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गोहत्या पर पाबंदी से पशु बाजारों में भारी गिरावट, किसानों को खेती की आय का बड़ा नुकसान

Janjwar Team
14 March 2020 4:30 AM GMT
गोहत्या पर पाबंदी से पशु बाजारों में भारी गिरावट, किसानों को खेती की आय का बड़ा नुकसान
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जनज्वार। मत्स्य, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय द्वारा प्रकाशित 2019 पशुधन जनगणना के अनुसार भारत में कुल पशुधन स्वामित्व के प्रतिशत के रूप में मवेशी स्वामित्व 2019 में घटकर 35% हो गया है जो साल 2017 में 37% था, जबकि भैंस, भेड़ और बकरियों का स्वामित्व बढ़ गया है।

क महत्वपूर्ण ट्रेंड जो इन आंकड़ों से उभरता है, वह यह है कि कुल स्वदेशी / नवजात मवेशियों की आबादी 2012 में 151.17 मिलियन थी जो 6% घटकर 2019 में 142.11 मिलियन हो गई है। यह गिरावट साल 2007-12 की जनगणना अवधि के दौरान लगभग 9% अधिक थी। इसे कैटगरी में देखें तो नर पशुओं की जनसंख्या 2012 में 61.95 मिलियन थी जो 2019 में घटकर 43.94 मिलियन हो गई है, जबकि मादा पशुओं की संख्या 10% बढ़ोत्तरी हुई है। 2012 में यह 89.22 मिलियन थी जो बढ़कर 2019 में 98.17 मिलियन हो गई।

वेशी विशेषज्ञों का कहना है कि केंद्र सरकार का मई 2017 में गोहत्या पर प्रतिबंध (स्वदेशी नस्लों को संरक्षित करने और गायों, बछड़ों और अन्य दुधारू पशुओं के वध पर प्रतिबंध लगाने का फैसला) से खेत की आय पर प्रभाव पड़ा है और आवारा पशुओं की संख्या में वृद्धि हुई है। केरल, पश्चिम बंगाल, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, मेघालय, नागालैंड, त्रिपुरा और सिक्किम को छोड़कर भारत में हर जगह गोहत्या प्रतिबंधित है।

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शुचिकित्सा वैज्ञानिक और गोजातीय अर्थव्यवस्था विशेषज्ञ सागरी आर रामदास भारत के खाद्य संप्रभुता संगठन की सदस्य हैं। यह खाद्य संप्रभुता संगठन आदिवासियों, दलितों, देहाती भूमिहीन, छोटे और सीमांत किसानों का एक मंच है। खाद्य संप्रभुता संगठन का मानना है कि लोगों को अपने स्वयं के भोजन और कृषि प्रणालियों को परिभाषित करने में सक्षम होना चाहिए। रामदास तेलंगाना के संगा रेड्डी जिले के कुडली इंटरगेंनेशियल लर्निंग सेंटर (दलितों और आदिवासियों के लिए सीखने की जगह) में शिक्षा कार्यक्रम की प्रमुख हैं।

(पुणे स्थित महिला पशु वैज्ञानिकों के संगठन) के संस्थापक रामदास ने आजीविका के मुद्दों पर छोटे और सीमांत कृषक समुदायों के साथ काम किया है। वह तेलंगाना की दुर्लभ, काले डेकाणी भेड़ के ऊन से बुने हुए गोंगडी के पुनरुद्धार के काम में शामिल रही हैं। लिंग, खाद्य संप्रभुता, पशुधन और पारिस्थितिक शासन को लेकर उनके लेख प्रकाशित होते रहे हैं।

रामदास से बातचीत के कुछ अंश-

सवाल : क्या पशुधन की जनगणना के आंकड़ों से पता चलता है कि किसान गौ-पालन और वध रोकथाम कानूनों के कारण पशु स्वामित्व से दूर चले गए हैं?

