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NRC ड्रैगन के पहले शिकार होंगे दलित-आदिवासी, मुस्लिम, किसान और कामगार

Prema Negi
17 March 2020 7:21 AM GMT
NRC ड्रैगन के पहले शिकार होंगे दलित-आदिवासी, मुस्लिम, किसान और कामगार
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दस्तावेजी भूलों के आधार पर नागरिकता संशोधन CAA का भारत नाट्यम चलाया और दिखाया जा रहा है, जिस पर सब नाचने के लिए बाध्य किए जा रहे हैं। कुछ नाच रहे हैं कुछ नाचने के लिए तैयार हैं....

CAA-NRC से आम नागरिक की जिंदगी में आने वाले तूफान और नागरिकता के खतरों से आगाह कराती इस्लाम हुसैन की टिप्पणी

जनज्वार। कागजों में कई नागरिकों के दादा-दादी, नाना-नानी के नाम में थोड़ा सा भी अन्तर या अलग नाम उनको यातनागृह में डाल देगा। रमुवा और रामू ही राम सिंह या राम लाल/राम प्रसाद है, या रामलाल, फकीरे, फकीर चन्द्र/चंद है यह आज आप नहीं जान सकते। हजारों, लाखों, करोड़ों रमुवा, पदुवा, धनुआ,नत्थू, छिद्दा पिद्दा, रमुली, जसुली, नथिया, बुंदिया, बुल्ले, कीकर, झोंटू, दुल्ला,गुल्ला,बेलू, को नहीं जानते।

नके बारे में नहीं जाना जा सकता, क्योंकि ये लोग जिनके नाम चुनाव सूची या अन्य दस्तावेजों में जो दर्ज हैं, वह वो नहीं होते हैं जो नाम लिखे हैं, उनके नाम वो हैं जिसे भारत सरकार का चुनाव आयोग और सरकारी सिस्टम नहीं जानता। लेकिन दुर्भाग्य से ऐसी ही दस्तावेजी भूलों के आधार पर नागरिकता संशोधन का भारत नाट्यम चलाया और दिखाया जा रहा है, जिस पर सब नाचने के लिए बाध्य किए जा रहे हैं। कुछ नाच रहे हैं कुछ नाचने के लिए तैयार हैं।

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नआरसी और नागरिकता के मुद्दे पर हो रहे हंगामे के बीच अनेक विचार आते रहे, एक विचार यह था कि क्या होगा देख लेंगे, लेकिन जब अगली पीढ़ी का ख्याल आता तो उलझन होती है, कागज देखने का अब मन नहीं करता।

मेरा बेटा जो एक विख्यात विश्वविद्यालय में ग्रेजुएशन के बाद आगे एमटेक की शिक्षा ग्रहण कर रहा है, वह नागरिकता कानून यानी CAA को लेकर बहुत गुस्से में था, आमतौर पर वह अपनी पढ़ाई के अलावा मामलों में खामोश रहता है, लेकिन इस मामले को लेकर बेचैन था।

मेरे बेटे ने बताया था कि आधार कार्ड में गलत नामों का रेसियो 5-8% है, और चूंकि आधार को नागरिकों की पहचान से जोड़ने का प्रोपगंडा खूब हुआ था इसलिए अधिकांश नागरिकों ने अपने आधार कार्ड बनवा लिए हैं, यदि उसमें उनके नाम गलत दर्ज हुए होंगे तो वो कहां जाएंगे - डिटेन्शन सेन्टर, अभी तक जो आसाम का अनुभव है उसके देखकर यही लगता है, जहां बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जिनके डाक्यूमेंट्स के नाम में अन्तर था।

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यह जानकारी मिलने के बाद मुझे 25-30 साल पहले वोटर सूची और वोटर आईडी में दर्ज हुए नाम का प्रकरण याद आ गया। लेख के आरम्भ में मेरे सवाल का यही आधार था। 25-30 साल पहले वाली वोटर सूची होती तो आप किसी भी मुहल्ले में मकान नम्बर मिलने के बाद भी उस व्यक्ति को नहीं ढूंढ़ पाते, मकान में पहुंच भी जाते तो आपको अपने पर और सरकारी अमले की नालायकी पर खीज और गुस्सा आता। मेरे बेटे ने तो आधार कार्ड की गलती होने का औसत 8% बताया, मगर वोटर आईडी में यह औसत इससे कहीं अधिक है।

मैंने अपने शहर की मिली—जुली आबादी के एक मतदान केन्द्र की लगभग 2100 मतदाता सूची का जो अवलोकन किया उसे देखकर यही लगता है कि एनआरसी लगने पर देश के नागरिक एक बड़े संकट में फंसने वाले हैं। इसमें मतदाताओं के नाम में गलती का प्रतिशत 14-18% है।

