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राजनीति

इधर ट्रंप और मोदी का होता रहा महामिलन, उधर देश में गुपचुप फैलती रही कोरोना की महामारी

Janjwar Team
27 March 2020 10:16 AM GMT
इधर ट्रंप और मोदी का होता रहा महामिलन, उधर देश में गुपचुप फैलती रही कोरोना की महामारी
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सरकार अगर फ़रवरी के शुरू में कोरोना पर ध्यान केंद्रित करती तो दिल्ली का चुनाव नहीं होता, ट्रम्प साहब एक लाख भारतीयों को संबोधित करने का मौका गवां देते, दिल्ली के दंगे नहीं होते जो नागरिकता संशोधन कानून के विरोध को कुछ हद तक कमजोर कर गए और कमलनाथ सरकार मध्य प्रदेश में नहीं गिरती...

मिथिलेश श्रीवास्तव की टिप्पणी

में जनवरी 2020 में ही अपने घरों में कैद कर देना चाहिए था। बहुत देर हो गई। कोरोना वायरस के संक्रमण को रोकने के लिए अपने घरों में अपने आप को क़ैद करके मानव श्रंखला को तोड़ना है। भारत के शक्तिशाली प्रधानमंत्री ने देश के एक सौ तीस करोड़ देशवासियों को चेतावनी दी है, उनके पास चिकित्सकीय व्यवस्था सीमित है, कोरोना वायरस का कोई मुकम्मल ईलाज नहीं हैं। तो उपाय क्या है, घरों में क़ैद रहना। अपने घर के आगे एक लक्षमण रेखा खींच दीजिए और बेवजह उसे लांघिए मत।

हली बार शक्तिशाली प्रधानमंत्री टीवी के माध्यम से नागरिकों के सामने 19 मार्च, 2020 को आए (तिथियां यहां महत्वपूर्ण हैं, याद रखें) और अपने एक सौ तीस करोड़ देशवाशियों को संबोधित किया और कोरोना वायरस के ख़तरों से आगाह किया। दो जरुरी बातें उन्होंने कहीं-एक, कोई नौकरीदाता अपने कर्मचारियों का वेतन नहीं काटेगा और दो, 22 मार्च, 2020 को जनता कर्फ़्यू लगेगा जिसमें सुबह से शाम तक कोई अपने घर से बाहर नहीं निकलेगा।

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तीसरी बात उन्होंने यह कही कि कोरोना की मार सबसे अधिक साठ-पैंसठ की उम्र से ऊपर के नागरिकों पर पड़ेगी क्योंकि उनमें वायरस से लड़ने की प्रतिरोधात्मक क्षमता कमजोर होती है। उसी तारीख़ को अर्थात 19 मार्च 2020 को दिन में भारत सरकार के कार्मिक विभाग का निर्देश आया कि केंद्र सरकार के कर्मचारियों को समूहों में बांट लिया जाए और हर सप्ताह बारी -बारी से एक-एक समूह को कार्यालय बुलाया जाए। केंद्र सरकार के अफ़सरों ने उन निर्देशों को मानने में कोताही बरतने की कोशिश की क्योंकि कर्मचारियों से अपेक्षा की जाती रही कि सारे कर्मचारी 20 मार्च को कार्यालय आएं। कोई आया, कोई नहीं आया लेकिन कर्मचारी डरे रहे नौकरी और वेतन को लेकर।

22 मार्च, 2020 को देश भर में कर्फ़्यू का माहौल रहा और उसी दिन अपराह्न में दिल्ली प्रदेश के उपराज्यपाल और मुख्यमंत्री ने मिलकर यह घोषणा की कि पूरी दिल्ली को लॉकडाउन कर दिया गया है, कोई मेट्रो नहीं, कोई थ्री व्हीलर नहीं, कोई बस नहीं, कोई उबर या ओला नहीं। मतलब 22 मार्च, 2020 की रात से दिल्ली में आवाजाही के लिए कोई साधन नहीं। फिर भी सरकारी दफ़्तरों के अफसरों ने उम्मीद की कि कर्मचारी 23 और 24 मार्च, 2020 को कार्यालय आएंगे। 24 मार्च, 2020 की शाम फिर प्रधानमंत्री दूरदर्शन पर आए और घोषणा की कि आज के 12 बजे रात से तीन सप्ताह के लिए लॉक डाउन पूरे देश में होगा।