जवाब : हाल की जनगणना के तीन पहलू हैं जो मवेशी स्वामित्व में पूरी तरह से गिरावट की ओर मजबूती से इशारा करते हैं (कड़े वध कानूनों जैसे जानवरों के अंतर-राज्य परिवहन पर पूर्ण प्रतिबंध और सतर्कता की वजह से किसानों को जरुरत पड़ने पर अपने मवेशियों को बेचना पूरी तरह से असंभव हो गया है)

i) पिछले कई आंकड़ों की तुलना में 2012 और 2019 के बीच नर मवेशियों की आबादी में अभूतपूर्व गिरावट आई है।

ii) जिन राज्यों में उनके वध को लेकर कानूनों को सख्त कर दिया गया है उनमें साल 2007-2012 की तुलना में 2012-2019 के दौरान मादा मवेशियों की आबादी में काफी कम प्रतिशत वृद्धि हुई है।

iii) वध कानूनों के कारण राज्यों में आवारा पशुओं की आबादी में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। जिन राज्यों में मवेशियों के अंतर-राज्य परिवहन पर प्रतिबंध है वहां 15% से लेकर 100% वृद्धि हुई है।

1980 के मध्य से कृषि में मशीनीकरण (जैसे वाहक पशुओं की जगह ट्रैक्टर का इस्तेमाल) की शुरुआत के बाद से नर मवेशियों की आबादी में गिरावट आई है। यह गिरावट जो 2007 और 2012 के बीच -18% थी वो 2019 तक लगभग दोगुना -30% हो गयी है।

राज्यों में नर मवेशियों की आबादी के आंकड़ों का विश्लेषण हमें बताता है कि कैसे नर पशुओं की संख्या में कमी आई है। मवेशियों के अंतरराज्यीय परिवहन के अपराधीकरण, गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, हरियाणा और पंजाब जैसे राज्यों में वध कानूनों को कड़ा करने, उत्तर प्रदेश में कथित अवैध बूचड़खानों को जबरन बंद करने के कारण बड़े पैमाने पर मवेशियों की आबादी में कमी आई है।

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किसानों के लिए अपने वाहक जानवरों (जिनका इस्तेमाल खेती किसानी में होता है) को बेचना और फिर अगले सीज़न (खेती के अगले सीजन के लिए) के लिए जानवरों की नई जोड़ी खरीदना सामान्य सी बात है। गोरक्षा के नाम पर सतर्कता की वजह से पशु बाजारों में भारी गिरावट आई है। वाहक जानवरों की जगह की जगह मशीनों और रासायनिक उर्वरकों ने ले ली है।

मादा मवेशियों के मामले में किसान आमतौर पर अपनी चौथी या पांचवी स्तनपान कराने वाली मादा मवेशी (जिसने चौथी या पाँचवीं बार जन्म दिया है) को बेच देते हैं या अंत में वे इन्हें उन राज्यों में ले जाए जाएंगे जहां वध की अनुमति है। फिर इस पैसे का इस्तेमाल वो आंशिक रूप से एक छोटे जानवर को खरीदने की लागत को पूरा करने में करेंगे। पहले की जनगणना की तुलना में मादा मवेशियों की आबादी में एक बार फिर से काफी धीमी वृद्धि हुई है।

श्चिम बंगाल में वध पर प्रतिबंध नहीं है, वहां मादा मवेशियों की आबादी में सबसे अधिक 34% की वृद्धि हुई है। एक ड्राफ्ट जानवर के लिए कोई बाजार मूल्य नहीं होने पर क्या होता है कि उस नर बछड़े की उपेक्षा की जाती है और उसे भूखे मरने की अनुमति दी जाती है। यह पहले से ही पुरुष बछड़ों के साथ हो रहा है जो देसी मवेशियों की तुलना में खराब प्रदर्शन करने वाले काम करने वाले जानवर हैं।

सवाल: परंपरागत रूप से वृद्ध मवेशियों के साथ क्या किया जाता था?

