कि स्वास्थ्य सेवाओं में, विशेषकर कैंसर जैसे जानलेवा रोगों के मामले में, रंगभेद पर नए सिरे से विचार करने की जरूरत है, और नए प्रधानमंत्री के प्राथमिकता में इसे शामिल किया जाना चाहिए।

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