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झारखंड के पलामू मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों की संवेदनहीनता का दंश झेलते आदिवासी, गंभीर रोगी अस्पताल से लौट रहे घर

Nirmal kant
11 May 2020 2:30 AM GMT
झारखंड के पलामू मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों की संवेदनहीनता का दंश झेलते आदिवासी, गंभीर रोगी अस्पताल से लौट रहे घर
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झारखंड के विभिन्न इलाकों में आदिम जनजातियों के लोग रहते हैं। इनमें कोरवा, परहिया, असुर, बिरजिया, बिरहोर, माल पहाड़िया, साबर, सौरिया पहाड़िया और हिल खड़िया आदि जनजातियां शामिल हैं, इनकी संख्या में लगातार कम से कमतर होती जा रही हैं...

विशद कुमार की रिपोर्ट

जनज्वार, रांची। एनसीडीएचआर के राज्य समन्वयक मिथिलेश कुमार बताते हैं कि मनातु प्रखंड के दलदलिया गांव का विदेशी परहिया और केदल गांव (कोहबरिया टोला) का सकेन्दर परहिया, जो टीबी की गंभीर बीमारी से ग्रसित हैं, को 9 अप्रैल पीएमसीएच (पलामू मेडिकल कॉलेज एण्ड होस्पिटल) में भर्ती कराया गया। मगर इन टीबी मरीजों को भर्ती कराने में हमारे पसीने छूट गये।

र्ती के पूर्व इन लोगों के अस्पलात में बेड के लिए वार्ड से लेकर अस्पताल अधीक्षक कार्यालय और यक्ष्मा केन्द्र तक चक्कर लगाने पड़े। अस्पताल के बड़े तो बड़े छोटे कर्मचारी भी कुछ सुनने को तैयार नहीं थे। सभी एक दूसरे पर टालते रहे। ट्रोली मैन मरीज के साथ गए लोगों को ही ट्रोली से मरीज को ले जाने का निर्देश दे रहा था। सब के सब एक दूसरे पर फेंकते रहे।

हां अव्यवस्था की स्थिति का आलम यह था कि सिविल सर्जन के फोन तथा निर्देश के बाद भी कोई सुनने वाला नहीं था। अंततः बड़ी मशक्कत के बाद हम लोगों ने टीबी पीड़ित परहिया लोगों को बेड दिलवा पाये, तो ऐसा लगा कि जैसे हमने कोई जंग जीत लिया हो। मगर कक्ष में इतनी गंदगी थी कि बीमार सकेन्दर परहिया बेड पर सोने को तैयार नहीं था। किसी तरह समझा बुझा कर उसे बेड पर रखा गया।

विदेशी परहिया अस्पताल के अंदर की गंदगी से घबड़ाकर बाहर आकर बैठ गया। विदेशी परहिया का कहना था कि यहां काफी दिन हम नहीं रह पायेंगे। क्योंकि मेरा घर इससे बहुत ज्यादा साफ-सुथरा रहता है। जबकि सकेन्दर परहिया जो चल फिर सकने अक्षम होने कारण चुपचाप बेड पर पड़ गया।

विदेशी परहिया, अस्पताल के अंदर की गंदगी से घबड़ाकर बाहर आकर बैठ गया

मिथिलेश बताते हैं कि अभी इन्हें सिर्फ भर्ती कराया गया है। अभी इनकी चेकअप होना बाकी है। बीमार मरीज को सहानुभूति की जरूरत होती है, लेकिन यहां जो अस्पतालकर्मी का जो व्यवहार है, उससे लगता है कि मरीज ठीक होने के बजाय और बीमार हो जाएंगे। इन टीबी मरीजों को पिछले 1 अप्रैल को इसी अस्पताल में भर्ती कराया गया था और ये लोग अस्पताल से भाग गये थे।

मिथिलेश कुमार कहते हैं कि इस अस्पताल की अव्यवस्था और गंदगी देखने बाद समझ में आ गया कि ये लोग बगैर ठीक हुए क्यों भाग गये थे। हालांकि इस मामले को मुख्यमंत्री जन संवाद केंद्र, झारखंड ने संज्ञान में लिया। मगर इस संज्ञान से अस्पताल की व्यवस्था पर किसी तरह का कोई फर्क नहीं पड़ा है। जिसका जीता जागता उदाहरण इस बात से लगाया जा सकता है कि जिन टीबी मरीजों विदेशी परहिया और सकेन्दर परहिया को 9 अप्रैल को भर्ती कराया गया था, वे अस्पताल की दुर्व्यवस्था से घबड़ाकर दूसरे दिन ही भाग गए।

