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विमर्श

घरेलू काम मर्द के जिम्मे आते ही नहीं रहेगा उपेक्षित और पारिश्रमिक भी हो जायेगा फिक्स

Prema Negi
10 May 2019 7:15 AM GMT
घरेलू काम मर्द के जिम्मे आते ही नहीं रहेगा उपेक्षित और पारिश्रमिक भी हो जायेगा फिक्स
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बच्चों को यह ज्ञान कि महिलायें पुरुषों की तुलना में बौद्धिक स्तर पर कमजोर होती हैं, यह समाज और घर-परिवार तो सिखाता ही है, इसके साथ ही उनकी पुस्तकें भी यही भेद बतातीं हैं...

वरिष्ठ लेखक महेंद्र पांडेय का विश्लेषण

साइकोलॉजिकल साइंस नामक जर्नल में प्रकाशित प्रिन्सटन यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों द्वारा किये गए एक शोध के अनुसार पौरुष की प्रधानता वाले चेहरे वाले लोगों को हमारा समाज किसी भी जिम्मेदारी उठाने के लिए अधिक काबिल मानता है। इसका सीधा सा मतलब है कि दुनिया में महिलायें जिम्मेदारी उठाने के योग्य नहीं समझी जातीं।

अमेरिकन साइकोलोजिस्ट नामक जर्नल में प्रकाशित एक शोध के अनुसार समाज महिलाओं और लड़कियों को पुरुषों के मुकाबले दिमागी तौर पर कमजोर समझता है। इस अध्ययन को न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी और यूनिवर्सिटी ऑफ़ इलेनॉइस के विशेषज्ञों ने सम्मिलित तौर पर किया है।

यह हालत तब है जबकि महिलायें शिक्षा से लेकर नौकरी तक पुरुषों से टक्कर ले रहीं हैं। इस वर्ष इंग्लैंड के विश्वविद्यालयों में दाखिले के लिए जितने भी आवेदन किये गए हैं उनमें से लड़कियों की संख्या लड़कों की तुलना में एक लाख से भी अधिक है।

यूनिवर्सिटी ऑफ़ इलेनॉइस के विशेषज्ञ लिन बियन के अनुसार हमारे समाज में बचपन से ही महिलाओं और पुरुषों के बौद्धिक स्तर का निर्धारण कर दिया जाता है और यह इतना गहरा होता है कि लड़कियां स्वतः अपने आप को कमतर आंकने लगती हैं।

इस संयुक्त दल ने 1150 वयस्क महिलाओं और पुरुषों से किसी नौकरी के लिए नाम सुझाने को कहा। इसके परिणाम में जो नाम बताये गए उनमें महिलाओं और पुरुषों के नाम लगभग आधे-आधे थे। फिर इन लोगों से बौद्धिक स्तर पर मजबूत नौकरी के लिए नाम सुझाने को कहा गया और इसके बाद परिणाम में पुरुषों की तुलना में महिलाओं के नाम लगभग 26 प्रतिशत तक कम हो गए।

क्या बच्चे भी महिलाओं या लड़कियों को बौद्धिक स्तर पर कमजोर मानते हैं, यह जानने के लिए इस दल ने 5 से 7 वर्ष तक के 192 बच्चों का चयन किया जिसमें लड़कियां और लड़के दोनों शामिल थे। इन बच्चों से कहा गया कि उन्हें एक खेल खेलना है, जिसमें उन्हें अपनी मर्जी से अपने पार्टनर का चयन करना है।

इसके परिणाम में जो नाम आये उनमें से लगभग आधे लड़के थे और आधी लड़कियां। फिर पहले की तरह ही इन बच्चों से कहा गया कि जिस खेल की चर्चा की जा रही है उसे खेलने में बहुत सोच विचार करना होगा यानी दिमाग खर्च करना होगा। इस बार लगभग सभी बच्चों ने, जिनमें लड़कियां भी शामिल थीं पार्टनर के तौर पर लड़कों का नाम बता रहीं थीं। लिन बियन के अनुसार अध्ययन के परिणाम से तो यही स्पष्ट होता है कि बचपन से ही हम यह मानने लगते हैं कि पुरुष महिलाओं से अधिक बुद्धिमान हैं।