बात हैरतअंगेज है कि आख़िर प्रधानमंत्री ने कोरोना की चेतावनी देने के लिए एकदम से 19 मार्च, 2020 को ही क्यों और अचानक क्यों चुना। क्या इसका संबंध उच्चतम न्यायालय के उस आदेश से है जो 19 मार्च, 2020 को दिन में मध्यप्रदेश की कमलनाथ सरकार को 20 मार्च, 2020 के पांच बजे शाम तक विधानसभा के पटल पर बहुमत साबित करने के लिए दिया गया था और मध्यप्रदेश विधानसभा अध्यक्ष को निर्देश दिया गया था कि विधयकों के बिलंबित त्यगपत्रों पर अविलंब फ़ैसला करें। उच्चतम न्यायालय के 19 मार्च, 2020 के इस फ़ैसले से लगभग तय हो गया था कि कमलनाथ सरकार 20 मार्च, 2020 को गिर जाएगी क्योंकि कांग्रेस मध्यप्रदेश में निरुपाय हो चुकी थी। 20 मार्च, 2020 को कमलनाथ ने त्यागपत्र दे दिया था।

स लॉकडाउन के दौरान कोरोना से अधिक लोग भूख से मरेंगे। नोबल सम्मान से सम्मानित अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने अपने शोध में सिद्ध किया है कि अकाल के दिनों में लोग इसलिए नहीं मरे की अनाज की कमी थी बल्कि लोग इसलिए मरे कि लोगों के पास अनाज खरीदने के लिए पैसे नहीं थे, अर्थात उनके पास पर्चेजिंग पावर नहीं था। तीसरी दूनिया के देशों में पर्चेजिंग पावर भी एक औजार है जो कालाबाज़ारी, जमाखोरी और महामारी के समय में मुनाफ़ाख़ोरी को बढ़ावा देता है। प्रधानमंत्री भी 24 मार्च , 2020 को पहली बार असाहय दिखे और कई विकसित देशों का उदहारण देकर उन्होंने अपने देशवासियों से कहा कि जब वे विकसित देश अपने लोगों को बचाने में असमर्थ रहे हैं तो हम क्या कर सकते हैं।

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प्रधानमंत्री कहां तक ठीक हैं कुछ कहा नहीं जा सकता क्योंकि जिस देश में ज़िले स्तर पर आधुनिक मेडिकल औज़ारों और डॉक्टरों से लैस अस्पताल नहीं हैं वह देश अपने नागरिकों की रक्षा कोरोना से नहीं कर सकता है। पैसे की कमी नहीं है इस देश में, लेकिन जो देश मंदिर निर्माण में रूचि दिखाएगा, वह अस्पताल कैसे बनाएगा। बिड़ला एक गांधीवादी कॉर्पोरेट घराना है, लेकिन इस घराने ने अस्पताल कितने बनाए नहीं मालूम लेकिन हर शहर में बिड़ला मंदिर जरुर बनाया है। युद्ध के दिनों में सेना रातोंरात पुल और अस्पताल बना देती है तो महामारी में सेना के इस हुनर का उपयोग क्यों नहीं किया जा सकता है।

रअसल महामारी के दिनों में ही अपनी असमर्थता समझ में आती है ; अन्य दिनों में हम विश्वगुरु बनने की डींगे हांकते रहते हैं। इस वायरस के बारे में कोई कुछ नहीं जानता , यह एक मनुष्यता के ख़िलाफ़ प्रकृति का अघोषित युद्ध है जिससे लड़ने की जिम्मेवारी मनुष्य पर ही डाल दिया गया है और मनुष्य पर ही इसको फ़ैलाने का आरोप भी है। साम्यवादी और लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं कोरोना वायरस के लिए मनुष्य को ही जिम्मेवार ठहरा रही हैं। व्यवस्थाएं हर तकलीफ़ में अपने बच निकलने का रास्ता खोज लेती हैं।

25 जनवरी, 2020 को अमेरिका लौटने के पहले हमारी बेटी और दामाद थाईलैंड घूमने चले गए। यह एक निजी अनुभा है| थाईलैंड का उनका प्रोग्राम बहुत पहले बन गया था। अपने तय कार्यक्रम के अनुसार वे थाईलैंड के लिए रवाना हो गए। इंदिरागांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाईअड्डा के टर्मिनल तीन पर हम उन्हें विदा करने गए थे। विदा करने वालों की भीड़ हवाईयात्रा करने वालों से कई गुना थी। कोई चेकिंग नहीं थी एयरपोर्ट पर कोरोना को लेकर कोई चेतावनी नहीं थी। बच्चे चले गए और थाईलैंड में वे घूमते रहे कि अचानक हम सबलोग कोरोना के प्रकोप से घबड़ा गए और डर गए कि कहीं वे कोरोना प्रभावित न हो जाएँ। थाईलैंड एयरपोर्ट या अमेरिकी एयरपोर्ट पर रोक लिए जाने के ख़तरे हमारे ज़ेहन में आया। कोरोना को लेकर यह एक चेतावनी थी जो हमें पारिवारिक तौर महसूस हुई थी। खबरों में भी कोरोना आ ही गया था।