व्यवस्थागत कमियों को इसी से समझा जा सकता है कि मरीजों की पर्ची पर 'पलामू मेडिकल कालेज अस्पताल' अंकित है, जबकि मरीजों के रजिस्ट्रेशन पर्ची पर 'सदर अस्पताल मेदनीनगर पलामू' लिखा हुआ है। बताते चलें कि झारखंड के विभिन्न इलाकों में आदिम जनजातियों के लोग रहते हैं। इनमें कोरवा, परहिया, असुर, बिरजिया, बिरहोर, माल पहाड़िया, साबर, सौरिया पहाड़िया और हिल खड़िया आदि जनजातियां शामिल हैं।

नकी संख्या में लगातार कम से कमतर होती जा रही हैं, जिसका कारण यह है कि इनकी अजीविका का एक मात्र साधन केवल जंगल आधारित रहा है, क्योंकि इनकी निर्भरता कृषि आधारित कभी नहीं रही। इनको जंगलों से कई तरह की जीवनोपयोगी जड़ी-बुटी, कंद-मूल, कंदा, गेठी सहित संतुलित आहार के तौर पर कई तरह की सागों से पोषक तत्त्व मिलते रहे हैं। ये जंगलों से बांस वगैरह काट कर उससे टोकरी वगैरह बनाकर अपनी अन्य जरुरतें भी पूरी करते रहे हैं। अत: जंगल के कटने और वन अधिनियम के तहत इनको जंगल से बेदखल किया जा रहा है।

हां इनकी निर्भरता कृषि कभी नहीं रही, ऐसे में इनके पास कृषि के लिए जमीन भी नहीं है। जिनके पास थोड़ी जमीन है भी तो वे उस पर खेती नहीं कर पाते हैं। मतलब ये लोग आज भी पूरी तरह प्रकृति पर निर्भर हैं। यही वजह है कि आज ये लोग कुपोषण के कारण कई खतरनाक बीमारियों से ग्रसित रह रहे है तथा इनके मृत्यु दर का ग्राफ बढ़ता रहा है, जिसकी वजह से इन्हें विलुप्त होने वाली जनजातियों में शुमार किया गया है।

राज्य के पलामू जिले में कई आदिवासी समुदायों के बीच रहते हैं परहिया आदिम जनजाति के लोग। करीब 20 लाख जनसंख्या वाले पलामू में परहिया जनजातियों की जनसंख्या लगभग 5 हजार है। वहीं जिला मुख्यालय से करीब 70 किलोमीटर दूर है मनातु प्रखंड, जहां राशन कार्ड में दर्ज नामों के आधार पर इनकी आबादी 1003 है। ऑनलाइन सर्च में 420 परहिया परिवारों का राशन कार्ड दिखता है। जबकि सूत्र बताते हैं कि यहां 500 से अधिक परहिया परिवार रहता है। स्पष्ट है कि राशन कार्ड में एक परिवार से औसतन 2 लोगों का ही नाम दर्ज किया गया है, जबकि एक परिवार में औसतन 4-5 की संख्या मानी जाती है।

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बसे मजेदार बात यह है कि इन्हें यह भी नहीं पता है कि इनके नाम से ऑनलाइन राशनकार्ड भी है क्योंकि सरकारी योजनाओं का कोई भी लाभ शायद इन्हें अभी तक नसीब नहीं है। इनके घरोंं को देखकर प्रधानमंत्री आवास योजना की असली तस्वीर भी समझ आ जाती है और सरकार की ढपोरशंखी घोषणाओं की पोल भी खुलती नजर आती है।

ता दें कि मनातु प्रखंड स्थित डूमरी पंचायत का दलदलिया, सिकनी (फटरिया टोला), केदला (कोहबरिया टोला) में आदिम जनजाति परहिया समुदायों के केदल गांव निवासी सकेन्दर परहिया, डुमरी पंचायत के दलदलिया टोला के सोमर परहिया, डुमरी पंचायत का दलदलिया टोला के विदेशी परिहिया, धुमखर के अनिल परहिया और भूईनया के सुरेश परहिया, ये 6 लोग काफी दिनों से टी.बी. रोग से पीड़ित हैं।