कुछ देशप्रेमी जो लगातार राष्ट्रीय स्तर पर एनआरसी का समर्थन कर रहे हैं उन्हें बताता चलें कि आसाम का अनुभव बताता है कि वहां 3 करोड़ आबादी में से 40 लाख लोग नागरिकता रजिस्टर से बाहर हो गए थे। दोबारा वेरीफिकेशन में जिनकी संख्या बाद में 19 लाख रह गयी थी, इस अवधि में लोगों को कितनी मानसिक पीड़ा होगी इसकी कल्पना करना मुश्किल है।

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स आधार पर पूरे देश की लगभग 20 प्रतिशत जनसंख्या अर्थात 20-30 करोड़ बुरी तरह पीड़ित होगी, जिसमें सभी धर्म और जाति के लोग शामिल होंगें, ऐसा नही कि कोई धर्म विशेष के लोग ही परेशान होंगे। जो जितना गरीब होगा, और सुदूर क्षेत्र का निवासी होगा वह उतना ही पीड़ित होगा। पर्वतीय या बीहड़ इलाके में रहने वालों को जिला या ब्लाक मुख्यालय में एनआरसी में नाम जुड़वाने के लिए कितने चक्कर लगाने पड़ेंगे और यदि नहीं हुआ तो कितनी ज़लालत झेलनी पड़ेगा।

ह उन लोगों से पूछिए जिन्हें किसी सरकारी योजना का लाभ लेने के लिए अनिवार्य रूप से बैंक खाता खोलने के लिए अनेक बार अपने घर से बैंक शाखा तक 20-20 किमी पैदल चक्कर लगाने पड़े थे। अनुभव बताता है कि साहब गरीबों का बैंक खाता तक एक ही दिन में आसानी से नहीं खोलते और यह तो एनआरसी जैसी भारी भरकम प्रक्रिया है।

त्तराखंड के संदर्भ में जान लें कि यहां कम से कम 20 लाख लोग बुरी तरह एनआरसी से पीड़ित होंगे। इससे पहले कुछ तथ्य जानना जरूरी है जिनमें कि अभी भी हमारे देश में वास्तविक साक्षरता और आंकड़ों की साक्षरता में बड़ा अन्तर है और तीन दशक पहले जब वोटर आईडी शुरु की की गई थी तो और भी बुरा हाल था।

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ढ़े-लिखे और अध्यापन जैसे व्यवसाय में जो लोग हैं उनकी भाषा वर्तनी की शुद्धता पर भी सवाल है, मतदाता या आधार कार्ड बनाने वाले सभी धर्मों/भाषाओं की गूढ़ता/बातों/रस्मों और प्रतीकों को जानते हों, यह जरूरी नहीं यही कारण है कि प्रमाणपत्रों और दस्तावेजों में लिखे नाम उनके वास्तविक नामों से भिन्न हो गए हैं।

जागरुकता का अभाव हर काल में रहा है, यहां तो पढ़े लिखे भी बात समझने के लिए तैयार नहीं होते, हिन्दी में नाम की अशुद्धियों के अतिरिक्त अंग्रेज़ी में दिए नाम में और भी गलतियां देखी गई हैं।

तदाता सूची और अन्य दस्तावेजों में ब, भ, स श, अ, ह त, थ, आधा त, र, स श न, ह, के प्रयोग की भयंकर अशुद्धियां शामिल हैं। नाम में गलत शब्द के प्रयोग से धर्म का बोध तक बदलता देखा गया है, मुस्लिम नाम कफील के हिन्दू नाम कपिल बनने में देर नहीं लगती, इसी तरह मुस्लिम नाम निशात, बदलते बदलते निशाद हो जाता है। कतील नाम कातिल हो जाए, कह नहीं सकते। गुरमित ही गुरुप्रीत है यह सिद्ध करना आसान नहीं होगा।

र्वतीय क्षेत्रों में 'त्र' अक्षर से अनेक नाम खूब प्रचलित हैं, त्रिभुवन, त्रिलोक, त्रिलोचन, त्रिपुरारि,आदि आदि यह शब्द कम से कम तीन अन्य तरह से दस्तावेजों में मिलता है, जैसे, तिरलोक, तिलोक, तिरिलोक/तिरीलोक। इसी तरह आधे अक्षरों से युक्त शब्दों के एक से अधिक रूप हैं। देवेन्द्र, देवेन्द्रा, देविन्दर, देवेन्दर, चन्द्र कब और कैसे चन्दन हो जाए या चन्द्रा हो जाए कहा नहीं जा सकता। इसी तरह एक मुस्लिम नाम 'इश़्हाक़' मतदाता सूची/दस्तावेजों में कैसे कैसे लिखा गया है इसकी बानगी देखिए, ईशाक, इशाक, इश़ाक, इशहाक, इश्हाक, ईश़हाक, ईश़्हाक....