8 फरवरी 2020 को दिल्ली विधानसभा के लिए चुनाव हुए थे। 10 फरवरी, 2020 को होली थी। दिल्ली में कई जगहों पर होली नहीं मनाई गयी क्योंकि कोरोना के फ़ैलने की खबरें प्रमुखता से आने लगी थीं। 24 और 25 फरवरी, 2020: इन दो दिनों के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत की यात्रा पर आए। अहमदाबाद में उनका भव्य स्वागत हुआ जहां ट्रम्प साहब ने एक लाख की भीड़ को संबोधित किया। आगरा गए। दिल्ली में कई तरह के सरकारी कार्यक्रम हुए। सबसे पुराने और सबसे बड़े लोकतांत्रिक देशों के नेताओं का महामिलन था। ईधर महामिलन होता रहा इस बात से अनजान कि उधर दोनों ही देशों में कोरोना की महामारी गुपचुप फैलती रही।

ब सर्वोच्च नेता महामिलन में बेख़ौफ़ व्यस्त हों तो आम जनता कोरोना को लेकर बेख़ौफ़ कैसे नहीं रह सकती। कोरोना फ़ैल रहा था और दिल्ली के एक हिस्से में दंगों की साज़िश रची जा रही थी। दंगे हुए। दंगों की शुरुआत शायद उसी दिन से हो गयी थी जिस दिन ट्रम्प साहब आए हिंदुस्तान की सरज़मीन पर। कोरोना का फैलते जाना, ट्रम्प साहब का आना और दिल्ली के दंगों का भड़कना तीनों घटनाएं एक साथ होती रहीं हालांकि इनके बीच एकसूत्रता नहीं है।

जरूर था कि सरकारों का ध्यान ट्रंप साहब पर था। वे जब चले गए तो सरकार का ध्यान दंगों की तरफ गया। तब भी कोरोना सरकार की सोच के केंद्र में नहीं था। राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय हवाई उड़ानें यथावत चलती रहीं; राष्ट्रीय रेलसेवाएं अबाधित चलती रहीं। हाइवेज खुले रहे। जनवरी और फरवरी महीने बीत गए, संसार में कोहराम मचा हुआ था कोरोना के प्रकोप से लेकिन हम एक राष्ट्र के तौर पर और एक व्यक्ति के तौर पर निश्चिंत बैठे हुए थे जैसे कि हम जानते ही नहीं थे कि चीन में फैला हुआ कोरोना हिंदुस्तान में फ़ैल सकता है। इस महामारी को समझने में एक राष्ट्र के रूप में और एक व्यक्ति के रुप में हम विफल रहे। हवाईअड्डों पर कोरोना को लेकर कोई अफरातफरी नहीं दिखी, सामान्य चेक-इन, सामान्य सिक्योरिटी चेक और सामान्य बोर्डिंग , और दिल्ली एयरपोर्ट पर सामान्य बैग कलेक्शन और सामान्य एग्जिट।

19 मार्च को खबरों में पढ़ा कि पुणे और महाराष्ट्र बुरी तरह से कोरोना के चपेट में हैं। इसी बीच मध्यप्रदेश में कमलनाथ सरकार को गिराने की साज़िश शुरू हो गयी थी। 19 मार्च की शाम प्रधानमंत्री ने कोरोना की गंभीरता को जनता के सामने रखा और बीस मार्च को कमलनाथ की सरकार गिर गई। यह एक दिन में नहीं हुआ होगा, कमलनाथ की सरकार गिराने की कोशिश बहुत पहले से शुरू हो गयी थी और एक कारण यह भी रहा होगा कि सरकार का ध्यान कोरोना पर केंद्रित नहीं हुआ।

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रकार अगर फ़रवरी के शुरू में कोरोना पर ध्यान केंद्रित करती तो दिल्ली का चुनाव नहीं होता, ट्रम्प साहब एक लाख भारतीयों को संबोधित करने का मौका गवां देते, दिल्ली के दंगे नहीं होते जो नागरिकता संशोधन कानून के विरोध को कुछ हद तक कमजोर कर गए और कमलनाथ सरकार मध्य प्रदेश में नहीं गिरती। कोरोना फ़ैल रहा था और सरकारों का ध्यान कमलनाथ सरकार गिराने पर रहा और जब कमलनाथ की सरकार का गिरना पक्का हो गया जोकि कोरोना से पहले का आख़िरी टास्क था तो अचानक सबको कोरोना की याद आयी। ओला और उबर के व्यापारिक व्यवहार में बदलाव, सेनिटाइज़र, ग्लव्स, मास्क की कालाबाज़ारी की ख़बरें हमारे लिए एक चेतावनी होनी चाहिए थी किन्तु हमारी दिक्कत यह है कि जबतक कोई सरकार किसी चीज़ के बारे में बताए नहीं हम गंभीर होते नहीं हैं।

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