लेकिन जब इन सभी के मुंह से लगभग 20 दिन पहले खून आने लगा तो गांव के लोगों ने उन्हें नजदीकी सरकारी अस्पताल मनातु सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में भर्ती कराया। मगर यहां इनकी इलाज नहीं की गई तथा इन्हें पलामू मेडिकल कालेंज अस्पताल ले जाने को कहा गया। जब इन्हें पलामू मेडिकल कालेंज अस्पताल ले जाने के लिए एम्बुलेंस की मांग की गई, जो कि वहां से करीब 70 किमी दूर है, तो बीमारों को डांटकर भगा दिया गया। मरता क्या नहीं करता, गांव के कुछ लोगों ने एक अप्रैल को इन्हें मोटरसाईकिल से पलामू मेडिकल कालेंज अस्पताल पहुंचाया।

स्पताल ले जाने के क्रम में रास्ते में मोटरसाइकिल चालकों को कई बार रूकना पड़ा, क्योंकि ये इतने कमजोर हो चुके थे कि मोटरसाइकिल में बैठने में भी असमर्थ थे। पलामू मेडिकल कालेंज अस्पताल में भर्ती कराने के बाद मरीजों की जांच मेडिकल अस्पताल के लैब में न कराकर बाहर के निजी लैब में भेज दिया गया। उतना ही नहीं इनको मेडिकल अस्पताल से दवा न देकर बाहर से दवा खरीदने की सलाह दी गई।

सकेन्दर परहिया की जांच रिपोर्ट निजी लैब से कराया गया

स्पताल के चिकित्सकों व कर्मचारियों की संवेदनहीनता का अलम यह रहा कि इन्होंने मरीजों को उनके हाल पर छोड़ दिया, जबकि गांव के लोग इन्हें अस्पताल में भर्ती कराकर गांव वापस आ गए थे। स्थिति यह हुई कि भर्ती हुए लोगों को लगा कि यहां इनका कुछ नहीं होने वाला है, तो ये लोग 2 अप्रैल को पैदल ही अपने गांव लौट चले। बीमार कमजोर ये लोग 70-75 किमी पैदल चलकर तीन दिन बाद किसी तरह अपने घर आ पाए।

केन्दर परहिया के पिता चरखू परहिया ने 6 अप्रैल को जेएसएलपीएल (झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रोमोशनल सोसाइटी) के मुख्य कार्यकारी अधिकारी सह विशेष सचिव, झारखंड सरकार के राजीव कुमार को एक पत्र भेजकर बताया कि उसका बेटा सकेन्दर परहिया सहित अन्य छ: परहिया समुदाय के लोग काफी बीमार हैं। उनके मुंह से खून आने लगा तो हमलोगों ने जब उन्हें नजदीकी सरकारी अस्पताल मनातु सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में भर्ती कराने गये, तो हमें अपशब्द बोल कर भगा दिया गया। हमारे गिड़गिड़ाने पर हमें पलामू मेडिकल कालेंज अस्पताल ले जाने को कहा गया। जब इन्हें पलामू मेडिकल कालेंज अस्पताल ले जाने के लिए एम्बुलेंस की मांग की गई, जो कि यहां से काफी दूर है, तो भी हमें को डांटकर भगा दिया गया।

रखू परहिया का आरोप है कि जब भी वे लोग अस्पताल जाते हैं, उन्हें डांटकर भगा दिया जाता है। चरखू परहिया के पत्र को तुरंत संज्ञान में लेते हुए जेएसएलपीएल के मुख्य कार्यकारी अधिकारी सह विशेष सचिव राजीव कुमार ने पत्रांक JSLPL/027, दिनांक 06/05/2020 के तहत पलामू के डीसी को निर्देश दिया कि कैम्प लगाकर मेडिकल टीम द्वारा पीड़ितों की जांच कराई जाय और जरुरत पड़ने पर उन्हें रांची स्थित इटकी के यक्ष्मा (टी.बी) अस्पताल में भर्ती किया जाय। इस निर्देश के बाद मेडिकल टीम द्वारा इनकी जांच की गई तथा 9 अप्रैल को पीड़ितों को पलामू मेडिकल कालेज अस्पताल भेजा गया है।

हां बताना लजिमी होगा कि टीबी और कोरोना का संक्रमण के फैलने की प्रक्रिया एक समान है। जहां कोरोना अभी लाइलाज है, वहीं टीबी अब लाइलाज नहीं रहा। सरकार की ओर से इसके इलाज के साथ दवाइयां भी मुफ्त में दी जाती हैं। मगर हमारी व्यवस्था में जंग लग चुका है, स्वास्थ्यकर्मी संवेदनहीन हो चुके हैं। अगर इन टीबी मरीजों का इलाज समय रहते नहीं हुआ तो इस समुदाय के लिये काफी खतरनाक स्थिति पैदा हो जाएगी।