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र्तमान समय में कम्प्यूटर की मूल भाषा अंग्रेजी होने के कारण आपरेटर कैसे लिखता है, जो कि आपके मूल दस्तावेज से भिन्न है, इसे अच्छे अच्छे पढ़े लोग नहीं जान पाते हैं, अशिक्षित और कम जानकारों के लिए यह सब बहुत ही मुश्किल है।

हिन्दी से रोमन या अंग्रेजीकरण करने का कोई मानक तय नहीं है, यदि होगा तो उसकी जानकारी नहीं है और न व्यवहार में ऐसा हो सकता है। हिन्दी टाइपिंग में वर्तनी की अशुद्धियों और भूलों को सुधारने का न तो कोई नियम हैं और न उसे सुधारने की कोई स्वतः प्रक्रिया ही अस्तित्व में है।

स्तावेजों में गलतियों से फौजियों/फौजी परिवारों को सर्विस के दौरान और रिटायरमेन्ट के बाद अपने बच्चों के नाम में फर्क से होने वाली परेशानी से भटकते देखा है। बैंक एकाउंट से लेकर स्कूल में दाखिल तक में परेशानी आती है। ऐसे में यदि दादा, नाना के मूल नामों में अन्तर आया तो एन आर सी में नागरिकता सिद्ध करना आसान नहीं होगा, आसाम में ऐसे लोगों का बहुत बड़ा प्रतिशत है।

क सार्वजनिक कम्पनी में प्लेसमेंट और ट्रेनिंग का कार्य देखते हुए और बाद में संस्थागत कार्य करते हुए नामों में बहुत गलतियां मिलीं। हिन्दी और अंग्रेजी के नाम में बहुत अन्तर से बखेड़े होते हुए देखे हैं। जिसके कारण लोगों के बहुत काम अटके, वह या तो नहीं हुए या फिर देर से हुए, नवराष्ट्रवाद के काल में ऐसा भी हुआ कि बच्चों के स्कूलों में एडमीशन और परीक्षाओं में प्रवेश में भी आधार कार्ड के और दूसरे दस्तावेजों में दर्ज नामों के अन्तर के कारण परेशानी और झंझट हुए।

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सी स्थिति में यदि एनआरसी समर्थक भी जब अपने या अपने परिवार के सदस्यों के नामों को सही करने के लिए लाइन लगाएंगे तो कितना श्रम उर्जा और धन की बर्बादी होगी, इसके बारे में सोचकर ही सिहरन होती है। आसाम का अनुभव है कि वहां लोग चार साल तक लोग पगला गए थे, हर परिवार का हजारों करोड़ रुपया अनावश्यक इसमें लगा था। 16000 करोड़ रुपया यदि सरकारी पैसा खर्च हुआ है तो वह भी देश का पैसा बर्बाद हुआ है, एक अध्ययन के अनुसार एक आसामी का एनआरसी रजिस्टर में अपना नाम दर्ज/वेरीफाई कराने में औसतन 19000 रुपये खर्च हुआ है।

स स्थिति की गंभीरता को इस तरह समझें कि किन्हीं लोगों के पिता/बुजुर्गों के नाम भूमि आदि के दस्तावेजों में रामू, दीनू, नथुवा, बलवंता लिखा है, जबकि उनके दस्तावेजों में क्रमशः राम सिंह या रामलाल, रामप्रसाद, दीनानाथ, दीनदया और बलवन्त सिंह है तो उन्हें बहुत कुछ सिद्ध करना पड़ सकता है। उदाहरणार्थ रामू क्या वास्तव में तुम्हारे बाप/बुजुर्ग थे। यह जान लें कि अभी तक दस्तावेजों तक में अशुद्ध या देशज/घरेलू नामों का प्रयोग खूब हुआ है और होता रहा है, अशिक्षित बुजुर्गों द्वारा दस्तावेजों में खूब घरेलू नामों का प्रयोग होता था, स्कूल में दाखिल के समय यह नाम कुछ का कुछ हो जाता था।

जिन लोगों ने अपने पिता के नाम दस्तावेजों में आधे—अधूरे व देशज नामों से जरा भी अलग रखे हैं या स्कूल में मास्साहबों ने "सुधार" दिए हैं, ठेंगा सिंह एक दस्तावेज में ठाकुर सिंह हो सकते, लेकिन दस्तावेज में दोनों एक ही हैं यह सिद्ध करना मुश्किल हो जाएगा ऐसे लोग जान लें कि उन पर बड़ी आफत आने वाली है। यह नाम रमुवा, भिमुवा, जसुली, परूली से लेकर छिद्दा, छिद्दू और ननकू तक हो सकते हैं।