बच्चों को यह ज्ञान कि महिलायें पुरुषों की तुलना में बौद्धिक स्तर पर कमजोर होती हैं, यह समाज और घर-परिवार तो सिखाता ही है, इसके साथ ही उनकी पुस्तकें भी यही भेद बतातीं हैं। इंग्लैंड के प्रतिष्ठित समाचारपत्र इंडिपेंडेंट ने हाल में ही वहां के पुस्तकालयों में उपलब्ध बच्चों के लिए लिखी गयी विज्ञान की सचित्र पुस्तकों के बारे में एक लम्बा लेख प्रकाशित किया है।

इन पुस्तकों में जितने भी चित्र हैं उनमें महिलायें बहुत कम हैं और यदि हैं भी तो सहायक की भूमिका में या फिर दर्शक की भूमिका में। महिलाओं के बौद्धिक स्तर, ज्ञान या तकनीकी विशेषता को दिखाता चित्र तो नगण्य है। इन पुस्तकों से बच्चे यही सीखते हैं कि विज्ञान का विषय पुरुषों का ही है। हाल यह है कि सामान्य तौर पर पुस्तकों में जितने चित्र हैं उनमें से एक तिहाई से कम में महिलायें दिखाई गई हैं।

इस अध्ययन में बच्चों के लिए लिखी गयी अंतरिक्ष यात्रियों से सम्बंधित एक पुस्तक का विशेष उल्लेख है। इसमें अंतरिक्ष यात्रा से सम्बंधित सामान्य वाक्यों में भी शब्दों का चयन केवल पुरुषों के लिए किया गया है। हरेक जगह अंतरिक्ष यात्रियों से सम्बंधित वाक्य में हिज (his) का उपयोग किया गया है जो पुरुषवाचक शब्द है।

इस पुस्तक में अब तक अंतरिक्ष में गयी लगभग 15 अंतरिक्ष यात्रियों में से किसी के बारे में जानकारी नहीं दी गयी है। पुस्तक में एक कोलाज (चित्र संग्रह) में अंतरिक्षयात्री सुनीता विलियम्स का चित्र तो है पर कहीं भी नाम तक नहीं है। इसी तरह एक दूसरे चित्र में एक महिला अंतरिक्ष यात्री की फोटो कुछ इस तरह से प्रस्तुत की गयी है जैसे वह अंतरिक्ष यात्रा में कोई काम करने नहीं बल्कि फोटो सेशन के लिए भेजी गयी हो।

इस यात्री का नाम नहीं है और वह कैमरे की तरफ देख कर मुस्करा रही है और नीचे कैप्शन में लिखा है, अंतरिक्ष में हरेक दिन बालों की दुर्दशा होती है। जाहिर है, ऐसी पुस्तकों से बच्चे यही सीखते हैं कि विज्ञान का क्षेत्र पुरुषों का ही है। यह अध्ययन भले ही इंग्लैंड में किया गया हो, पर बच्चों की किताबें अब किसी एक देश में नहीं बिकतीं पर दुनियाभर के बच्चे यही पुस्तकें देखते हैं और पढ़ते हैं।

छोटे बच्चे ही नहीं पर विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों का भी यही हाल है। इनमें भी महिला और पुरुष शिक्षकों को लेकर पूर्वाग्रह है और ये विद्यार्थी पुरुष शिक्षकों को महिला शिक्षकों से बेहतर समझते हैं। ऑस्ट्रेलिया के न्यू साउथ वेल्स यूनिवर्सिटी में छात्र शिक्षकों के काम का आकलन करते हैं। इस विश्वविद्यालय में केवल ऑस्ट्रेलिया के ही नहीं बल्कि दुनियाभर के छात्र और शिक्षक हैं।

वर्ष 2010 से 2016 के बीच 2000 विषयों के 3000 शिक्षकों का आकलन लगभग 500000 छात्रों ने किया। इस आकलन का विशेषण करने पर पता चला कि छात्रों ने लगातार पुरुष शिक्षकों को महिला शिक्षकों से अच्छा बताया। विज्ञान और वाणिज्य जैसे विषयों में यह अंतर सबसे अधिक था जबकि कला और सामाजिक विज्ञान के क्षेत्र में यह अंतर कुछ कम था।