ताते चलें कि अगस्त 2019 में पलामू प्रमंडलीय सदर अस्पताल को पलामू मेडिकल कॉलेज अस्पताल के रूप बदला गया। इससे संबंधित अधिसूचना स्वास्थ्य चिकित्सा शिक्षा एवं परिवार कल्याण विभाग झारखंड सरकार के सचिव नितिन कुलकर्णी ने राज्यपाल के आदेश पर जारी किया था, तब रघुवर दास की सरकार थी। उसी वक्त अगले सत्र से यहां पढ़ाई शुरू कराने की दिशा में प्रक्रिया तेज कर दी गई थी। विभागाध्यक्षों की नियुक्ति भी कर दी गई थी। मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य और सिविल सर्जन डॉ. जॉन एफ कनेडी बनाए गये थे जो आज भी हैं।

12 फरवरी 2020 को पलामू मेडिकल कॉलेज अस्पताल के निर्माण के दौरान एक दीवार गिर जाने से मलवे के नीचे दबकर नगर उंटारी रोड के समी गांव निवासी पिंटू राम नामक एक मजदूर की मौत हो गयी थी। मालूम हो कि यह आदिम जनजाति समुदाय विलुप्त होने के कगार पर है। इनके बारे जो सरकारी घोषणाएं आए दिन होती वे सब डपोरशंखी साबित हो रही हैं। यह जनजाति भोजन के समुचित अभाव में कुपोषण के कारण कई बीमारियों से ग्रसित रहने को मजबूर है, खासकर पुरूषों में टीबी और महिलाओं में एनेमिया का प्रभाव काफी है।

नसीडीएचआर के राज्य समन्वयक मिथिलेश कुमार बताते हैं कि परहिया जनजाति की आजीविका का एकमात्र साधन जंगल ही रहा है। क्योंकि इनकी निर्भरता कृषि आधारित कभी नहीं रही। जहां एक तरफ इनको जंगलों से कई तरह की जीवनोपयोगी जड़ी-बुटी, कंद-मुल (कंदा, गेठी वगैरह), संतुलित आहार के तौर पर कई तरह की सागों से पोषक तत्त्व मिलते रहे हैं। वहीं अपनी अन्य जरूरतों को पूरा करने के लिए ये लोग बांस से टोकरी वगैरह बनाकर बेचते रहे हैं। अब जब जंगल कटने लगे हैं, वन अधिनियम के तहत जंगल से बांस वगैरह काटने की मनाही है, ऐसे में जंगलों से इन्हें मिलने वाला पोषक तत्त्व नहीं मिल पा रहा है और ये कई बीमारियों के शिकार होते जा रहे हैं।

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ता दें कि जहां परहिया जनजाति के पुरूष वर्ग टीबी के शिकार हैं वहीं महिलाओं में एनिमिया का प्रभाव बढ़ता जा रहा है। विदित हो कि एनिमिया खून में आयरन की कमी से होती है। जिसे दूर करने के लिए आयरन की गोली जरूरी होती है। लेकिन सरकारी योजनाओं की उपेक्षा के शिकार इन परहिया जनजाति में मातृ व शिशु मृत्यु दर बढ़ा है। इस बावत शोधार्थी 'वन उत्पादकता संस्थान' रांची के स्वयं विद् बताते हैं, 'आयरन की कमी को दूर करने में खपड़ा साग काफी सहायक होता है। अत: झारखंड में यह साग पायी जाती है जिसे इस आदिम जनजाति के हर परिवार के घर के आस—पास में भी पैदा किया जा सकता है।'

ल्लेखनीय है कि झारखंड जो आदिवासी बहुल राज्य है, जहां 24 जिलों में कुल 260 प्रखंड हैं जिनमें से 168 प्रखण्डों में खाद्य, सार्वजनिक वितरण एवं उपभोक्ता मामले, झारखण्ड सरकार के दिशा-निर्देश के अनुसार प्रखण्ड स्तर पर अधिकारियों की नियुक्ति की गई है, जिन्हें राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत गठित स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से डाकिया योजना के तहत 35 किलो का खाद्यान्न पैकेट बनाकर इन प्रखंडों के गांवों में आदिम जनजातियों के घर तक वितरण सुनिश्चित करने की जिम्मेवारी दी गई है।

जिसकी जवाबदेही सरकारी डीलर के तौर पर प्रखण्ड आपूर्ति पदाधिकारी को दी गई है। मगर इन परहिया समूदायों को इसका कोई लाभ नहीं मिल रहा है। मिथिलेश कुमार बताते हैं कि इन्हें डाकिया योजना का लाभ मिलना तो दूर यहां जो कार्डधारी हैं उन्हें भी अगस्त 2019 का राशन भी नहीं मिला है।

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