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'CAA हिंदू-मुसलमानों के बीच धार्मिक संघर्ष नहीं, दो नजरियों का राजनीतिक अंतर है'

Janjwar Team
3 March 2020 5:00 AM GMT
CAA हिंदू-मुसलमानों के बीच धार्मिक संघर्ष नहीं, दो नजरियों का राजनीतिक अंतर है
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भारत में जो खेल चल रहा है, वह हिंदुओं और मुसलमानों के बीच एक साधारण धार्मिक संघर्ष नहीं है बल्कि भारत के दो विज़नों के बीच एक राजनीतिक संघर्ष है...

गस्त 1958 में श्वेत युवकों के एक गिरोह ने लंदन के नॉटिंग हिल में भारतीयों पर सुनियोजित हमला करना शुरु कर दिया था। उनपर लोहे की सलाखों, मांस काटने वाले हथियारों और दूध की बोतलों से हमला किया गया था। एक पुलिस अधिकारी ने 300 लोगों की भीड़ के चीखते- चिल्लाते हुए सूचना दी थी कि हम सभी काले कमीनों को मार डालेंगे। आप उन्हें (भारतीयों को) घर क्यों नहीं भेजते? आदेश को वापस लेने तक एक सप्ताह तक हमले होते रहे।

स घटना को अभी भी 'नॉटिंग हिल दंगा' के रूप में जाना जाता है। यह और कुछ नहीं, सप्ताह पर चलने वाला यह एक नस्लवादी हमला था। जस्टिस सैल्मन ने ओल्ड बेली में नौ श्वेत युवकों को सजा सुनाते हुए इसे 'निगर हंटिंग' कहा था।हालांकि नस्लवादी हिंसा को 'दंगे' के रूप में वर्णित करने का एक लंबा इतिहास है, इसे लक्षित हमलों के बजाय सामान्य हिंसक तबाही के रूप में चित्रित किया जाता है।

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ह मामला बीते एक हफ्ते पहले भारत की राजधानी दिल्ली के कुछ हिस्सों में हुई हिंसा जुड़ा है। पत्रकारों और राजनेताओं ने 'दंगा' और 'सांप्रदायिक हिंसा' होने की बात कही है। नॉटिंग हिल के अश्वेत निवासियों पर हमले को दंगे के रुप में वर्णित करना ज्यादा सही नहीं है। दिल्ली ने पिछले एक सप्ताह में जो देखा वो 'निगर हंटिंग' के जैसा ही है। हिंदू राष्ट्रवादियों की भीड़ (मुख्यरुप से भाजपा समर्थक) के नेतृत्व में 'जय श्री राम' और 'हिंदुओं का हिंदुस्तान' के नारे के साथ मुसलमानों के खिलाफ लक्षित हिंसा की गई।

क स्थानीय भाजपा राजनेता कपिल मिश्रा ने पिछले रविवार को एक रैली के बाद कहा कि जब तक पुलिस नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के खिलाफ प्रदर्शनकारियों की सड़कों से खाली नहीं करती, तब वह और उनके समर्थक खुद ऐसा करेंगे। सीएए एक नया कानून है जो मुसलमानों को छोड़कर बाकि अन्य को बिना दस्तावेज के पड़ोसी देशों से आने वाले शरणार्थियों को भारत की नागरिकता देता है। आजादी के बाद से भारत में कानून का यह पहला ऐसा मामला है जो मुस्लिमों को दरकिनार करता है और जिसके खिलाफ व्यापक पैमाने पर प्रदर्शन हुए हैं।

मिश्रा के अल्टीमेटम के कुछ ही घंटों के भीतर भाजपा गैंग ने सीएए विरोधी प्रदर्शनकारियों पर हमला शुरु कर दिया और उस दिन मुस्लिमों के घरों, दुकानों और मस्जिदों को आग के हवाले कर दिया। इसमें एक पुलिसकर्मी समेत 39 लोगों की मौत हो चुकी है। हिंदुओं पर भी हमला किया गया और उनके घरों को जला दिया गया।

भाजपा हिंदुत्व या हिंदुत्व की विचारधारा से प्रेरित है जो एकमात्र हिंदू जीवन शैली को ही ऑथेंटिक मॉडल के रुप में देखती है। पिछले महीने सरकार के एक मंत्री गिरीराज सिंह ने कहा था कि विभाजन के समय ही सभी मुसलमानों को पाकिस्तान भेज देना चाहिए था।

ई यूरोपीय प्रतिक्रियावादी समूहों की तरह भाजपा ने मुख्य रूप से मुख्यधारा की पार्टियों, खासकर कांग्रेस की असफलता और भ्रष्टाचार से असहमति के कारण लोकप्रिय समर्थन हासिल किया। कांग्रेस ने भारत की आजादी के बाद सबसे ज्यादा समय के लिए शासन किया है। 2014 में जब बीजेपी सत्ता में आई थी तब उसके हिंदू धर्मवाद का केंद्र छोटा था। लेकिन पिछले साल के चुनावों में एक शानदार दूसरी जीत के बाद उन्हें विवादित नीतियों को आगे बढ़ाने का लाइसेंस मिल गया।

2019 में सरकार ने मुस्लिम बहुल जम्मू और कश्मीर को दिए गए विशेष राज्य के दर्जे को वापस ले लिया जिसकी हिंदू राष्ट्रवादी 1950 के दशक से मांग करते रहे रहे। इसके बाद स्थानीय प्रदर्शनकारियों को बर्बरता से निपटा गया। फिर मुस्लिम नागरिकता पर दोतरफा हमला करने के लिए सीएए आया। राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) नागरिकता के दस्तावेजीकरण के लिए दूसरा बड़ा कांटा है। लाखों गरीब भारतीयों के पास कोई दस्तावेज नहीं हैं। गैर मुस्लिमों के लिए यह बहुत बड़ा बोझ नहीं होने की संभावना है क्योंकि सीएए उन्हें नागरिकता का रास्ता प्रदान करता है। मुस्लिमों को सीएए से बाहर रखा गया है इसलिए उन्हें डर है कि वह अपने ही देश में विदेशी घोषित किए जा सकते हैं जबकि उनकी कई पीड़ियां भारत में रही हैं। उनको डर है कि वह भारत के रोहिंग्या साबित हो सकते हैं।

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सीएए का हिंदू और मुस्लिम के रुप में व्यापक विरोध से पता चलता है कि मुसलमानों को बाहर करने की कोशिश से भाजपा की अराजकतावादी विचारधारा कितनी कट्टर है। दिल्ली में हिंसा के बीच मुस्लिम पड़ोसियों की रक्षा करने वाले हिंदुओं और हिंदुओं की रक्षा करने वाले मुसलमानों की कई कहानियां हैं। भारत में जो खेल चल रहा है, वह हिंदुओं और मुसलमानों के बीच एक साधारण धार्मिक संघर्ष नहीं है बल्कि भारत के दो विज़नों के बीच एक राजनीतिक संघर्ष है। उन लोगों के बीच जो इसे एक खुले धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के रूप में देखते हैं और एक जो अराजकतावादी हिंदू राज्य बनाना चाहते हैं। यह संघर्ष केवल मुस्लमानों और भारतीयों के लिए ही नहीं बल्कि हम सभी के लिए मायने रखता है।

(केनन मलिक भारतीय मूल के ब्रिटिश लेखक, लेक्चरर और ब्रॉडकास्टर हैं। उनका यह लेख पहले द गार्जियन में प्रकाशित किया जा चुका है। लेख का संपादित अंश)

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