विज्ञान के क्षेत्र में तो महिलायें लगातार उपेक्षित रहतीं हैं। प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका नेचर में प्रकाशित एक लेख के अनुसार विज्ञान में जितने भी अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठित पुरस्कार हैं उन्हें जीतने वालों में पुरुषों का वर्चस्व है। महिलायें केवल कम प्रतिष्ठित और कम राशि वाले पुरस्कार ही जीत पाती हैं। शिकागो स्थित केलोग स्कूल ऑफ़ मैनेजमेंट के ब्रायन उज्जी के अनुसार सामान्य लोग वैज्ञानिकों के कद को प्रकाशित शोध पत्र या उनके उद्धरण के आधार पर नहीं मापते बल्कि पुरस्कारों से मापते हैं, जहां महिलायें नजर ही नहीं आतीं। इसीलिए महिला वैज्ञानिक हमेशा गुमनाम ही रहती हैं।

ब्रायन उज्जी ने वर्ष 1968 से 2017 के बीच बायोमेडिसिन के क्षेत्र में मिले 525 प्रतिष्ठित पुरस्कारों का विश्लेषण करने के बाद देखा कि पुरस्कार प्राप्त करने वालों में 2738 पुरुष थे जबकि महिला वैज्ञानिकों की संख्या महज 437 थी। ब्रायन उज्जी के अनुसार उन्होंने तो केवल विज्ञान के एक क्षेत्र में मिले पुरस्कारों का विश्लेषण किया, पर हरेक क्षेत्र में महिला वैज्ञानिकों की स्थिति लगभग ऐसी ही है।

यूनिवर्सिटी ऑफ़ वाशिंगटन में कार्यरत वैज्ञानिक सपना चेरियन के अनुसार विज्ञान के क्षेत्र में बड़े राही वाले जितने पुरस्कार हैं उनमें से मात्र 14.6 प्रतिशत पुरस्कार महिला वैज्ञानिकों को मिले हैं और औसतन पुरस्कार की राशि महिला वैज्ञानिकों को पुरुष वैज्ञानिकों की तुलना में 35 प्रतिशत कम मिलती है। महिला वैज्ञानिकों को विज्ञान के क्षेत्र में जितने पुरस्कार मिलते हैं उनमें से महज 27 प्रतिशत अनुसंधान के लिए मिलते हैं जबकि शेष अनुसन्धान में सहयोग, किसी और के अनुसन्धान के विश्लेषण या फिर विज्ञान को लोकप्रिय बनाने के नाम पर दिए जाते हैं।

अमेरिका के टेक्सास स्थित साउदर्न मेथोडिस्ट यूनिवर्सिटी में सोशियोलॉजी विभाग में विशेषज्ञ ऐनी लिंकन ने वर्ष 2000 से 2010 के बीच मिले पुरस्कारों का विश्लेषण करने के बाद बताया कि पुरुष वैज्ञानिकों को महिला वैज्ञानिकों की तुलना में पुरस्कार मिलाने की संभावना आठ गुना अधिक रहती है और इसका कारण पुरस्कार की कमेटी में पुरुषों का वर्चस्व है। यदि कमेटी में एक भी महिला विशेषज्ञ शामिल की जाती है तब पुरस्कारों में लिंग-भेद लगभग समाप्त हो जाता है।

इसी तरह अनेक जर्नल में शोध पत्रों के प्रकाशन के क्षेत्र में भी बड़े पैमाने पर महिलाओं की उपेक्षा के जाती है। इससे निपटने के लिए अनेक जर्नल अब शोध पत्रों से लेखक का नाम हटाकर रिव्यु के लिए उसे विशेषज्ञों के पास भेजते हैं। ऐसा करने से जर्नल ऑफ़ बिहेवियर इकोलॉजी में महिला वैज्ञानिकों के शोध पत्रों के प्रकाशन में लगभग 8 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी दर्ज की गयी है।