ब जरा एक और तकनीकी पक्ष देखें कि एनआरसी प्रक्रिया में हर भारतीय की नागरिकता संदिग्ध मान ली जाएगी, आपको लाईन लगाकर यह सिद्ध करना होगा कि आपका जन्म 1972 से पहले भारत में हुआ है और यहीं रहते थे, यदि उसके बाद हुआ है तो आपके माता पिता/दादा दादी का जन्म उस अवधि से पूर्व भारत में हुआ था और वह यहां रह रहे थे, जिसके लिए आपके पास ऐसा दस्तावेज होना चाहिए। जन्म पंजीकरण का कानून को लागू हुए अभी जुमा-जुमा आठ दिन हुए हैं, लेकिन आपको एनआरसी के लिए दशक पुराने अपने बुजुर्गों का जन्म प्रमाण चाहिए होगा।

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स प्रक्रिया में यह बात समझ लें कि नाम लिखित में सही होना चाहिए और उस नाम से आपका या आपके पिता या माता का नाम मिलना चाहिए या सम्बन्ध स्थापित होना चाहिए।

स समय यह भूल जाएं कि भारत में बड़ी संख्या में अशिक्षित, भूमिहीन, आदिवासी, घुमक्कड़, खानाबदोश, बिना मकान के इधर उधर या खुले आसमान के नीचे फुटपाथ में रहकर गुजरबसर वाले करोड़ों लोग हैं, जिनके पास अपना या अपने बुजुर्गों के जन्म का कोई प्रमाण नहीं होता।

ड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं जिनके पास अपने बुजुर्गों के जनम की लिखित सनद है तो "वह भी" समझ लें कि उसमें से 25% पर आफत आने वाली है क्योंकि भूमि/ आदि के दस्तावेजों में 25% अशुद्धियां तो मिलनी हैं, यदि किसी के बुजुर्ग के नाम में अशुद्धि मिली तो बुजुर्ग का नाम तो ठीक होने से रहा उसे ही अपने और अपने बच्चों के नाम उसी तरह शुद्व कराने पड़ेंगे, सामान्य रूप से से समझ लें कि कि यदि आपके बुजुर्ग का नाम जो कुछ है वैसा ही आपके दस्तावेजों में होना चाहिए।

प अपने बच्चों या अपने आधार कार्ड का नाम सुधारना चाहते हैं तो अब इसका आसान नहीं है, आधारकार्ड में नाम सुधार की प्रक्रिया बहुत कड़ी और सीमित कर दी गई है, पिछले वर्ष तक यह हर सेन्टर पर आसानी से हो जाया करती थी। फिर आप अभी अपना या बच्चों के नामों में सुधार जैसे तैसे कर भी लें, तो अपने दादा नाना का नाम कैसे ठीक करेंगे?

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से में सबसे बड़ी समस्या दलितों, आदिवासियों, खानाबदोशों और प्रवासी लोगों की होने जा रही है, जिनके खुद के प्रमाणपत्र नहीं होते वह अपने बाप दादाओं के कागजात कहां से लाएंगे।

लितों के साथ तो यह भयानक मजाक है, क्योंकि अभी हाल तक उन्हें नाम रखने का अधिकार नहीं था, न ही उनका नामकरण होता था और न न उनकी जन्मपत्री बनती थी। यहां तक यदि किसी दलित बच्चे का नाम ढंग का रख भी दिया गया तो उच्च वर्ग उस नाम को बिगाड़ देता था। रामलाल का रामू, व रमुवा इसी तरह हो जाता था।

बेहद गरीबों, ग्रामीणों और प्रवासियों के सामने दस्तावेज सुरक्षित रखने का संकट भी रहा है, वह वर्षा, बाढ़, प्राकृतिक आपदा, आग और अपने लगातार बदलते प्रवास में अपने सीमित कागज भी सुरक्षित कैसे रखें। उत्तर भारत में विशेषकर उत्तराखण्ड व हिमाचल में घुमन्तु वनवासी गूजर इसी समस्या से परेशान हैं।

स प्रक्रिया में पूर्व राष्ट्रपति फखरुद्दीन अहमद और आसाम की पूर्व मुख्यमंत्री अनवरत तैमूर व कारगिल का हीरो फौजी सनाउल्ला सेना अधिकारी ही नहीं परेशान हुए हैं, लाखों शर्मा, वर्मा और सुन्दर, चन्दर भी परेशान हुए हैं।

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