जवाब : उन्हें हमेशा वध के लिए बेचा जाता था। बीफ पारंपरिक रूप से हमारी खाद्य संस्कृति का हिस्सा रहा है और चमड़ा और निर्रथक पशुओं का रद्दी हिस्सा अर्थव्यवस्था का हिस्सा रहे हैं।

सवाल : सरकार ने राज्यसभा में माना है कि वध के प्रतिबंध के बाद से आवारा मवेशियों की आबादी में वृद्धि हुई है। आवारा मवेशी किसानों को कैसे प्रभावित करते हैं? वृद्ध मवेशी किसानों की आय को कैसे प्रभावित करते हैं?

जवाब: आवारा मवेशी किसी के नहीं हैं, लेकिन उन्हें खाने-पीने की जरूरत है। इसलिए वे खेतों में प्रवेश करते हैं, फसलों पर चरते हैं, किसी भी स्रोत से पानी पीने की कोशिश करते हैं। जानवरों को बाहर रखने, उनका पीछा करने, उन्हें पीटने, उन्हें मारने से वह हमलावर हो जाते हैं फिर वह नुकसान करते हैं। इन राज्यों से अखबार की रिपोर्ट पढ़ें जहां की यह दुखद कहानी हैं जो सामने आई है।

वृद्ध पशु गरीब किसान परिवारों (जो ज्यादातर दलित, बहुजन और मुस्लिम हैं) के लिए एक पूर्ण आर्थिक और श्रमिक बोझ हैं। उन्हें चारा, पानी, सफाई और स्वास्थ्य देखभाल की आवश्यकता होती है और यह श्रम कौन प्रदान करता है..महिलाएं। यह महिलाओं के अवैतनिक श्रम के घंटे हैं जो ब्राह्मणी पवित्र गाय संस्कृति को बढ़ाते हैं। गाय के गोबर और मूत्र की बिक्री से होने वाली आमदनी उपर्युक्त ऑफसेट के लिए बहुत कम है।

सवाल: यूपी के बूचड़खाने बंद होने के कारण कसाई, किसान और व्यापारी बड़े कारोबारी के निशाने पर आ गए हैं। आपके एक लेख में आपने कहा था कि गाय के बूचड़खानों पर प्रतिबंध बड़े कॉरपोरेट्स को भारतीय बाजार में प्रवेश करने में सक्षम बनाता है। क्या आप बता सकते हैं कि कैसे?

जवाब : आपके लेख से स्पष्ट रूप से पता चला है कि इन फैसलों ने बीफ (भैंस के मांस) के वितरण की श्रृंखला को पूरी तरह से बाधित कर दिया है, जो मुख्य रूप से मुस्लिम नागरिकों की आजीविका और रोजगार था। इसलिए मैं यह बताना चाहती हूं कि वैधानिकता और स्वच्छता की आड़ में राज्य जानबूझकर मुसलमानों को निशाना बना रहा है और उनके जीवन को पूरी तरह से नष्ट कर रहा है।

करने से गोमांस में बड़े प्राइवेट प्लेयर्स ने घरेलू गोमांस बाजारों पर एकाधिकार कर लिया है। उन्हें तथाकथित 'अवैध बूचड़खानों' को बंद करने से बाजार के एकाधिकार की सुविधा हुई है। भारत में खाद्य प्रसंस्करण और पशुपालन में 100% प्रत्यक्ष विदेशी निवेश है और हम पहले से ही भारतीय डेयरी बाजारों में शीर्ष वैश्विक डेयरी खिलाड़ियों के बीच इस तरह की व्यापार साझेदारी और संयुक्त उपक्रम ( ले-लैक्टालिस-तिरुमाला डेयरी, फोंटेरा -फ्यूम मिल्क, डेनोन-एपिगैमिया) देख चुके हैं।

(यह आलेख इंडिया स्पेंड पर प्रकाशित किया जा चुका है। पशु चिकित्सा वैज्ञानिक सागरी आर रामदास पूरा इंटरव्यू यहां पढ़ा जा सकता है। यह इंटरव्यू प्राची साल्वे ने किया है।)

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