विज्ञान और प्रोद्योगिकी जैसे विषयों पर भी अधिकतर पुरुष ही लेख लिखते हैं। आप कोई भी ऐसी पत्रिका उठा लीजिये, ये हाल स्पष्ट हो जाएगा। यहाँ तक कि समाचार पत्रों में भी ऐसे विषयों पर केवल पुरुष ही लिखते हैं। ब्रिटेन की पत्रिका “कन्वर्सेशन” ने वर्ष 2017 में अपने यहाँ प्रकाशित विज्ञान पर प्रकाशित 584 लेखों का आकलन किया। इन 584 लेखों को 681 लेखकों ने लिखा था, जिसमें से 72 प्रतिशत पुरुष और 28 प्रतिशत महिला लेखक थे। इस आकलन के बाग़ इस पत्रिका ने महिला लेखकों को प्रोत्साहित किया और वर्ष 2018 में महिला और पुरुष लेखकों का अनुपात 32:68 तक पहुँच गया।

अमेरिका में महिला वैज्ञानिकों को अपने आविष्कार के लिए पुरुषों की अपेक्षा कम पेटेंट मिलता है और उन्हें अधिक मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। नेचर बायोटेक्नोलॉजी नामक जर्नल में प्रकाशित लेख के अनुसार अमेरिका में महिला वैज्ञानिकों को पेटेंट के लिए हरेक कदम पर पुरुषों की तुलना में अधिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है और इसके अस्वीकृत होने की दर भी पुरुषों की तुलना में अधिक है।

यह अध्ययन अमेरिका के पेटेंट ऑफिस में 20 लाख आवेदनों के विश्लेषण के आधार पर किया गया है। पुरुष वैज्ञानिकों की तुलना में महिला वैज्ञानिकों को पेटेंट मिलने की संभावना महज 21 प्रतिशत ही रहती है।

अमेरिका में हाल में किये गए एक सर्वेक्षण से पता चलता है कि 15 प्रतिशत से अधिक नागरिक मानते हैं कि महिलायें राजनीति के लायक नहीं हैं, जबकि वर्तमान में जो कांग्रेस है उसमें महिलाओं की संख्या जितनी है उतनी अमेरिका के इतिहास में कभी नहीं रही। यह सर्वेक्षण अमेरिका के जार्जटाउन यूनिवर्सिटी सेंटर ऑन एजुकेशन एंड वर्कफोर्स ने किया था।

ब्रिटेन में एक सर्वेक्षण से स्पष्ट होता है कि अभी तक वहां की लगभग 40 प्रतिशत आबादी केवल पुरुषों को ही डॉक्टर समझती है। अमेरिका में एरिज़ोना स्टेट यूनिवर्सिटी के अध्ययन के अनुसार लोग महिला वकीलों को अपने पेशे में कमजोर समझते हैं। इस दल ने लोगों को एक महिला और एक पुरुष वकील के कोर्ट में अंतिम जिरह की विडियो दिखाकर उनसे राय मांगी थी। अंतिम जिरह भावपूर्ण होती है, जिसमें गुस्सा, झुंझलाहट और इसी तरह के अनेक इमोशन रहते हैं।

दोनों वकीलों ने अपने अपने मुकदमे अदालत में जीते थे। पर, लोगों के अनुसार महिला वकील का इमोशन एक नाटक था और जरूरत पड़ने पर लोग उस महिला वकील को अपना मुक़दमा नहीं देने की बात कर रहे थे। दूसरी तरफ पुरुष वकील के इमोशन को लोगों ने मुकदमे के लिए आवश्यक माना और जरूरत पड़ने पर उसकी सहायता लेने की बात कही।

यूरोपियन देशों और अमेरिका में यह बहस जोरों पर है कि नौकरी के परम्परागत आवेदनों में अनेक ऐसे शब्दों को शामिल कर लिया जाता है जिसे देखकर महिलायें अधिकतर नौकरी में अपना आवेदनपत्र ही नहीं भेजतीं। दूसरी तरफ आवेदनों की स्क्रूटिनी करने वाले भी नाम देखकर जब जान जाते हैं कि आवेदक पुरुष है या महिला तब अधिकतर मामलों में महिलाओं को पीछे छोड़कर पुरुषों का नाम आगे बढाते हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार जिन विज्ञापनों में प्रबंधन, प्रतिस्पर्धा और निपटाना जैसे शब्दों को देखकर कम ही महिलायें ऐसे विज्ञापनों के लिए आवेदन भेजतीं हैं। नौकरी के आवेदनों में महिलाओं और पुरुषों के बीच बढ़ते भेदभाव को दयां में रखकर अब रोजगार दिलाने वाले अनेक यूरोपियन कम्पनियां अब स्क्रूटिनी करने वालों को आवेदक के नाम और फोटो के बिना ही आवेदन भेजते हैं और इसके बाद से नौकरी पाने वाली महिलाओं की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है।

वीमेन इन स्पोर्ट्स इंग्लैंड की एक संस्था है और महिलाओं को खेलों में आगे बढ़ाने का काम करती है। पिछले वर्ष इस संस्था ने 1152 पुरुष और महिला खिलाड़ियों से बातचीत करने के बाद निष्कर्ष निकाला कि खेल उद्योग में 40 प्रतिशत से अधिक महिलायें भेदभाव का शिकार होती हैं और 30 प्रतिशत से अधिक महिलायें यौन हिंसा का शिकार होती हैं।

खिलाड़ियों से जब यह प्रश्न पूछा गया कि क्या खेल में महिला और पुरुषों से एक जैसा व्यवहार किया जाता है तब 46 प्रतिशत महिलायें और 72 प्रतिशत पुरुषों ने हाँ में जवाब दिया। प्रख्यात टेनिस खिलाड़ी सेरेना विलियम्स तो अनेक बार खेलों में पुरुषों और महिलाओं के साथ अलग-अलग व्यवहार का मुद्दा प्रखर तरीके से उठा चुकी हैं।

कुछ महीने पहले अमेरिका की राष्ट्रीय महिला फुटबाल टीम ने फुटबाल फेडरेशन पर वहां के सर्वोच्च न्यायालय में पुरुष और महिला खिलाड़ियों के वेतन में भेदभाव को लेकर मुक़दमा दायर किया है। इनका आरोप है कि पुरुष खिलाड़ी भी अपने देश के लिए उतनी ही लगन से खेलते हैं जितना महिलायें, फिर उन्हें पुरुष खिलाड़ियों की तुलना में आधे से भी कम वेतन क्यों दिया जाता है।

यह भेदभाव केवल फुटबाल में ही नहीं है, बल्कि हरेक देश में हरेक खेल में है। इससे पहले टेनिस में यही चर्चा थी, पर बिली जीन किंग और मार्टिना नवरितोलोवा जैसे खिलाड़ियों ने इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया और अब महिला और पुरुष प्राइज मनी में अंतर कम हो गया है। क्रिकेट, बैडमिंटन और एथेलेटिक्स जैसे खेलों में भी महिलाओं के वेतन और भत्ते पुरुषों की तुलना में बहुत कम हैं।

वालमार्ट के 100 महिला कर्मचारियों ने अपनी कंपनी पर वेतन में लिंगभेद का आरोप लगाकर मुक़दमा दायर किया है। इसी तरह के अनेक मुकदमे दूसरी और बड़ी-बड़ी कंपनियों के विरुद्ध दायर किये गए हैं। पर, कहीं कोई बदलाव नहीं आता और न्यायालय भी कंपनियों का ही पक्ष लेते हैं।

ये सभी अध्ययन दूसरे देशों के हो सकते हैं पर अपने देश में इससे भी बदतर हालत है। अधिकतर महिलायें अशिक्षित हैं और खेती में सहयोग करती हैं, घर की पूरी जिम्मेदारी उठाती हैं, बच्चों को पालती हैं, घर के बुजुर्गों का ख्याल रखतीं हैं और पानी, चारा और चूल्हे की लकड़ी का इंतजाम करती हैं। ये सभी काम उपेक्षित माने जाते हैं और न ही इसका कोई पारिश्रमिक मिलता है।

अनेक समाज विज्ञानी मानते हैं कि ये सभी काम उपेक्षित इसलिए माने जाते हैं क्योंकि इन्हें महिलायें करतीं हैं और जिस दिन से पुरुष ये सभी काम करने लगेंगे तब से ये काम उपेक्षित नहीं माने जायेंगे और इनका पारिश्रमिक भी तय हो जाएगा।

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